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फटे जूतों में खाली पेट हॉकी का अभ्यास करती थीं नेहा गोयल

Sat, 07 Aug 2021 12:00 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sat, 07 Aug 2021 12:00 AM IST
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Neha Goyal used to practice hockey on an empty stomach in torn shoes
सोनीपत। टोक्यो ओलंपिक में सेमीफाइनल तक का सफर तय करने वाली बेटियों का जीवन भी संघर्ष से गुजरा है। बेटियों के आर्थिक हालात ऐसे थे कि एक समय में वे अपने लिए जूते, स्टिक व डाइट तक जुटाने में समर्थ नहीं थीं। आज भी इन तीनों के आर्थिक हालात ज्यादा बेहतर नहीं हैं।
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कुछ साल पहले की ही बात है कि टीम की मिडफील्डर नेहा गोयल फटे जूतों में खाली पेट अभ्यास करती थीं। फिट रहने के लिए डाइट भी नहीं मिल पाती थी। ठीक ऐसे ही हालात निशा के हैं, जिसके परिवार का गुजारा ही बमुश्किल चलता है। पिता और मां ने दिहाड़ी-मजदूरी कर बेटी के सपनों को पूरा किया।
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छोटा सा घर, घर में बीमार मां और हाथ में जीते हुए पदक
जब मैं छठी कक्षा में थी, तब मेरी एक सहेली ने मुझे हॉकी स्टिक थमा दी थी। मैं तीन बहनों में सबसे छोटी हूं। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इस बीच मेरी एक दोस्त ने बताया कि हॉकी खेलने से अच्छे जूते, कपड़े पहनने को मिलेंगे। मैंने उस वक्त अच्छे कपड़े-जूतों के लिए हॉकी खेलना शुरू किया। फिर एक जिला स्तर का मुकाबला जीतने के बाद मुझे दो हजार रुपये का इनाम मिला, जिसके बाद मुझे लगा कि शायद इस खेल के जरिये मैं घर की आर्थिक हालत सुधार सकती हूं। पिता इस खेल में मुझे बढ़ावा नहीं देना चाहते थे, पर मां ने मेरा पूरा साथ दिया। खेल की बदौलत मुझे नेशनल टीम में जगह मिली। इसी खेल के जरिये मुझे साल 2015 में रेलवे में नौकरी भी मिली। मैं घर संभालने की स्थिति में आई ही थी कि साल 2017 में लंबी बीमारी के चलते मेरे पिता का निधन हो गया। पिता की मौत के बाद मां ने फैक्टरियों में काम करना शुरू किया। कभी जूतों की फैक्टरी में काम करतीं तो कभी साइकिल के कारखाने में। तब कहीं जाकर मां ने मुझे बुलंदी तक पहुंचाया है।
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- जैसा कि महिला हॉकी टीम की मिडफील्डर नेहा गोयल (24) ने अमर उजाला को बताया
25 गज के मकान में रहता है निशा का परिवार
हॉकी टीम में शामिल सोनीपत की दूसरी सदस्य निशा अपने परिवार के साथ सोनीपत के कालूपुर गांव में रहती है। खास बात यह है कि निशा का परिवार केवल 25 गज के मकान में बेहद तंग हालत में रहता है। पिता लकवाग्रस्त हो गए थे, जिसके बाद घर में दो वक्त की रोटी तक के जुगाड़ के लाले पड़ गए] लेकिन निशा ने हिम्मत नहीं हारी। किसी तरह से अपनी डाइट का खर्च निकाला, जिसके उसके भाई-बहन ने भी उनकी मदद की। आज हॉकी में यह बेटी पहचान की मोहताज नहीं है।
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