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Yamuna Nagar News: बीमा कंपनी को 2.97 लाख रुपये अदा करने का आदेश
Sat, 18 Jul 2026 01:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Sat, 18 Jul 2026 01:00 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। जिला उपभोक्ता आयोग ने स्वास्थ्य दावा खारिज करने के मामले में केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड को झटका देते हुए बीमाधारक के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने कंपनी को राजीव सुशील गोयल को 2.97 लाख रुपये का बीमा दावा सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करने का आदेश दिया है।
साथ ही मानसिक प्रताड़ना एवं वाद खर्च के लिए 11 हजार रुपये भी देने के निर्देश दिए हैं। शिकायतकर्ता राजीव सुशील गोयल ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2021 में पंजाब नेशनल बैंक के माध्यम से केयर हेल्थ इंश्योरेंस की फैमिली हेल्थ पॉलिसी ली थी, जिसका लगातार नवीनीकरण कराया गया। दिसंबर 2023 में सीने में दर्द होने पर पंचकूला के ओजस अस्पताल में उनका एंजियोग्राफी और स्टेंट डालने का उपचार हुआ, जिस पर 2.97 लाख रुपये का खर्च आया।
बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि उन्होंने पॉलिसी लेते समय पहले से मौजूद बीमारी की जानकारी छिपाई थी। आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि बीमा कंपनी इस आरोप के समर्थन में कोई ठोस चिकित्सीय रिकॉर्ड या प्रस्ताव पत्र प्रस्तुत नहीं कर सकी। कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि शिकायतकर्ता को पॉलिसी लेने से पहले बीमारी थी।
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यमुनानगर। जिला उपभोक्ता आयोग ने स्वास्थ्य दावा खारिज करने के मामले में केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड को झटका देते हुए बीमाधारक के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने कंपनी को राजीव सुशील गोयल को 2.97 लाख रुपये का बीमा दावा सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करने का आदेश दिया है।
साथ ही मानसिक प्रताड़ना एवं वाद खर्च के लिए 11 हजार रुपये भी देने के निर्देश दिए हैं। शिकायतकर्ता राजीव सुशील गोयल ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2021 में पंजाब नेशनल बैंक के माध्यम से केयर हेल्थ इंश्योरेंस की फैमिली हेल्थ पॉलिसी ली थी, जिसका लगातार नवीनीकरण कराया गया। दिसंबर 2023 में सीने में दर्द होने पर पंचकूला के ओजस अस्पताल में उनका एंजियोग्राफी और स्टेंट डालने का उपचार हुआ, जिस पर 2.97 लाख रुपये का खर्च आया।
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बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि उन्होंने पॉलिसी लेते समय पहले से मौजूद बीमारी की जानकारी छिपाई थी। आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि बीमा कंपनी इस आरोप के समर्थन में कोई ठोस चिकित्सीय रिकॉर्ड या प्रस्ताव पत्र प्रस्तुत नहीं कर सकी। कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि शिकायतकर्ता को पॉलिसी लेने से पहले बीमारी थी।
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