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छात्र पढ़ रहे सीनियर कक्षाओं की किताबें
कैथ्ाल
Updated Thu, 19 Sep 2013 11:44 PM IST
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हरियाणा के जिले कैथल के अधिकतर निजी स्कूलों में शिक्षा विभाग की अनदेखी के चलते एक विद्यार्थी दो-दो वर्ष तक एक ही कक्षा की पुस्तकें पढ़ते हैं।
बोर्ड की परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लालच में बच्चों को दो-दो साल तक एक ही सिलेबस की पुस्तकों को रटाया जाता है। लेकिन विभाग का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।
निजी स्कूल संचालक स्कूलों में कक्षा नौंवी में दसवीं और कक्षा ग्याहरवीं में बाहरवीं की पुस्तकें लगाकर बोर्ड की परीक्षाओं के लिए तैयारी करते हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों के उन बच्चों के लिए प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना स्वाभाविक है, जो अपनी ही कक्षाओं की पुस्तकें पढ़ते हैं।
दो स्कूलों में चल रहा है गोरखधंधा
जिले में करीब 200 निजी स्कूलों में कक्षा नौवीं में दसवीं व कक्षा ग्याहरवीं में बाहरवीं की पुस्तकें पढ़ाई जाती है। शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार कई अधिकारियों की जानकारी में होने के बावजूद इस बारे में कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
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निजी स्कूल संचालकों द्वारा दो-दो वर्षों तक एक ही पुस्तक विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए शिक्षा का स्तर गिर रहा है। विद्यार्थियों को आधार मजबूत करने के लिए कक्षा नौंवी व ग्याहरवीं की पुस्तकों से वंचित रखा जाता है।
इसके कारण विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने बजाए, पुस्तकों से रट्टा लगाना अधिक पसंद करता है। दूसरा पुस्तकों को रटने से निजी स्कूलों के विद्यार्थियों का परिणाम तो अच्छा आता है, लेकिन सरकारी स्कूलों के बच्चे पिछड़ जाते हैं।
बच्चों का नुकसान
बोर्ड ने नई शिक्षा नीति के तहत कक्षा दसवीं और कक्षा बारहवीं के प्रथम सेमेस्टर परीक्षा स्कूल में ही लिए जाने का निर्णय किया है। ऐसे में अब निजी स्कूल संचालक दो साल में से डेढ़ साल तक केवल उसी सेमेस्टर की तैयारी करवाएंगे, जिस सेमेस्टर की परीक्षा बोर्ड की ओर से ली जानी है। इस कारण सरकारी स्कूलों में बच्चों को तो नुकसान होगा ही, साथ में निजी स्कूलों में भी बच्चों को रटा मरवाया जाएगा।
शिक्षा विभाग उठाए कदम
शहरवासी सरदार हरपाल सिंह, विनय गुलाटी, मोहित बिंदलिश, भारत भूषण, राजेश कुमार, विनोद कुमार, जितेंद्र कुमार, मनीष ने बताया कि निजी स्कूल संचालकों के खिलाफ सरकार के कई कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सरकारी स्कूलों में गरीब व जरूरतमंद बच्चे पढ़ते हैं। एडमिशन फीस, पुस्तकों और अन्य फंडों के माध्यम अभिभावकों की जेब काट रहे हैं। सरकार को कड़े कदम उठाकर उनकी मनमानी पर रोक लगानी चाहिए।
तैयारी के लिए समय कम
सरकारी स्कूल की छात्रा मोनिका, सोनिया, कुसुम, रजनी, आरती, मनीषा, नमिता, अंजू ने बताया कि सरकारी स्कूलों में छुट्टियां निकालने के बाद पढ़ाई के लिए बहुत कम समय मिलता है। निजी स्कूल में दो-दो वर्ष तक एक ही पुस्तक पढ़ाने से विद्यार्थियों को समस्या नहीं आती है। इस कारण उनका परिणाम बेहतर होता है। इस संबंध में निजी स्कूल संचालक एसोसिएशन के जिला अध्यक्ष कुलदीप पूनिया के मुताबिक उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।
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बोर्ड की परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लालच में बच्चों को दो-दो साल तक एक ही सिलेबस की पुस्तकों को रटाया जाता है। लेकिन विभाग का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।
निजी स्कूल संचालक स्कूलों में कक्षा नौंवी में दसवीं और कक्षा ग्याहरवीं में बाहरवीं की पुस्तकें लगाकर बोर्ड की परीक्षाओं के लिए तैयारी करते हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों के उन बच्चों के लिए प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना स्वाभाविक है, जो अपनी ही कक्षाओं की पुस्तकें पढ़ते हैं।
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दो स्कूलों में चल रहा है गोरखधंधा
जिले में करीब 200 निजी स्कूलों में कक्षा नौवीं में दसवीं व कक्षा ग्याहरवीं में बाहरवीं की पुस्तकें पढ़ाई जाती है। शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार कई अधिकारियों की जानकारी में होने के बावजूद इस बारे में कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
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निजी स्कूल संचालकों द्वारा दो-दो वर्षों तक एक ही पुस्तक विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए शिक्षा का स्तर गिर रहा है। विद्यार्थियों को आधार मजबूत करने के लिए कक्षा नौंवी व ग्याहरवीं की पुस्तकों से वंचित रखा जाता है।
इसके कारण विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने बजाए, पुस्तकों से रट्टा लगाना अधिक पसंद करता है। दूसरा पुस्तकों को रटने से निजी स्कूलों के विद्यार्थियों का परिणाम तो अच्छा आता है, लेकिन सरकारी स्कूलों के बच्चे पिछड़ जाते हैं।
बच्चों का नुकसान
बोर्ड ने नई शिक्षा नीति के तहत कक्षा दसवीं और कक्षा बारहवीं के प्रथम सेमेस्टर परीक्षा स्कूल में ही लिए जाने का निर्णय किया है। ऐसे में अब निजी स्कूल संचालक दो साल में से डेढ़ साल तक केवल उसी सेमेस्टर की तैयारी करवाएंगे, जिस सेमेस्टर की परीक्षा बोर्ड की ओर से ली जानी है। इस कारण सरकारी स्कूलों में बच्चों को तो नुकसान होगा ही, साथ में निजी स्कूलों में भी बच्चों को रटा मरवाया जाएगा।
शिक्षा विभाग उठाए कदम
शहरवासी सरदार हरपाल सिंह, विनय गुलाटी, मोहित बिंदलिश, भारत भूषण, राजेश कुमार, विनोद कुमार, जितेंद्र कुमार, मनीष ने बताया कि निजी स्कूल संचालकों के खिलाफ सरकार के कई कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सरकारी स्कूलों में गरीब व जरूरतमंद बच्चे पढ़ते हैं। एडमिशन फीस, पुस्तकों और अन्य फंडों के माध्यम अभिभावकों की जेब काट रहे हैं। सरकार को कड़े कदम उठाकर उनकी मनमानी पर रोक लगानी चाहिए।
तैयारी के लिए समय कम
सरकारी स्कूल की छात्रा मोनिका, सोनिया, कुसुम, रजनी, आरती, मनीषा, नमिता, अंजू ने बताया कि सरकारी स्कूलों में छुट्टियां निकालने के बाद पढ़ाई के लिए बहुत कम समय मिलता है। निजी स्कूल में दो-दो वर्ष तक एक ही पुस्तक पढ़ाने से विद्यार्थियों को समस्या नहीं आती है। इस कारण उनका परिणाम बेहतर होता है। इस संबंध में निजी स्कूल संचालक एसोसिएशन के जिला अध्यक्ष कुलदीप पूनिया के मुताबिक उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।