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Yamuna Nagar News: क्षमा का महत्व और उपयोगिता बताई
Fri, 29 Aug 2025 12:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Fri, 29 Aug 2025 12:30 AM IST
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प्रवचन करतीं साध्वी सुचेता व अन्य। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन में चल रहे चातुर्मास के 50वें दिन महासाध्वी सुचेता महाराज ने क्षमापना दिवस पर चर्चा की। उन्होंने संगत को क्षमा का महत्व और क्षमा की जिंदगी में उपयोगिता बताई।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को, यदि वो क्षमा मांग लेता है तो छोटा महसूस नहीं करना चाहिए बल्कि यह तो वह सद्गुण है जो आपको मोक्ष के रास्ते पर ले जाने में निरंतर सहायक होता है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म और अन्य सभी धर्मों का एक ही लक्ष्य है स्वयं का, मानव का और सभी जीवों का कल्याण।
उन्होंने बताया कि जैन धर्म अपने मूल में अहिंसा, अनासक्ति और क्षमा पर बल देता है। यह प्राचीन धर्म कर्म के वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है, जहां व्यक्ति स्वयं अपना निर्माता होता है और किसी ईश्वर की सत्ता पर विश्वास नहीं करता। जैन अनुयायियों के बीच एक दैनिक अभ्यास में प्रतिक्रमण नामक अनुष्ठान के माध्यम से सभी जीवों से क्षमा मांगना शामिल है। महासाध्वी ने कहा कि जैन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक पर्युषण है, जिसे दशलक्षण धर्म के नाम से भी जाना जाता है। भाद्रपद माह के दौरान भक्तिपूर्वक मनाया जाने वाला यह त्योहार दस मौलिक गुणों पर केंद्रित है। पर्युषण के दौरान, जैन धर्म अनुयायियों को इन मूलभूत गुणों के प्रकाश में अपने आचरण पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है। पर्युषण का समापन आश्विन कृष्ण एकम को क्षमावाणी नामक एक विशेष पर्व के साथ होता है।
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इसे क्षमा दिवस के रूप में भी जाना जाता है, इस दिन जैन अनुयायी बिना किसी झिझक के एक-दूसरे से ज्ञात और अज्ञात गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं। यह आध्यात्मिक सुधार का पर्व है, जो मन, वचन और कर्म में क्षमा की शक्ति का प्रतीक है।
दशलक्षण धर्म उत्तम क्षमा धर्म से शुरू होता है और कुछ दिनों बाद क्षमावाणी के साथ समाप्त होता है।
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यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन में चल रहे चातुर्मास के 50वें दिन महासाध्वी सुचेता महाराज ने क्षमापना दिवस पर चर्चा की। उन्होंने संगत को क्षमा का महत्व और क्षमा की जिंदगी में उपयोगिता बताई।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को, यदि वो क्षमा मांग लेता है तो छोटा महसूस नहीं करना चाहिए बल्कि यह तो वह सद्गुण है जो आपको मोक्ष के रास्ते पर ले जाने में निरंतर सहायक होता है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म और अन्य सभी धर्मों का एक ही लक्ष्य है स्वयं का, मानव का और सभी जीवों का कल्याण।
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उन्होंने बताया कि जैन धर्म अपने मूल में अहिंसा, अनासक्ति और क्षमा पर बल देता है। यह प्राचीन धर्म कर्म के वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है, जहां व्यक्ति स्वयं अपना निर्माता होता है और किसी ईश्वर की सत्ता पर विश्वास नहीं करता। जैन अनुयायियों के बीच एक दैनिक अभ्यास में प्रतिक्रमण नामक अनुष्ठान के माध्यम से सभी जीवों से क्षमा मांगना शामिल है। महासाध्वी ने कहा कि जैन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक पर्युषण है, जिसे दशलक्षण धर्म के नाम से भी जाना जाता है। भाद्रपद माह के दौरान भक्तिपूर्वक मनाया जाने वाला यह त्योहार दस मौलिक गुणों पर केंद्रित है। पर्युषण के दौरान, जैन धर्म अनुयायियों को इन मूलभूत गुणों के प्रकाश में अपने आचरण पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है। पर्युषण का समापन आश्विन कृष्ण एकम को क्षमावाणी नामक एक विशेष पर्व के साथ होता है।
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इसे क्षमा दिवस के रूप में भी जाना जाता है, इस दिन जैन अनुयायी बिना किसी झिझक के एक-दूसरे से ज्ञात और अज्ञात गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं। यह आध्यात्मिक सुधार का पर्व है, जो मन, वचन और कर्म में क्षमा की शक्ति का प्रतीक है।
दशलक्षण धर्म उत्तम क्षमा धर्म से शुरू होता है और कुछ दिनों बाद क्षमावाणी के साथ समाप्त होता है।