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Yamuna Nagar News: होम लोन में गड़बड़ी की, अब एसबीआई को लौटाने होंगे 23.24 लाख
Thu, 14 May 2026 01:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Thu, 14 May 2026 01:44 AM IST
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जिला उपभोक्ता आयोग। आर्काइव
संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को मॉडल कॉलोनी निवासी हेमंत कुमार शाहपुरी और उनकी पत्नी कविता शाहपुरी को 23.24 लाख रुपये लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि बैंक ने शिकायतकर्ताओं की सहमति के बिना होम लोन की अवधि 20 वर्ष से बढ़ाकर पहले 30 वर्ष और बाद में 37 वर्ष कर दी, जो सेवा में कमी और अनुचित की श्रेणी में आता है।
आयोग ने बैंक को मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 11 हजार रुपये अतिरिक्त देने के भी निर्देश दिए हैं। आदेश का पालन 45 दिनों में नहीं होने पर बैंक को 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। आयोग के सहायक रजिस्ट्रार नीरज वालिया ने बताया कि हेमंत कुमार व कविता ने वर्ष 2009 में एसबीआई की रेलवे रोड शाखा से 46.82 लाख रुपये का होम लोन लिया था। यह ऋण 20 वर्षों की अवधि के लिए स्वीकृत हुआ था और इसकी 240 मासिक किश्तें तय की गई थीं। शुरुआत में ब्याज दर पहले वर्ष 8 प्रतिशत और अगले दो वर्षों के लिए 9 प्रतिशत निर्धारित थी।
शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि बैंक ने उनकी जानकारी और सहमति के बिना लोन अवधि को पहले 30 वर्ष और बाद में 37 वर्ष तक बढ़ा दिया। इसके साथ ही ईएमआई और ब्याज दर में भी बदलाव कर दिया गया। शिकायतकर्ताओं ने दावा किया कि वे नियमित रूप से किश्तें जमा करते रहे और कभी डिफॉल्टर नहीं रहे।
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आयोग के समक्ष बैंक ने दलील दी कि शिकायतकर्ताओं ने स्वयं वर्ष 2014 में आवेदन देकर लोन अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया था। बैंक ने एक पत्र प्रस्तुत किया, लेकिन आयोग ने पाया कि उक्त दस्तावेज टाइप किया हुआ था, जबकि अवधि और ब्याज संबंधी महत्वपूर्ण हिस्से हाथ से लिखे हुए थे। उन हस्त लिखित अंशों पर शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर भी नहीं थे। आयोग ने यह भी पाया कि पत्र पर बैंक की मुहर, रसीद संख्या या सह-ऋणकर्ताओं की सहमति मौजूद नहीं थी।
आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई विश्वसनीय दस्तावेज नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ताओं ने 20 वर्ष की अवधि बढ़ाकर 30 या 37 वर्ष करने की अनुमति दी थी। आयोग ने यह भी माना कि बैंक यह स्पष्ट करने में विफल रहा कि आखिर 444 किश्तों का आंकड़ा किस आधार पर तय किया गया।
सुनवाई के दौरान आयोग ने बैंक के खाते के विवरण का भी परीक्षण किया। आयोग के अनुसार शिकायतकर्ताओं ने वर्ष 2009 से जुलाई 2025 तक नियमित किश्तें जमा कीं। ईएमआई चार्ट के अनुसार जुलाई 2025 तक बकाया राशि लगभग 18.17 लाख रुपये होनी चाहिए थी, लेकिन बैंक ने 41.28 लाख रुपये बकाया दिखा दिए।
आयोग ने इस अंतर पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि नियमित भुगतान के बावजूद मूलधन में अपेक्षित कमी नहीं होना बैंकिंग प्रक्रिया पर संदेह पैदा करता है। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि शिकायतकर्ताओं ने 17 जुलाई 2025 को 40 लाख रुपये, 21 जुलाई को 44,349 रुपये और 22 जुलाई को 97,370 रुपये जमा कर ऋण खाता बंद कराया।
बैंक ने 22 जुलाई 2025 को नो ड्यूज सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया था। इसके बावजूद बाद में अतिरिक्त ब्याज की मांग की गई, जिसे आयोग ने अनुचित माना। आयोग ने कहा कि बैंक शिकायतकर्ताओं की शिकायतों का समाधान करने में भी विफल रहा। शिकायतकर्ताओं ने आरबीआई, सार्वजनिक शिकायत पोर्टल और बैंक अधिकारियों को कई शिकायतें भेजीं, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। हालांकि आयोग ने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस के खिलाफ कोई ठोस आरोप न मिलने पर उसके विरुद्ध शिकायत खारिज कर दी। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि एसबीआई द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया से शिकायतकर्ताओं को अनावश्यक मानसिक पीड़ा और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसलिए बैंक को 23,24,423 रुपये लौटाने और 11 हजार रुपये क्षतिपूर्ति देने के निर्देश दिए गए हैं।
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यमुनानगर। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को मॉडल कॉलोनी निवासी हेमंत कुमार शाहपुरी और उनकी पत्नी कविता शाहपुरी को 23.24 लाख रुपये लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि बैंक ने शिकायतकर्ताओं की सहमति के बिना होम लोन की अवधि 20 वर्ष से बढ़ाकर पहले 30 वर्ष और बाद में 37 वर्ष कर दी, जो सेवा में कमी और अनुचित की श्रेणी में आता है।
आयोग ने बैंक को मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 11 हजार रुपये अतिरिक्त देने के भी निर्देश दिए हैं। आदेश का पालन 45 दिनों में नहीं होने पर बैंक को 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। आयोग के सहायक रजिस्ट्रार नीरज वालिया ने बताया कि हेमंत कुमार व कविता ने वर्ष 2009 में एसबीआई की रेलवे रोड शाखा से 46.82 लाख रुपये का होम लोन लिया था। यह ऋण 20 वर्षों की अवधि के लिए स्वीकृत हुआ था और इसकी 240 मासिक किश्तें तय की गई थीं। शुरुआत में ब्याज दर पहले वर्ष 8 प्रतिशत और अगले दो वर्षों के लिए 9 प्रतिशत निर्धारित थी।
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शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि बैंक ने उनकी जानकारी और सहमति के बिना लोन अवधि को पहले 30 वर्ष और बाद में 37 वर्ष तक बढ़ा दिया। इसके साथ ही ईएमआई और ब्याज दर में भी बदलाव कर दिया गया। शिकायतकर्ताओं ने दावा किया कि वे नियमित रूप से किश्तें जमा करते रहे और कभी डिफॉल्टर नहीं रहे।
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आयोग के समक्ष बैंक ने दलील दी कि शिकायतकर्ताओं ने स्वयं वर्ष 2014 में आवेदन देकर लोन अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया था। बैंक ने एक पत्र प्रस्तुत किया, लेकिन आयोग ने पाया कि उक्त दस्तावेज टाइप किया हुआ था, जबकि अवधि और ब्याज संबंधी महत्वपूर्ण हिस्से हाथ से लिखे हुए थे। उन हस्त लिखित अंशों पर शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर भी नहीं थे। आयोग ने यह भी पाया कि पत्र पर बैंक की मुहर, रसीद संख्या या सह-ऋणकर्ताओं की सहमति मौजूद नहीं थी।
आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई विश्वसनीय दस्तावेज नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ताओं ने 20 वर्ष की अवधि बढ़ाकर 30 या 37 वर्ष करने की अनुमति दी थी। आयोग ने यह भी माना कि बैंक यह स्पष्ट करने में विफल रहा कि आखिर 444 किश्तों का आंकड़ा किस आधार पर तय किया गया।
सुनवाई के दौरान आयोग ने बैंक के खाते के विवरण का भी परीक्षण किया। आयोग के अनुसार शिकायतकर्ताओं ने वर्ष 2009 से जुलाई 2025 तक नियमित किश्तें जमा कीं। ईएमआई चार्ट के अनुसार जुलाई 2025 तक बकाया राशि लगभग 18.17 लाख रुपये होनी चाहिए थी, लेकिन बैंक ने 41.28 लाख रुपये बकाया दिखा दिए।
आयोग ने इस अंतर पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि नियमित भुगतान के बावजूद मूलधन में अपेक्षित कमी नहीं होना बैंकिंग प्रक्रिया पर संदेह पैदा करता है। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि शिकायतकर्ताओं ने 17 जुलाई 2025 को 40 लाख रुपये, 21 जुलाई को 44,349 रुपये और 22 जुलाई को 97,370 रुपये जमा कर ऋण खाता बंद कराया।
बैंक ने 22 जुलाई 2025 को नो ड्यूज सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया था। इसके बावजूद बाद में अतिरिक्त ब्याज की मांग की गई, जिसे आयोग ने अनुचित माना। आयोग ने कहा कि बैंक शिकायतकर्ताओं की शिकायतों का समाधान करने में भी विफल रहा। शिकायतकर्ताओं ने आरबीआई, सार्वजनिक शिकायत पोर्टल और बैंक अधिकारियों को कई शिकायतें भेजीं, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। हालांकि आयोग ने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस के खिलाफ कोई ठोस आरोप न मिलने पर उसके विरुद्ध शिकायत खारिज कर दी। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि एसबीआई द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया से शिकायतकर्ताओं को अनावश्यक मानसिक पीड़ा और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसलिए बैंक को 23,24,423 रुपये लौटाने और 11 हजार रुपये क्षतिपूर्ति देने के निर्देश दिए गए हैं।