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Yamuna Nagar News: मिट्टी के टीले पर जूते मार राजा संध को सजा देते हैं श्रद्धालु

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 25 Nov 2023 01:42 AM IST
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Devotees punish Raja Sandh by hitting the soil mound with their shoes.
कपालमोचन। कपालमोचन मेले में आने वाले श्रद्धालु यहां तीनों कपालमोचन, ऋणमोचन व सूरजकुंड सरोवरों में डुबकी लगाकर आस्था तो जताते हैं ही, वहीं इस मेले को लेकर एक अजीबोगरीब मान्यता भी है। श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने के बाद यहां से पांच से छह किमी दूर संधाय गांव में पहुंचते हैं। यहां पर वे राजा संध के बने टीले पर जूते, चप्पल मार कर उसे सजा भी देते हैं। इतना ही नहीं श्रद्धालु गालियां के अलावा इस टीले को पत्थर भी मारते हैं। इसके बाद श्रद्धालु टीले के सामने गुरुद्वारे में माथा टेकने जाते हैं। टीले से थोड़ी ही दूरी पर सती माता मंदिर में भी श्रद्धालुओं की आस्था है। इस मंदिर के बाहर मेला भी लगाया जाता है। ----------------
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महाभारत के समय में राजा जरासंध का था किला
पौराणिक कथा के अनुसार संधाए गांव में महाभारत के समय में राजा जरासंध का किला था। यह राजा शादी की डोलियां लूटकर नवविवाहितों की इज्जत से खिलवाड़ करता था। राजा के मरने के बाद यहां पर लोग आने लगे और राजा के किले को जूता मारने लगे। जिसके बाद से यह प्रथा चली रही है। कथा के अनुसार यह कभी राजा संध का महल हुआ करता था। एक सती के श्राप के कारण वह किला मिट्टी में तब्दील हो गया। मान्यता है राजा संध से
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जनता परेशान थी। एक दिन राजा संध ने एक ऋषि कन्या सती ग्यासनी देवी पर कुदृष्टि डाली। वह उसे उठाकर अपने महल में ले गया था, लेकिन वह स्नान करने का बहाना बनाकर महल से भाग निकली। ग्यासनी देवी ने उसे श्राप दिया कि जिस महल में वह सुहागिनों की इज्जत से खिलवाड़ करता है वह जल्द ही बर्बाद हो जाएगा। राजा से बचने के लिए वह महल के पास बने तालाब में सती हो गई। श्राप के कारण महल खंडहर में तब्दील हो गया। उसके बाद से लोग इस अधर्मी राजा के किले के खंडहर पर आते हैं और जूते मारते हैं।
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पगडंडी और ऑटो के माध्यम यहां पहुंचते हैं श्रद्धालु
हालांकि संधाय गांव में बना यह टीला कपालमोचन से पांच व छह किलोमीटर दूर है। लेकिन बाद भी श्रद्धालु इस टीले को जूते, चप्पल व पत्थर मारने के लिए पैदल खेतों की पगडंडी या फिर ऑटो तक यहां पहुंचते हैं। वहीं बठिंडा से आए चरण सिंह व अवतार सिंह ने बताया कि वे पिछले छह साल से कपालमोचन मेले में आ रहे हैं। सरोवरों में स्नान करने के बाद वे इस टीले पर जरूर पहुंचते हैं। उन्होंने बताया मान्यता है मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा तभी पूरी होती है। जब वह इस टीले पर आकर जूते मारते हैं।
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