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Yamuna Nagar News: सत्संग में उजागर किए जीवन के गहन सूत्र
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संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में साध्वी नीरू भारती ने मानवीय जीवन के कुछ गहन सूत्रों को उजागर करते हुए कहा कि केवल मानव तन की प्राप्ति हो जाना मानव बनने के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि मानवीय मूल्यों के अभाव में एक मनुष्य केवल पाशविक प्रवृत्ति में आसक्त होकर ही जीवन को व्यर्थ बिता देता है।
मानव को मानव बनाने के लिए कई पाठशालाएं समाज में निर्मित हुई हैं लेकिन मनुष्य को दानव बनाने के लिए कोई भी पाठशाला नहीं है, फिर भी मनुष्य के आचरण में दुर्गुणों का विस्तार हो जाता है।
साध्वी भारती ने समझाया कि जैसे प्रकाश स्रोत का अभाव होने पर अंधेरा स्वतः ही प्रकट हो जाता है। जैसे अंधेरे का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, इसी प्रकार मनुष्य के आचरण में समाए हुए दुर्गुणों का भी अपना कोई अस्तित्व नहीं है। सदाचरण के अभाव में दुष्ट आचरण अपने आप ही जीवन में उतर जाता है। स्वयं को काम वासना से दूर रखते हुए संयम में बांध लेना ही केवल सदाचार नहीं होता बल्कि जब हमारा व्यक्तित्व, आचरण और व्यवहार संपूर्ण अस्तित्व के लिए परोपकारी एवं समर्पित हो तभी ऐसे जीवन को ही पूर्ण रूप से सदाचारी की संज्ञा दी जा सकती है।
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साध्वी ने कहा कि सदाचरण मनुष्य का वह दैवीय गुण है जो प्रकृति की सभी सकारात्मक एवं दिव्य शक्तियों को एक साधारण से मनुष्य का दास बनने के लिए बाध्य कर देता है। हमारे संत महापुरुष कहते हैं कि एक सदाचारी मनुष्य के लिए संपूर्ण सृष्टि में कुछ भी प्राप्त करना असंभव नहीं है क्योंकि एक सदाचारी मनुष्य धरती पर दैवीय स्वरूप होकर विचरण करता है।
सदाचार का मार्ग तप, त्याग एवं तितिक्षा का मार्ग है जिसका अनुसरण वह साधक सहज रूप से कर लेता है जो निरंतर गुरु आज्ञा में चलते हुए अपने जीवन का निर्वाह करता हो क्योंकि जो अपने जीवन को सदाचार में बांध सकता है वो ही अपने जीवन को सकारात्मक रूप से परिवर्तित कर सकता है।
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जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में साध्वी नीरू भारती ने मानवीय जीवन के कुछ गहन सूत्रों को उजागर करते हुए कहा कि केवल मानव तन की प्राप्ति हो जाना मानव बनने के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि मानवीय मूल्यों के अभाव में एक मनुष्य केवल पाशविक प्रवृत्ति में आसक्त होकर ही जीवन को व्यर्थ बिता देता है।
मानव को मानव बनाने के लिए कई पाठशालाएं समाज में निर्मित हुई हैं लेकिन मनुष्य को दानव बनाने के लिए कोई भी पाठशाला नहीं है, फिर भी मनुष्य के आचरण में दुर्गुणों का विस्तार हो जाता है।
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साध्वी भारती ने समझाया कि जैसे प्रकाश स्रोत का अभाव होने पर अंधेरा स्वतः ही प्रकट हो जाता है। जैसे अंधेरे का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, इसी प्रकार मनुष्य के आचरण में समाए हुए दुर्गुणों का भी अपना कोई अस्तित्व नहीं है। सदाचरण के अभाव में दुष्ट आचरण अपने आप ही जीवन में उतर जाता है। स्वयं को काम वासना से दूर रखते हुए संयम में बांध लेना ही केवल सदाचार नहीं होता बल्कि जब हमारा व्यक्तित्व, आचरण और व्यवहार संपूर्ण अस्तित्व के लिए परोपकारी एवं समर्पित हो तभी ऐसे जीवन को ही पूर्ण रूप से सदाचारी की संज्ञा दी जा सकती है।
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साध्वी ने कहा कि सदाचरण मनुष्य का वह दैवीय गुण है जो प्रकृति की सभी सकारात्मक एवं दिव्य शक्तियों को एक साधारण से मनुष्य का दास बनने के लिए बाध्य कर देता है। हमारे संत महापुरुष कहते हैं कि एक सदाचारी मनुष्य के लिए संपूर्ण सृष्टि में कुछ भी प्राप्त करना असंभव नहीं है क्योंकि एक सदाचारी मनुष्य धरती पर दैवीय स्वरूप होकर विचरण करता है।
सदाचार का मार्ग तप, त्याग एवं तितिक्षा का मार्ग है जिसका अनुसरण वह साधक सहज रूप से कर लेता है जो निरंतर गुरु आज्ञा में चलते हुए अपने जीवन का निर्वाह करता हो क्योंकि जो अपने जीवन को सदाचार में बांध सकता है वो ही अपने जीवन को सकारात्मक रूप से परिवर्तित कर सकता है।