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पहली वर्षगांठ भी नहीं मना पाया वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट
यमुनानगर
Updated Sun, 22 Dec 2013 05:02 PM IST
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ठीक एक साल पहले 21 दिसंबर को शुरू हुआ वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट अपनी पहली
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वर्षगांठ पर बंद रहा। प्लांट काफी समय से बंद पड़ा है। इस कारण ट्विन सिटी
से निकलने वाले कूड़े का निस्तारण नहीं हो पा रहा है।
इस प्लांट का 21 दिसंबर 2012 को केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा ने प्लांट का उद्घाटन किया था।
नगर निगम के वाहन रोज प्लांट में कूड़ा डाल रहे हैं। प्लांट बंद होने से प्लांट के अंदर ही नहीं बल्कि बाहर भी कूडे़ के ढेर लग गए हैं, वहीं प्लांट में काम कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि कंपनी की ओर से वेतन नहीं दिया जा रहा है। इसकी वजह से प्लांट बंद कर दिया गया है।
जब तक वेतन नहीं दिया जाएगा प्लांट में काम नहीं करेंगे। हालांकि कंपनी के साइट इंचार्ज एसके सिंह का कहना है कि प्लांट को बंद हुए अभी चार से पांच दिन ही हुए हैं और जल्द ही प्लांट चल जाएगा। प्लांट चलाने में बजट की दिक्कत आ रही है जो जल्द ही दूर हो जाएगी। लेकिन प्लांट के अंदर और बाहर पड़ी गंदगी कुछ और ही बयां कर रही है। गंदगी के ढेर बताते हैं कि प्लांट लंबे समय से बंद पड़ा है।
यह पहली बार नहीं हुआ कि प्लांट बंद हुआ हो। इससे पहले साल में कई बार प्लांट डगमगाया। कभी बिजली बिल जमा न होने से प्लांट का कनेक्शन कट गया तो कभी लेबर को वेतन न मिलने की वजह से। इस तरह के उतार चढ़ाव कई बार वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट ने देखे और अब अपनी पहली वर्षगांठ पर भी वह बंद पड़ा है। बता दें सरकार ने प्लांट का संचालन निजी कंपनी को दिया है, जिसके साथ 30 साल का करार है।
18.74 करोड़ हुए थे खर्च
गांव कैल में बने प्लांट को लगाने के लिए कुल 18.74 करोड़ रुपये खर्च आया था। इसकी क्षमता प्रतिदिन 150 टन कचरा निस्तारण करने की है। यह प्लांट आठ एकड़ दो कनाल और 13 मरले में लगा है। इसका निर्माण 2008 से शुरू हुआ था। लेकिन प्लांट बंद होने से प्लांट मेंकचरे के ढेर लग गए हैं और यह क्षेत्र भी कम पड़ने लगा है। प्लांट बंद होने से 1000 से 1500 टन के बीच कूड़ा प्लांट और आसपास पड़ा है। इससे अब आसपास के क्षेत्र में भी गंदगी के ढेर लग चुके हैं।
शहर से जा रहा 80 टन कचरा
प्लांट में तैनात कर्मचारियों की माने तो प्लांट में प्रतिदिन 70 से 80 टन कचरा आ रहा है, जबकि प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 150 टन कचरा निरस्त करने की है। लेकिन कभी किसी कारण से तो कभी किसी कारण से प्लांट बंद रहने से क्षमता से आधा कचरा भी प्लांट पर भारी पड़ने लगा है। विभिन्न कारणों से बंद रहने के साथ-साथ प्लांट बरसात के दिनों में तो अक्सर बंद ही रहता है। क्योंकि कचरा सूख नहीं पाता और प्लांट बंद ही रहता है।
किसानों को भी नहीं मिला लाभ
प्लांट लगने से जहां शहरवासियों को गंदगी से निजात मिलने का सपना दिखाया गया, वहीं किसानों को सपना दिखाया गया कि प्लांट में खाद बनेगी, जिससे किसानों को लाभ होगा। खेतों में इस खाद को डालने से फसल अच्छी होगी। हालांकि खाद बनी जरूर, लेकिन जिले के ज्यादातर किसानों ने प्लांट में बनने वाली खाद खेती में इस्तेमाल ही नहीं किया। जिससे किसानों को भी इस प्लांट से कुछ लाभ नहीं मिल पाया। इतना जरूर है कि पहले शहर का कचरा नहर और सड़कों के किनारे डाला जाता था और अब सिर्फ प्लांट में ही कचरा डाला जा रहा है।
ऐसे बनती है कचरे से खाद
प्लांट लगाने के पीछे सरकार की मंशा थी कि एक तो शहर साफ सुथरा रहेगा और कचरे से खाद बनाई जाएगी। जो खेती में काम आएगी। इससे पर्यावरण को कचरे से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा। प्लांट में आए कचरे को सबसे पहले दो महीने के लिए ऐसे ही खुले में डालकर रखा जाता है। उसके बाद उसे डेढ़ महीना सूखाने में लग जाता है। इसके बाद कचरा निरस्त मशीनों में डाल इसे खाद का रूप दे दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम तीन माह का समय लगा है।
इस प्लांट का 21 दिसंबर 2012 को केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा ने प्लांट का उद्घाटन किया था।
नगर निगम के वाहन रोज प्लांट में कूड़ा डाल रहे हैं। प्लांट बंद होने से प्लांट के अंदर ही नहीं बल्कि बाहर भी कूडे़ के ढेर लग गए हैं, वहीं प्लांट में काम कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि कंपनी की ओर से वेतन नहीं दिया जा रहा है। इसकी वजह से प्लांट बंद कर दिया गया है।
जब तक वेतन नहीं दिया जाएगा प्लांट में काम नहीं करेंगे। हालांकि कंपनी के साइट इंचार्ज एसके सिंह का कहना है कि प्लांट को बंद हुए अभी चार से पांच दिन ही हुए हैं और जल्द ही प्लांट चल जाएगा। प्लांट चलाने में बजट की दिक्कत आ रही है जो जल्द ही दूर हो जाएगी। लेकिन प्लांट के अंदर और बाहर पड़ी गंदगी कुछ और ही बयां कर रही है। गंदगी के ढेर बताते हैं कि प्लांट लंबे समय से बंद पड़ा है।
यह पहली बार नहीं हुआ कि प्लांट बंद हुआ हो। इससे पहले साल में कई बार प्लांट डगमगाया। कभी बिजली बिल जमा न होने से प्लांट का कनेक्शन कट गया तो कभी लेबर को वेतन न मिलने की वजह से। इस तरह के उतार चढ़ाव कई बार वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट ने देखे और अब अपनी पहली वर्षगांठ पर भी वह बंद पड़ा है। बता दें सरकार ने प्लांट का संचालन निजी कंपनी को दिया है, जिसके साथ 30 साल का करार है।
18.74 करोड़ हुए थे खर्च
गांव कैल में बने प्लांट को लगाने के लिए कुल 18.74 करोड़ रुपये खर्च आया था। इसकी क्षमता प्रतिदिन 150 टन कचरा निस्तारण करने की है। यह प्लांट आठ एकड़ दो कनाल और 13 मरले में लगा है। इसका निर्माण 2008 से शुरू हुआ था। लेकिन प्लांट बंद होने से प्लांट मेंकचरे के ढेर लग गए हैं और यह क्षेत्र भी कम पड़ने लगा है। प्लांट बंद होने से 1000 से 1500 टन के बीच कूड़ा प्लांट और आसपास पड़ा है। इससे अब आसपास के क्षेत्र में भी गंदगी के ढेर लग चुके हैं।
शहर से जा रहा 80 टन कचरा
प्लांट में तैनात कर्मचारियों की माने तो प्लांट में प्रतिदिन 70 से 80 टन कचरा आ रहा है, जबकि प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 150 टन कचरा निरस्त करने की है। लेकिन कभी किसी कारण से तो कभी किसी कारण से प्लांट बंद रहने से क्षमता से आधा कचरा भी प्लांट पर भारी पड़ने लगा है। विभिन्न कारणों से बंद रहने के साथ-साथ प्लांट बरसात के दिनों में तो अक्सर बंद ही रहता है। क्योंकि कचरा सूख नहीं पाता और प्लांट बंद ही रहता है।
किसानों को भी नहीं मिला लाभ
प्लांट लगने से जहां शहरवासियों को गंदगी से निजात मिलने का सपना दिखाया गया, वहीं किसानों को सपना दिखाया गया कि प्लांट में खाद बनेगी, जिससे किसानों को लाभ होगा। खेतों में इस खाद को डालने से फसल अच्छी होगी। हालांकि खाद बनी जरूर, लेकिन जिले के ज्यादातर किसानों ने प्लांट में बनने वाली खाद खेती में इस्तेमाल ही नहीं किया। जिससे किसानों को भी इस प्लांट से कुछ लाभ नहीं मिल पाया। इतना जरूर है कि पहले शहर का कचरा नहर और सड़कों के किनारे डाला जाता था और अब सिर्फ प्लांट में ही कचरा डाला जा रहा है।
ऐसे बनती है कचरे से खाद
प्लांट लगाने के पीछे सरकार की मंशा थी कि एक तो शहर साफ सुथरा रहेगा और कचरे से खाद बनाई जाएगी। जो खेती में काम आएगी। इससे पर्यावरण को कचरे से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा। प्लांट में आए कचरे को सबसे पहले दो महीने के लिए ऐसे ही खुले में डालकर रखा जाता है। उसके बाद उसे डेढ़ महीना सूखाने में लग जाता है। इसके बाद कचरा निरस्त मशीनों में डाल इसे खाद का रूप दे दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम तीन माह का समय लगा है।