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हर पर्व के पीछे इतिहास : डॉ. स्वाति
Mon, 04 Nov 2024 01:29 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 04 Nov 2024 01:29 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के 106वें दिन साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने फरमाया कि आज भैया दूज का पावन पर्व है। हर पर्व का अपना महत्व होता है। किसी भी पर्व की मान्यता के पीछे एक इतिहास छिपा होता है।
भैया दूज के पर्व के पीछे भी 2550 वर्ष पूर्व का इतिहास है। कहते हैं भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के बाद उनके बड़े भाई कुंडलपुर के राजा नंदी वर्धन गहरे शोक में डूब गए। राजकाज की सभी व्यवस्थाओं से परे होकर निरंतर रोते रहते थे। उनकी याद में डूबे रहते थे। मंत्री समूह ने सोचा ऐसे तो राज्य व्यवस्था बिगड़ जाएगी।
उन्होंने समझने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह नंदी वर्धन के दुख को कम नहीं कर पाए। जहां प्रभु की चिता जलाई गई थी, राजा नंदी वर्धन उठने का नाम नहीं ले रहे थे। मंत्रियों ने उनकी बहन सुदर्शना को सूचना भिजवाई और नंदी वर्धन को समझने के लिए बुलाया। बहन सुदर्शना का रो-रोकर बुरा हाल था, जैसे ही सुदर्शना भाई को समझाने आई तो दोनों की रुलाई फूट पड़ी।
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दोनों ही गले लगा कर खूब रोए, लेकिन सुदर्शना ने सोचा मैं भाई को समझने आई हूं। इस तरह रहूंगी तो भाई को कैसे संभाल पाउंगी? उसने भाई नंदी वर्धन को बहुत समझा कर अपने नगर ले गई और अपने हाथों से खाना खिलाया। फिर उसने भाई से कहा भाई मैं तुमसे कुछ मांगू तो दोगे?
नंदी वर्धन ने कहा बहन क्यों नहीं। भाई जैसे आज आप मेरे घर आए हैं ऐसे ही हर साल इस दिन मेरे घर आना बस मुझे यही चाहिए। नंदी वर्धन ने हर साल आने का वादा किया तभी से यह दिन भैया दूज के रूप में एक पाव पर्व बन गया। आज यह पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है।
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यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के 106वें दिन साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने फरमाया कि आज भैया दूज का पावन पर्व है। हर पर्व का अपना महत्व होता है। किसी भी पर्व की मान्यता के पीछे एक इतिहास छिपा होता है।
भैया दूज के पर्व के पीछे भी 2550 वर्ष पूर्व का इतिहास है। कहते हैं भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के बाद उनके बड़े भाई कुंडलपुर के राजा नंदी वर्धन गहरे शोक में डूब गए। राजकाज की सभी व्यवस्थाओं से परे होकर निरंतर रोते रहते थे। उनकी याद में डूबे रहते थे। मंत्री समूह ने सोचा ऐसे तो राज्य व्यवस्था बिगड़ जाएगी।
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उन्होंने समझने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह नंदी वर्धन के दुख को कम नहीं कर पाए। जहां प्रभु की चिता जलाई गई थी, राजा नंदी वर्धन उठने का नाम नहीं ले रहे थे। मंत्रियों ने उनकी बहन सुदर्शना को सूचना भिजवाई और नंदी वर्धन को समझने के लिए बुलाया। बहन सुदर्शना का रो-रोकर बुरा हाल था, जैसे ही सुदर्शना भाई को समझाने आई तो दोनों की रुलाई फूट पड़ी।
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दोनों ही गले लगा कर खूब रोए, लेकिन सुदर्शना ने सोचा मैं भाई को समझने आई हूं। इस तरह रहूंगी तो भाई को कैसे संभाल पाउंगी? उसने भाई नंदी वर्धन को बहुत समझा कर अपने नगर ले गई और अपने हाथों से खाना खिलाया। फिर उसने भाई से कहा भाई मैं तुमसे कुछ मांगू तो दोगे?
नंदी वर्धन ने कहा बहन क्यों नहीं। भाई जैसे आज आप मेरे घर आए हैं ऐसे ही हर साल इस दिन मेरे घर आना बस मुझे यही चाहिए। नंदी वर्धन ने हर साल आने का वादा किया तभी से यह दिन भैया दूज के रूप में एक पाव पर्व बन गया। आज यह पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है।