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Sonipat News: पिता से बाेले स्टेशन छोड़ने चलो...तब पता चला बेटा फाैजी बन गया
Tue, 08 Jul 2025 08:01 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Tue, 08 Jul 2025 08:01 PM IST
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फोटो :10: शहीद रवींद्र दहिया (फाइल फोटो)
परिजनों को बिना बताए सेना में भर्ती हो गए, आखिरी समय में दी थी जानकारी
सीने पर गोली लगने के बाद जंग लड़ते रहे थे 19 साल के रवींद्र
मां को लिखे आखिरी पत्र में कहा था शादी के लिए अभी रिश्ता तय मत करना
शिवकुमार सिंह जादौन
सोनीपत। 28 अगस्त 1998 को रवींद्र ने पिता से कहा, मैं सेना में भर्ती हो गया हूं। पिता ने समझा कि मजाक कर रहा है, लेकिन हंसमुख स्वभाव के रवींद्र ने जब उनके पिता को बैंक में ड्यूटी पर जाने से रोका और उसे स्टेशन तक छोड़ने के लिए कहा तब जाकर पूरे परिवार को पता चला कि उनका सपूत फाैज में भर्ती हो गया है। 4 जाट रेजिमेंट में बताैर सिपाही भर्ती हुए रवींद्र ने कारगिल में दुश्मनों के छक्के छुड़ाए और महज 19 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। शहीद की मां मूर्ति देवी ने भावुक होते हुए यादें साझा कीं। रवींद्र के भाई व पिता का निधन हो चुका है। गांव में अब कोई नहीं रहता है। शहीद रवींंद्र के परिवार में सिर्फ उनकी मां मूर्ति देवी और भाभी हैं, जो बहादुरगढ़ में रहती हैं।
मां मूर्ति देवी ने रवींद्र के आखिरी पत्र के बारे में जिक्र करते हुए कहा कि युद्ध चल रहा था तभी रवींद्र ने मेरे लिए पत्र भेजा जो आखिरी पत्र बन गया। रवींद्र ने कहा था कि मां अभी शादी के लिए मेरा रिश्ता तय नहीं करना। मुझे अभी देश के लिए बहुत काम करना है।
गोली लगने के बाद भी लड़ते रहे रवींद्र
कारगिल युद्ध में बलिदान सैनिकों में गांव रोहणा निवासी सिपाही रवींद्र दहिया सबसे कम 19 साल के थे। वे 4 जाट रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। रविंद्र दहिया कारगिल युद्ध में 6 जून 1999 को शहीद हुए। उस दिन वे काक्सर हिल्स में अपने पाॅइंट पर मुस्तैद थे। बहादुरी के साथ दुश्मन देश की सेना से वे लोहा ले रहे थे। इसी दौरान एक गोली उनके सीने पर लगी। सीने पर गोली लगने के बाद भी आखिरी सांस तक रवींद्र जंग लड़ते रहे और शहीद हो गए। उनके पैतृक गांव रोहणा में शहीद पार्क बना हुआ है। गांव के युवा शहीद में पार्क में लगी रवींद्र की प्रतिमा देख कर सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित हुए हैं।
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विरासत में मिला देशभक्ति का जज्बा
रवींद्र दहिया के पिता ईश्वर सिंह भी सेना में रहे थे, लिहाजा रवींद्र ने सेना में भर्ती होना लक्ष्य बनाया। रवींद्र परिजनों को बताए बगैर भर्ती देखने चले गए और उसका चयन भी हो गया।
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कारगिल युद्ध में शहीद हुए रवींद्र दहिया की बहादुरी पर सभी को गर्व होता है, वैसे तो रोहणा गांव सैनिकों के लिए ही जाना जाता है, लेकिन रवींद्र सभी के हीरो हैं। सेना के तैयारी करने वाले युवा शहीद पार्क में रवींद्र के प्रतिमा के सामने नमन जरूर करते हैं।
संजय, पूर्व सरपंच रोहणा
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रवींद्र दहिया की वजह से देश में रोहणा गांव की पहचान है। सबसे कम उम्र शहीद हुए रवींद्र की शौर्यगाथा कभी धुंधली नहीं होगी।
देवेंद्र, ग्रामीण
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फोटो : 8: रोहणा गांव में शहीद रवींद्र दहिया की स्मृति में बना पार्क
फोटो :09: संजय पूर्व सरपंच
फोटो :10: शहीद रवींद्र दहिया (फाइल फोटो)
फोटो :11: देवेंद्र
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सीने पर गोली लगने के बाद जंग लड़ते रहे थे 19 साल के रवींद्र
मां को लिखे आखिरी पत्र में कहा था शादी के लिए अभी रिश्ता तय मत करना
शिवकुमार सिंह जादौन
सोनीपत। 28 अगस्त 1998 को रवींद्र ने पिता से कहा, मैं सेना में भर्ती हो गया हूं। पिता ने समझा कि मजाक कर रहा है, लेकिन हंसमुख स्वभाव के रवींद्र ने जब उनके पिता को बैंक में ड्यूटी पर जाने से रोका और उसे स्टेशन तक छोड़ने के लिए कहा तब जाकर पूरे परिवार को पता चला कि उनका सपूत फाैज में भर्ती हो गया है। 4 जाट रेजिमेंट में बताैर सिपाही भर्ती हुए रवींद्र ने कारगिल में दुश्मनों के छक्के छुड़ाए और महज 19 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। शहीद की मां मूर्ति देवी ने भावुक होते हुए यादें साझा कीं। रवींद्र के भाई व पिता का निधन हो चुका है। गांव में अब कोई नहीं रहता है। शहीद रवींंद्र के परिवार में सिर्फ उनकी मां मूर्ति देवी और भाभी हैं, जो बहादुरगढ़ में रहती हैं।
मां मूर्ति देवी ने रवींद्र के आखिरी पत्र के बारे में जिक्र करते हुए कहा कि युद्ध चल रहा था तभी रवींद्र ने मेरे लिए पत्र भेजा जो आखिरी पत्र बन गया। रवींद्र ने कहा था कि मां अभी शादी के लिए मेरा रिश्ता तय नहीं करना। मुझे अभी देश के लिए बहुत काम करना है।
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गोली लगने के बाद भी लड़ते रहे रवींद्र
कारगिल युद्ध में बलिदान सैनिकों में गांव रोहणा निवासी सिपाही रवींद्र दहिया सबसे कम 19 साल के थे। वे 4 जाट रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। रविंद्र दहिया कारगिल युद्ध में 6 जून 1999 को शहीद हुए। उस दिन वे काक्सर हिल्स में अपने पाॅइंट पर मुस्तैद थे। बहादुरी के साथ दुश्मन देश की सेना से वे लोहा ले रहे थे। इसी दौरान एक गोली उनके सीने पर लगी। सीने पर गोली लगने के बाद भी आखिरी सांस तक रवींद्र जंग लड़ते रहे और शहीद हो गए। उनके पैतृक गांव रोहणा में शहीद पार्क बना हुआ है। गांव के युवा शहीद में पार्क में लगी रवींद्र की प्रतिमा देख कर सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित हुए हैं।
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विरासत में मिला देशभक्ति का जज्बा
रवींद्र दहिया के पिता ईश्वर सिंह भी सेना में रहे थे, लिहाजा रवींद्र ने सेना में भर्ती होना लक्ष्य बनाया। रवींद्र परिजनों को बताए बगैर भर्ती देखने चले गए और उसका चयन भी हो गया।
कारगिल युद्ध में शहीद हुए रवींद्र दहिया की बहादुरी पर सभी को गर्व होता है, वैसे तो रोहणा गांव सैनिकों के लिए ही जाना जाता है, लेकिन रवींद्र सभी के हीरो हैं। सेना के तैयारी करने वाले युवा शहीद पार्क में रवींद्र के प्रतिमा के सामने नमन जरूर करते हैं।
संजय, पूर्व सरपंच रोहणा
रवींद्र दहिया की वजह से देश में रोहणा गांव की पहचान है। सबसे कम उम्र शहीद हुए रवींद्र की शौर्यगाथा कभी धुंधली नहीं होगी।
देवेंद्र, ग्रामीण
फोटो : 8: रोहणा गांव में शहीद रवींद्र दहिया की स्मृति में बना पार्क
फोटो :09: संजय पूर्व सरपंच
फोटो :10: शहीद रवींद्र दहिया (फाइल फोटो)
फोटो :11: देवेंद्र

फोटो :10: शहीद रवींद्र दहिया (फाइल फोटो)

फोटो :10: शहीद रवींद्र दहिया (फाइल फोटो)

फोटो :10: शहीद रवींद्र दहिया (फाइल फोटो)