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फैक्टरी की राख कर रही लोगों को बीमार
यमुनानगर
Updated Tue, 18 Feb 2014 11:53 PM IST
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जगाधरी की राधा कृष्ण कालोनी में एक फैक्टरी से निकलने वाली राख कालोनी के
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निवासियों को बीमार कर रही है। इस राख की वजह से लोगों को आंखों में
इंफेक्शन और सांस लेने में दिक्कत हो रही है।
इस फैक्टरी में पुराने टायरों को क्रश कर उनका तेल निकाला जाता है। फैक्टरी की चिमनी से निकलने वाली राख आसपास के रिहायशी इलाके में पहुंच रही है। मुखर्जी पार्क एक्सटेंशन की राधा कृष्ण कालोनी के करीब 50 घरों में यह राख पहुंच रही है। लोगों की छतों, आंगन और कमरों के भीतर राख आ रही है। हवा के जरिए राख के विषैले कण लोगों के शरीर में पहुंच रहे हैं। कालोना निवासियों का कहना है कि इस राख के कारण लोगों को आंखों में इंफेक्शन और सांस लेने में दिक्कत हो रही है। आंखों से लगातार पानी बहता रहता है। यह राख घरों में फर्श पर इस कदर जम चुकी है कि उसे साफ करना मुश्किल हो रहा है।
कालोनी में रहने वाले डा. अशोक ने बताया कि कुछ समय पहले वह छत पर योगा करते थे। योगा के बाद उनकी सांस फूलने लगी। उस समय उन्होंने इस पर अधिक गौर नहीं किया। एक दिन नाक साफ करते समय उसमें से बारीक काले कण निकले। इसके बाद उन्होंने छत पर एक्सरसाइज करना बंद कर दिया।
एसके शर्मा ने बताया कि छत पर तो राख आती ही है, नीचे आंगन और कमरों में भी राख पहुंच जाती है। इस राख के कारण उनके भतीजी और भतीजे की आंखों में इंफेक्शन हो गया है।
रचना शर्मा ने कहा कि राख के कारण उन्हें हर वक्त कमरे का दरवाजा बंद रखना पड़ता है। राख के कारण आंगन में बैठकर खाना नहीं खाते।
लक्ष्मी काम्बोज ने कहा कि राख के कारण उनकी बेटी की आंखों में इंफेक्शन हो गया, जिस कारण उसे चश्मा लग गया है। राख के कारण फर्श काले हो गए हैं।
आशा देवी ने कहा कि उनके घर के सभी लोगाें को सांस लेने में दिक्कत आती है। राख के कारण सर्दियों में धूप सेंकने के लिए छत पर और आंगन में भी नहीं बैठ सकते।
फैक्टरी मजूदरों पर विपरीत असर
जिस फैक्टरी में टायरों को जलाया जा रहा है, उसके पास खड़े होने से सांस लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों के शरीर पर क्या असर हो रहा है, इसका अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है। फैक्टरी के आसपास की फैक्ट्रियों में भी लोगों को सांस लेने में दिक्कत होती है। फैक्टरी में पुराने टायरों का भारी स्टाक है। इन टायरों को क्रश कर उसका तेल निकाला जाता है, जिसे ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
फेफड़ों के कैंसर का खतरा
सिविल अस्पताल यमुनानगर के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विजय दहिया ने बताया कि टायरों के जलने से जो राख उड़ती है, उससे आंखों में इंफेक्शन, सांस लेने में दिक्कत, चर्म रोग हो सकता है। अस्थमा के रोगियों के लिए राख काफी हानिकारक हो सकती है। यह राख हवा के जरिए फेफड़ों में पहुंच सकती है। यदि लंबे समय तक इसके प्रभाव में रहा जाए तो फेफड़ों का कैंसर हो सकता है।
इस फैक्टरी में पुराने टायरों को क्रश कर उनका तेल निकाला जाता है। फैक्टरी की चिमनी से निकलने वाली राख आसपास के रिहायशी इलाके में पहुंच रही है। मुखर्जी पार्क एक्सटेंशन की राधा कृष्ण कालोनी के करीब 50 घरों में यह राख पहुंच रही है। लोगों की छतों, आंगन और कमरों के भीतर राख आ रही है। हवा के जरिए राख के विषैले कण लोगों के शरीर में पहुंच रहे हैं। कालोना निवासियों का कहना है कि इस राख के कारण लोगों को आंखों में इंफेक्शन और सांस लेने में दिक्कत हो रही है। आंखों से लगातार पानी बहता रहता है। यह राख घरों में फर्श पर इस कदर जम चुकी है कि उसे साफ करना मुश्किल हो रहा है।
कालोनी में रहने वाले डा. अशोक ने बताया कि कुछ समय पहले वह छत पर योगा करते थे। योगा के बाद उनकी सांस फूलने लगी। उस समय उन्होंने इस पर अधिक गौर नहीं किया। एक दिन नाक साफ करते समय उसमें से बारीक काले कण निकले। इसके बाद उन्होंने छत पर एक्सरसाइज करना बंद कर दिया।
एसके शर्मा ने बताया कि छत पर तो राख आती ही है, नीचे आंगन और कमरों में भी राख पहुंच जाती है। इस राख के कारण उनके भतीजी और भतीजे की आंखों में इंफेक्शन हो गया है।
रचना शर्मा ने कहा कि राख के कारण उन्हें हर वक्त कमरे का दरवाजा बंद रखना पड़ता है। राख के कारण आंगन में बैठकर खाना नहीं खाते।
लक्ष्मी काम्बोज ने कहा कि राख के कारण उनकी बेटी की आंखों में इंफेक्शन हो गया, जिस कारण उसे चश्मा लग गया है। राख के कारण फर्श काले हो गए हैं।
आशा देवी ने कहा कि उनके घर के सभी लोगाें को सांस लेने में दिक्कत आती है। राख के कारण सर्दियों में धूप सेंकने के लिए छत पर और आंगन में भी नहीं बैठ सकते।
फैक्टरी मजूदरों पर विपरीत असर
जिस फैक्टरी में टायरों को जलाया जा रहा है, उसके पास खड़े होने से सांस लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों के शरीर पर क्या असर हो रहा है, इसका अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है। फैक्टरी के आसपास की फैक्ट्रियों में भी लोगों को सांस लेने में दिक्कत होती है। फैक्टरी में पुराने टायरों का भारी स्टाक है। इन टायरों को क्रश कर उसका तेल निकाला जाता है, जिसे ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
फेफड़ों के कैंसर का खतरा
सिविल अस्पताल यमुनानगर के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विजय दहिया ने बताया कि टायरों के जलने से जो राख उड़ती है, उससे आंखों में इंफेक्शन, सांस लेने में दिक्कत, चर्म रोग हो सकता है। अस्थमा के रोगियों के लिए राख काफी हानिकारक हो सकती है। यह राख हवा के जरिए फेफड़ों में पहुंच सकती है। यदि लंबे समय तक इसके प्रभाव में रहा जाए तो फेफड़ों का कैंसर हो सकता है।