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Yamuna Nagar News: आग से वन्य प्राणियों, जंगल को बचाएंगी चार फायर लाइनें
Tue, 22 Apr 2025 03:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Tue, 22 Apr 2025 03:06 AM IST
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नवाब खान
प्रतापनगर(यमुनानगर)। हरियाणा के सबसे बड़े और 11507 एकड़ में फैले कलेसर जंगल में वन्य प्राणियों व जंगल को बचाने के लिए वन्य प्राणी विभाग ने चार फायर लाइन रेखाएं खींच दी गई हैं। इतना ही नहीं इन फायर लाइन पर नजर रखने के लिए बीट गार्डाें की तैनाती कर दी गई है। वहीं जंगल के बीचों बीच लगे वॉचिंग टॉवरों से भी कर्मचारी नजर बनाए रखे हुए हैं।
जानकारी के अनुसार वन्य जीव प्राणी विभाग ने जंगल को फायर लाइन के हिसाब से चार भागों में बांटा हुआ है, हर दो किमी पर एक फायर लाइन बनाई गई है जिन पर हर वर्ष फायर लाइनों की सफाई करीब 5 से 7 लाख की लागत आती है।
जानकारी के अनुसार नेशनल पार्क कलेसर में बनी फायर लाइनों का कुल क्षेत्र 35 किलोमीटर है। फायर लाइनों में जमा सूखी पत्तियों व घास को हटाकर उनको साफ सुथरा किया जाता है ताकि फायर सीजन में जंगल में लगी आग पर आसानी से काबू पाया जा सके। चूंकि, जब जंगल के एक हिस्से में किसी कारण आग लग जाती है तो दूसरी साइड से कर्मचारी आग पर आसानी से काबू पा लिया जा सकता है। बाकी सारा जंगल व जीव-जंतु आग की चपेट में आने से सुरक्षित बच जाते हैं। मजदूरों व ट्रैक्टर की माध्यम से फायर लाइन की जोताई कराई जाती है। इससे पहले वर्ष 2010 में हिमाचल की ओर से आई आग के कारण कलेसर जंगल का लगभग 410 एकड़ का जंगल नष्ट हो गया था।
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रहते हैं ये वन्य प्राणीः कलेसर जंगल में दुर्लभ प्राणी भी देखने को मिलते हैं। इस जंगल सफरी में तेंदुए, सांबर, बिल्ली, चित्तल, नीलगाय, भालू, जंगली धब्बेदार बिल्ली, हाथी, लंगूर, बंदर, जंगली मुर्गे जैसे अन्य जानवरों की प्रजातियां हैं।
जंगली सुअर और मोंगोज भी यहां पाए जाते हैं। राजाजी राष्ट्रीय उद्यान से भी कई बार बाघ और हाथी इस क्षेत्र में आ जाते हैं। वहीं सैलानियों को भी यह पर्यटक स्थल खूब भा रहा है। खासकर छुट्टियों में जंगल सफारी के लिए पहले से भीड़ बढ़ने लगती है। संवाद
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प्रतापनगर(यमुनानगर)। हरियाणा के सबसे बड़े और 11507 एकड़ में फैले कलेसर जंगल में वन्य प्राणियों व जंगल को बचाने के लिए वन्य प्राणी विभाग ने चार फायर लाइन रेखाएं खींच दी गई हैं। इतना ही नहीं इन फायर लाइन पर नजर रखने के लिए बीट गार्डाें की तैनाती कर दी गई है। वहीं जंगल के बीचों बीच लगे वॉचिंग टॉवरों से भी कर्मचारी नजर बनाए रखे हुए हैं।
जानकारी के अनुसार वन्य जीव प्राणी विभाग ने जंगल को फायर लाइन के हिसाब से चार भागों में बांटा हुआ है, हर दो किमी पर एक फायर लाइन बनाई गई है जिन पर हर वर्ष फायर लाइनों की सफाई करीब 5 से 7 लाख की लागत आती है।
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जानकारी के अनुसार नेशनल पार्क कलेसर में बनी फायर लाइनों का कुल क्षेत्र 35 किलोमीटर है। फायर लाइनों में जमा सूखी पत्तियों व घास को हटाकर उनको साफ सुथरा किया जाता है ताकि फायर सीजन में जंगल में लगी आग पर आसानी से काबू पाया जा सके। चूंकि, जब जंगल के एक हिस्से में किसी कारण आग लग जाती है तो दूसरी साइड से कर्मचारी आग पर आसानी से काबू पा लिया जा सकता है। बाकी सारा जंगल व जीव-जंतु आग की चपेट में आने से सुरक्षित बच जाते हैं। मजदूरों व ट्रैक्टर की माध्यम से फायर लाइन की जोताई कराई जाती है। इससे पहले वर्ष 2010 में हिमाचल की ओर से आई आग के कारण कलेसर जंगल का लगभग 410 एकड़ का जंगल नष्ट हो गया था।
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रहते हैं ये वन्य प्राणीः कलेसर जंगल में दुर्लभ प्राणी भी देखने को मिलते हैं। इस जंगल सफरी में तेंदुए, सांबर, बिल्ली, चित्तल, नीलगाय, भालू, जंगली धब्बेदार बिल्ली, हाथी, लंगूर, बंदर, जंगली मुर्गे जैसे अन्य जानवरों की प्रजातियां हैं।
जंगली सुअर और मोंगोज भी यहां पाए जाते हैं। राजाजी राष्ट्रीय उद्यान से भी कई बार बाघ और हाथी इस क्षेत्र में आ जाते हैं। वहीं सैलानियों को भी यह पर्यटक स्थल खूब भा रहा है। खासकर छुट्टियों में जंगल सफारी के लिए पहले से भीड़ बढ़ने लगती है। संवाद