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दोषी पत्नी और उसके प्रेमी को तीन साल कैद
अमर उजाला ब्यूरो, यमुनानगर
Updated Mon, 03 Aug 2015 12:12 AM IST
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आईटीआई यमुनानगर में कार्यरत एक गेस्ट टीचर को आत्महत्या के लिए मजबूर करने की दोषी पत्नी तथा उसके प्रेमी (पत्नी का प्रेमी) को कोर्ट ने तीन साल कैद तथा तीन-तीन हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। यह फैसला जिला एवं सत्र न्यायाधीश सरिता गुप्ता की कोर्ट ने सुनाया है।
करीब तीन साल चली सुनवाई के दौरान आधा दर्जन से ज्यादा लोगों की गवाही हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। फिलहाल दोनों दोषी जमानत पर रिहा हो गए हैं और हाईकोर्ट में अपील करने के लिए इनके पास एक महीना का समय है।
शिकायतकर्ता अशोक विहार कांसापुर रोड निवासी कर्ता राम के वकील सुरेंद्र आहूजा ने बताया कि पीड़ित के पिता द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर कोर्ट ने उपरोक्त फैसला सुनाया है।
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यह था मामला : एडवोकेट सुरेंद्र आहूजा ने बताया कि कर्ता राम का बेटा प्रवीण कुमार यमुनानगर आईटीआई में गेस्ट टीचर लगा हुआ था। जबकि आईटीआई कॉलोनी निवासी मोहन लाल (55) पहले से ही आईटीआई में बतौर इंस्ट्रक्टर तैनात था। शिकायतकर्ता के मुताबिक मोहन लाल ने उसकी पुत्रवधू को लालच देकर अपने प्रेम जाल में फंसा लिया। जिसके बाद रितु ने उनका घर छोड़कर मोहन लाल के घर रहना शुरू कर दिया।
इसी बीच उन दोनों के बीच संबंध भी स्थापित हो गए। 3 सितंबर, 2012 को वह बेटी के घर गया था। जहां उसे पता चला कि उसके बेटे प्रवीण का शव शिवपुरी-बी स्थित सैनी आटा चक्की के पास पड़ा है। जब वह मौके पर पहुंचा, तो वहां पर पीसीआर खड़ी थी। जहर खाने की वजह से उसके बेटे की मौत हुई थी। साथ ही उन्हें एक सुसाइड नोट भी मिला था।
प्रवीण कुमार ने अपनी पत्नी रितु तथा उसके प्रेमी मोहन लाल के डर के कारण जान दी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश सरिता गुप्ता ने रितु (मृतक की पत्नी) तथा उसके प्रेमी मोहन लाल को भादंसं की धारा 306 के तहत दोषी करार देते हुए तीन-तीन साल कैद तथा तीन हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। फिलहाल कोर्ट ने दोनों दोषियों को जमानत पर रिहा कर दिया है। साथ ही उन्होंने जुर्माना अदा कर दिया है।
पुलिस ने उस समय की थी 174 के तहत कार्रवाई
कर्ता राम के मुताबिक वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है। इसलिए उसे कानूनी दांव-पेच के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। 3 सितंबर, 2012 को पुलिस ने उसके बेटे के शव को कब्जे में लिया और भादंसं की धारा 174 के तहत कार्रवाई कर उसे शव सौंप दिया। हालांकि मरने से पहले उसके बेटे ने एक सुसाइड नोट भी लिखा था, जिसमें उसने अपनी मौत के लिए अपनी पत्नी रितु तथा उसके प्रेमी मोहन लाल को जिम्मेदार ठहराया। बावजूद इसके पुलिस ने कोई केस दर्ज नहीं किया।
बूढ़ी आंखों में टिकी रही इंसाफ की उम्मीद
कर्ता राम (72) ने अपने मृतक बेटे प्रवीण कुमार को इंसाफ दिलाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाईं। एक बार केस खारिज होने के बाद भी उसने अपने हौसले को डगमगाने नहीं दिया और बेटे को इंसाफ दिलाकर ही दम लिया। कोर्ट में करीब तीन साल चली सुनवाई के दौरान कर्ता राम को कई तरह के दबाव भी झलने पड़े।
अमर उजाला से बातचीत में कर्ता राम ने बताया कि जब उसने अपने मृतक बेटे प्रवीण कुमार को इंसाफ दिलाने के लिए कोर्ट में शिकायत डाली, तो उनके पास वकील को देने के लिए फीस भी नहीं थी। एक जानकार ने अपने एडवोकेट भाई से उनके केस को लड़ने का आग्रह किया।
तब उम्मीद बंधी की अब इंसाफ मिल जाएगा। सुनवाई के दौरान एक बार जब एक जज ने उनके केस को डिसमिस कर दिया तो आश टूटती नजर आईं। कर्ता राम के मुताबिक जिस समय केस को डिसमिस किया गया, तब तक विसरा रिपोर्ट का नतीजा नहीं आया था। उन्होंने अपने वकील से आग्रह किया कि वे रिव्यू लेकर केस फाइल करें। जिसके बाद फिर से मामले की सुनवाई शुरू हो गई।
कर्ता राम के मुताबिक उसे घर के अलावा बाहर कहीं रोटी खाने की आदत नहीं है। सुनवाई के दौरान वह सुबह घर से खाना खा कर जाता और शाम को घर पर ही आकर फिर से खाना खाता था। बेटे की मौत के बाद उन्होंने बहू को समझाया कि उसकी चार बेटियां हैं, वह भी पांचवीं बेटी बनकर घर रह सकती है लेकिन उसने बात नहीं मानी।
बहू ने डाला था दहेज का केस
कर्ता राम के मुताबिक उसने अपने मकान का दो लाख रुपये बयाना लिया था। जिसके बाद बहू ने उससे पैसे मांगने शुरू कर दिए। जब उसने उसे पैसे देने से इंकार कर दिया, तो बहू ने उस पर कोर्ट में दहेज केस भी डाल दिया। केस की सुनवाई के दौरान उसके बेटे ने कोर्ट में कहा कि वह अपनी पूरी सैलरी अपनी पत्नी को देने के लिए तैयार है, बशर्ते वह उनके साथ आकर रहे। कर्ता राम के मुताबिक एक बार उसने 45 हजार रुपये बैंक से निकालकर अपनी पुत्रवधू को इलाज के लिए दिए थे जिसकी रसीद उसने कोर्ट में दिखाई। रिश्तेदारों द्वारा बीच पड़ने के बाद इस केस में समझौते के बाद उन्हें बरी कर दिया गया।
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करीब तीन साल चली सुनवाई के दौरान आधा दर्जन से ज्यादा लोगों की गवाही हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। फिलहाल दोनों दोषी जमानत पर रिहा हो गए हैं और हाईकोर्ट में अपील करने के लिए इनके पास एक महीना का समय है।
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शिकायतकर्ता अशोक विहार कांसापुर रोड निवासी कर्ता राम के वकील सुरेंद्र आहूजा ने बताया कि पीड़ित के पिता द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर कोर्ट ने उपरोक्त फैसला सुनाया है।
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यह था मामला : एडवोकेट सुरेंद्र आहूजा ने बताया कि कर्ता राम का बेटा प्रवीण कुमार यमुनानगर आईटीआई में गेस्ट टीचर लगा हुआ था। जबकि आईटीआई कॉलोनी निवासी मोहन लाल (55) पहले से ही आईटीआई में बतौर इंस्ट्रक्टर तैनात था। शिकायतकर्ता के मुताबिक मोहन लाल ने उसकी पुत्रवधू को लालच देकर अपने प्रेम जाल में फंसा लिया। जिसके बाद रितु ने उनका घर छोड़कर मोहन लाल के घर रहना शुरू कर दिया।
इसी बीच उन दोनों के बीच संबंध भी स्थापित हो गए। 3 सितंबर, 2012 को वह बेटी के घर गया था। जहां उसे पता चला कि उसके बेटे प्रवीण का शव शिवपुरी-बी स्थित सैनी आटा चक्की के पास पड़ा है। जब वह मौके पर पहुंचा, तो वहां पर पीसीआर खड़ी थी। जहर खाने की वजह से उसके बेटे की मौत हुई थी। साथ ही उन्हें एक सुसाइड नोट भी मिला था।
प्रवीण कुमार ने अपनी पत्नी रितु तथा उसके प्रेमी मोहन लाल के डर के कारण जान दी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश सरिता गुप्ता ने रितु (मृतक की पत्नी) तथा उसके प्रेमी मोहन लाल को भादंसं की धारा 306 के तहत दोषी करार देते हुए तीन-तीन साल कैद तथा तीन हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। फिलहाल कोर्ट ने दोनों दोषियों को जमानत पर रिहा कर दिया है। साथ ही उन्होंने जुर्माना अदा कर दिया है।
पुलिस ने उस समय की थी 174 के तहत कार्रवाई
कर्ता राम के मुताबिक वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है। इसलिए उसे कानूनी दांव-पेच के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। 3 सितंबर, 2012 को पुलिस ने उसके बेटे के शव को कब्जे में लिया और भादंसं की धारा 174 के तहत कार्रवाई कर उसे शव सौंप दिया। हालांकि मरने से पहले उसके बेटे ने एक सुसाइड नोट भी लिखा था, जिसमें उसने अपनी मौत के लिए अपनी पत्नी रितु तथा उसके प्रेमी मोहन लाल को जिम्मेदार ठहराया। बावजूद इसके पुलिस ने कोई केस दर्ज नहीं किया।
बूढ़ी आंखों में टिकी रही इंसाफ की उम्मीद
कर्ता राम (72) ने अपने मृतक बेटे प्रवीण कुमार को इंसाफ दिलाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाईं। एक बार केस खारिज होने के बाद भी उसने अपने हौसले को डगमगाने नहीं दिया और बेटे को इंसाफ दिलाकर ही दम लिया। कोर्ट में करीब तीन साल चली सुनवाई के दौरान कर्ता राम को कई तरह के दबाव भी झलने पड़े।
अमर उजाला से बातचीत में कर्ता राम ने बताया कि जब उसने अपने मृतक बेटे प्रवीण कुमार को इंसाफ दिलाने के लिए कोर्ट में शिकायत डाली, तो उनके पास वकील को देने के लिए फीस भी नहीं थी। एक जानकार ने अपने एडवोकेट भाई से उनके केस को लड़ने का आग्रह किया।
तब उम्मीद बंधी की अब इंसाफ मिल जाएगा। सुनवाई के दौरान एक बार जब एक जज ने उनके केस को डिसमिस कर दिया तो आश टूटती नजर आईं। कर्ता राम के मुताबिक जिस समय केस को डिसमिस किया गया, तब तक विसरा रिपोर्ट का नतीजा नहीं आया था। उन्होंने अपने वकील से आग्रह किया कि वे रिव्यू लेकर केस फाइल करें। जिसके बाद फिर से मामले की सुनवाई शुरू हो गई।
कर्ता राम के मुताबिक उसे घर के अलावा बाहर कहीं रोटी खाने की आदत नहीं है। सुनवाई के दौरान वह सुबह घर से खाना खा कर जाता और शाम को घर पर ही आकर फिर से खाना खाता था। बेटे की मौत के बाद उन्होंने बहू को समझाया कि उसकी चार बेटियां हैं, वह भी पांचवीं बेटी बनकर घर रह सकती है लेकिन उसने बात नहीं मानी।
बहू ने डाला था दहेज का केस
कर्ता राम के मुताबिक उसने अपने मकान का दो लाख रुपये बयाना लिया था। जिसके बाद बहू ने उससे पैसे मांगने शुरू कर दिए। जब उसने उसे पैसे देने से इंकार कर दिया, तो बहू ने उस पर कोर्ट में दहेज केस भी डाल दिया। केस की सुनवाई के दौरान उसके बेटे ने कोर्ट में कहा कि वह अपनी पूरी सैलरी अपनी पत्नी को देने के लिए तैयार है, बशर्ते वह उनके साथ आकर रहे। कर्ता राम के मुताबिक एक बार उसने 45 हजार रुपये बैंक से निकालकर अपनी पुत्रवधू को इलाज के लिए दिए थे जिसकी रसीद उसने कोर्ट में दिखाई। रिश्तेदारों द्वारा बीच पड़ने के बाद इस केस में समझौते के बाद उन्हें बरी कर दिया गया।