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भगवान शिव को प्रसन्न करना सरल : नितिश महादेव
Wed, 05 Mar 2025 12:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Wed, 05 Mar 2025 12:51 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
रादौर। खेड़ा मोहल्ला में पंडित रवि शंकर के घर पर आयोजित शिव महापुराण कथा का समापन हो गया। कथावाचक पंडित नितिश महादेव ने बताया कि भगवान शिव सदैव परोपकारी और हितकारी हैं। त्रिदेवों में इन्हें संहार का देवता भी माना गया है। भगवान शिव को प्रसन्न करना अत्यंत सरल है।
उन्होंने बताया। अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यंत सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति इनको सुगंधित पुष्पमालाओं और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती। शिव तो स्वच्छ जल, बेल पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वह तो औघड़ बाबा हैं। जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं, शरीर पर बाघम्बर, चिता की भस्म लगाए एवं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए वे सारे विश्व को अपनी पद्चाप तथा डमरू की कर्णभेदी ध्वनि से नचाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें नटराज की संज्ञा भी दी गई है। उनकी वेशभूषा से जीवन और मृत्यु'' का बोध होता है।
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शीश पर गंगा और चंद्र-जीवन एवं कला के द्योतक हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अंत में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है। पंडित नितिश महादेव ने बताया कि पहली बार कस्बा में शिवमहापुराण कथा का वाचन किया गया। अगली शिव महापुराण कथा हिसार में आयोजित की जाएगी।
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रादौर। खेड़ा मोहल्ला में पंडित रवि शंकर के घर पर आयोजित शिव महापुराण कथा का समापन हो गया। कथावाचक पंडित नितिश महादेव ने बताया कि भगवान शिव सदैव परोपकारी और हितकारी हैं। त्रिदेवों में इन्हें संहार का देवता भी माना गया है। भगवान शिव को प्रसन्न करना अत्यंत सरल है।
उन्होंने बताया। अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यंत सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति इनको सुगंधित पुष्पमालाओं और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती। शिव तो स्वच्छ जल, बेल पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
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शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वह तो औघड़ बाबा हैं। जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं, शरीर पर बाघम्बर, चिता की भस्म लगाए एवं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए वे सारे विश्व को अपनी पद्चाप तथा डमरू की कर्णभेदी ध्वनि से नचाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें नटराज की संज्ञा भी दी गई है। उनकी वेशभूषा से जीवन और मृत्यु'' का बोध होता है।
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शीश पर गंगा और चंद्र-जीवन एवं कला के द्योतक हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अंत में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है। पंडित नितिश महादेव ने बताया कि पहली बार कस्बा में शिवमहापुराण कथा का वाचन किया गया। अगली शिव महापुराण कथा हिसार में आयोजित की जाएगी।