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सोनीपत पर पड़ी दिल्ली के प्रदूषण की मार
ब्यूरो/अमर उजाला, सोनीपत
Updated Tue, 12 Jan 2016 12:16 AM IST
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दिल्ली में ग्रीन टैक्स लगता है तो नुकसान एनसीआर में शामिल जिलों को भुगतना पड़ता है। अब दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए एनसीजेड (नेचुरल कंजर्वेशन जोन) की प्लानिंग की गई तो इसका नुकसान भी एनसीआर में शामिल जिलों को झेलना होगा। एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की इस महत्वाकांक्षी योजना का खामियाजा सोनीपत को 5 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन देकर भुगतना पड़ेगा। बता दें कि एनसीजेड की प्लानिंग के लिए नक्शे भेजे गए थे, जिसमें सोनीपत की 12 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन एनसीजेड में दिखाई गई थी। हालांकि डीटीपी द्वारा कराए जा रहे सर्वे में यह जमीन 5 हजार हेक्टेयर से कुछ अधिक रह गई है। रिपोर्ट अभी फाइनल नहीं हुई है, लेकिन इसी महीने के अंत तक इसको अंतिम रूप मिलने की उम्मीद है। बता दें कि एनसीजेड में शामिल जमीन पर किसी भी तरह का फेरबदल संभव नहीं हो पाएगा। सिर्फ एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ही जमीन पर फेरबदल कर सकेगा अन्यथा जिस स्थिति में है उसी स्थिति में जमीन रहेगी।
क्या है एनसीजेड
जैसा कि नाम से ही पता चलता है राष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र। इस क्षेत्र को संरक्षित किया जाएगा। क्षेत्र में शामिल किसी भी तरह की जमीन की सीएलयू नहीं दी जाएगी। किसी भी तरह का निर्माण नहीं होगा। कोई भी फेरबदल भी नहीं होगा। जिस हालत में जमीन है, वह उसी हालत में रहेगी। अगर कुछ बदलाव होगा तो एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की मंजूरी आवश्यक होगी। एनसीजेड को एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, हिसार सेटेलाइट से लिए गए नक्शों के आधार पर तय किया था। चूंकि नक्शे वर्ष 1999 और 2012 के सेटेलाइट विजुअल पर आधारित थे, इसीलिए इनका सर्वे जिलास्तर पर कराया जा रहा है।
12 हजार हेक्टेयर रह गया 5 हजार हेक्टेयर
जो नक्शा सोनीपत के लिए भेजा गया था, उसके अनुसार पूरे जिले में 12,494 हेक्टेयर जमीन एनसीजेड में दर्शाई गई थी। अब जब सर्वे हुआ तो अभी तक मात्र 5,317.35 हेक्टेयर जमीन ही ऐसी मिली है, जिसे एनसीजेड में शामिल किया जाएगा। अभी सर्वे का काम जारी है, लेकिन इतना तय है कि एनसीजेड में 5,317.35 हेक्टेयर के आसपास ही जमीन जाएगी।
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यस पार्ट बचे हैं 266, लेकिन नहीं पड़ेगा खास असर
सर्वे से पहले नक्शे में कुल 1149 साइट थीं, जो अब 457 रह गई हैं। इनमें से 154 साइट तो फाइनल की जा चुकी हैं। 266 साइट ऐसी हैं जो फाइनल नहीं हुई हैं। विभागीय स्तर पर इन साइट को यस पार्ट का नाम दिया गया है। अभी इनका सर्वे जारी है। यस पार्ट की जमीन भी 5,317.35 हेक्टेयर में शामिल है, लेकिन सर्वे पूरा होने के बाद जमीन पर कुछ खास फर्क पड़ने वाला नहीं है। 457 कुल साइट में से 25 जीआरजेड और 12 फारेस्ट डिपार्टमेंट की जमीन भी शामिल हैं। जीआरजेड मतलब ग्राउंड रिचार्जेबल जोन होता। यह ऐसी जमीन है जहां अपने-आप ही पानी एकत्र हो जाता है।
अधिकतर तालाब और बणी है शामिल
अभी तक किए गए सर्वे में एनसीजेड में तालाब और बणी ही अधिक शामिल किए गए हैं। लगभग हर गांव में तालाब और उसके आसपास की हरी-भरी जमीन को एनसीजेड में दिया जा रहा है। इसके अलावा गांवों में बनी बणी और कुछ एरिया में खड़े पेड़-पौधों को भी शामिल किया गया है। सर्वे के दौरान कृषि योग्य निजी भूमि जोकि पहले एनसीजेड में शामिल थी, उसे हटाया गया है।
अब बचा है यह काम
फिलहाल जिला नगर योजनाकार कार्यालय में सर्वे का काम पूरा किया जा रहा है। साथ ही साथ नक्शा भी तैयार किया जा रहा है। यह नक्शा हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, हिसार को भेजा जाएगा, ताकि वे अपना डाटाबेस अपडेट कर सकें। साथ ही सर्वे की फाइनल रिपोर्ट और नक्शे की अलग कॉपी एनसीआर प्लानिंग बोर्ड को भेजी जाएगी।
दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है, इसीलए एनसीजेड की प्लानिंग की गई थी। यह ऐसा क्षेत्र होगा, जहां हरियाली को बढ़ाया जाएगा। इसके लिए सर्वे का काम जिलास्तर पर ही किया जा रहा है।
-दिलबाग सिंह, डीटीपी, एनसीआर प्लानिंग बोर्ड
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क्या है एनसीजेड
जैसा कि नाम से ही पता चलता है राष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र। इस क्षेत्र को संरक्षित किया जाएगा। क्षेत्र में शामिल किसी भी तरह की जमीन की सीएलयू नहीं दी जाएगी। किसी भी तरह का निर्माण नहीं होगा। कोई भी फेरबदल भी नहीं होगा। जिस हालत में जमीन है, वह उसी हालत में रहेगी। अगर कुछ बदलाव होगा तो एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की मंजूरी आवश्यक होगी। एनसीजेड को एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, हिसार सेटेलाइट से लिए गए नक्शों के आधार पर तय किया था। चूंकि नक्शे वर्ष 1999 और 2012 के सेटेलाइट विजुअल पर आधारित थे, इसीलिए इनका सर्वे जिलास्तर पर कराया जा रहा है।
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12 हजार हेक्टेयर रह गया 5 हजार हेक्टेयर
जो नक्शा सोनीपत के लिए भेजा गया था, उसके अनुसार पूरे जिले में 12,494 हेक्टेयर जमीन एनसीजेड में दर्शाई गई थी। अब जब सर्वे हुआ तो अभी तक मात्र 5,317.35 हेक्टेयर जमीन ही ऐसी मिली है, जिसे एनसीजेड में शामिल किया जाएगा। अभी सर्वे का काम जारी है, लेकिन इतना तय है कि एनसीजेड में 5,317.35 हेक्टेयर के आसपास ही जमीन जाएगी।
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यस पार्ट बचे हैं 266, लेकिन नहीं पड़ेगा खास असर
सर्वे से पहले नक्शे में कुल 1149 साइट थीं, जो अब 457 रह गई हैं। इनमें से 154 साइट तो फाइनल की जा चुकी हैं। 266 साइट ऐसी हैं जो फाइनल नहीं हुई हैं। विभागीय स्तर पर इन साइट को यस पार्ट का नाम दिया गया है। अभी इनका सर्वे जारी है। यस पार्ट की जमीन भी 5,317.35 हेक्टेयर में शामिल है, लेकिन सर्वे पूरा होने के बाद जमीन पर कुछ खास फर्क पड़ने वाला नहीं है। 457 कुल साइट में से 25 जीआरजेड और 12 फारेस्ट डिपार्टमेंट की जमीन भी शामिल हैं। जीआरजेड मतलब ग्राउंड रिचार्जेबल जोन होता। यह ऐसी जमीन है जहां अपने-आप ही पानी एकत्र हो जाता है।
अधिकतर तालाब और बणी है शामिल
अभी तक किए गए सर्वे में एनसीजेड में तालाब और बणी ही अधिक शामिल किए गए हैं। लगभग हर गांव में तालाब और उसके आसपास की हरी-भरी जमीन को एनसीजेड में दिया जा रहा है। इसके अलावा गांवों में बनी बणी और कुछ एरिया में खड़े पेड़-पौधों को भी शामिल किया गया है। सर्वे के दौरान कृषि योग्य निजी भूमि जोकि पहले एनसीजेड में शामिल थी, उसे हटाया गया है।
अब बचा है यह काम
फिलहाल जिला नगर योजनाकार कार्यालय में सर्वे का काम पूरा किया जा रहा है। साथ ही साथ नक्शा भी तैयार किया जा रहा है। यह नक्शा हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, हिसार को भेजा जाएगा, ताकि वे अपना डाटाबेस अपडेट कर सकें। साथ ही सर्वे की फाइनल रिपोर्ट और नक्शे की अलग कॉपी एनसीआर प्लानिंग बोर्ड को भेजी जाएगी।
दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है, इसीलए एनसीजेड की प्लानिंग की गई थी। यह ऐसा क्षेत्र होगा, जहां हरियाली को बढ़ाया जाएगा। इसके लिए सर्वे का काम जिलास्तर पर ही किया जा रहा है।
-दिलबाग सिंह, डीटीपी, एनसीआर प्लानिंग बोर्ड