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श्रद्धा, विश्वास व भक्ति से पाए जा सकते हैं भगवान भोलेनाथ : साध्वी रितु भारती
Mon, 17 Nov 2025 01:42 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Mon, 17 Nov 2025 01:42 AM IST
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फोटो 50- सोनीपत के गढ़ी घसीटा स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर में भगवान शिव की कथा सुनाती साध्वी र
सोनीपत। गढ़ी घसीटा स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, न्यू हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी की ओर से तीन दिवसीय भगवान शिव कथा का शुभारंभ किया गया। कथा के प्रथम दिन साध्वी रितु भारती ने सती प्रसंग का वर्णन किया। साध्वी अनुपमा भारती, वर्षा भारती व राजेश्वरी भारती ने भजन सुनाकर माहौल को भक्तिमय बनाया।
साध्वी रितु भारती ने बताया कि भगवान भोलेनाथ को श्रद्धा, विश्वास व भक्ति से पाया जा सकता है। गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान शंकर की कथा का वर्णन रामचरित मानस के बालकांड में किया है। परमात्मा को जो मनुष्य तर्क-वितर्क, बुद्धि-मन या वाणी से जानने का प्रयास करते है, वह हमेशा हताश, निराश व दुख पाते हैं।
इस दुख का निवारण केवल प्रभु की पावन कथा से ही मिलता है। तुलसीदास कहते हैं कि देख चरित अति नर अनुसारी, भवउ ह्रदय मम संशय भारी। जब प्रभु त्रेता युग में धरती का पापों से भार उतारने के लिए साधारण मानव जैसी लीला कर रहे थे तो ऋषि भारद्वाज के मन में भी उनकी लीलाओं को देखकर संशय आ गया था। इसके निवारण के लिए उन्हें ऋषि याज्ञवल्क्य की शरणागत होना पड़ा।
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साध्वी रितु ने बताया कि प्रत्यक्ष को किसी भी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए जब गुरु हमारे जीवन में परमात्मा का साक्षात्कार करवा देता है तो हमारे सारे संशय समाप्त हो जाते हैं। जब माता सती भोलेनाथ के वचनों पर संशय कर बैठी तो उन्हें प्रभु को सदा के लिए खोना पड़ा। इसके बाद प्रभु की प्राप्ति के लिए माता सती को दूसरा जन्म लेना पड़ा था। इससे हमें संदेश मिलता है कि प्रभु की भक्ति पाकर मनुष्य अपने जीवन को पार लगा सकता है।
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साध्वी रितु भारती ने बताया कि भगवान भोलेनाथ को श्रद्धा, विश्वास व भक्ति से पाया जा सकता है। गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान शंकर की कथा का वर्णन रामचरित मानस के बालकांड में किया है। परमात्मा को जो मनुष्य तर्क-वितर्क, बुद्धि-मन या वाणी से जानने का प्रयास करते है, वह हमेशा हताश, निराश व दुख पाते हैं।
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इस दुख का निवारण केवल प्रभु की पावन कथा से ही मिलता है। तुलसीदास कहते हैं कि देख चरित अति नर अनुसारी, भवउ ह्रदय मम संशय भारी। जब प्रभु त्रेता युग में धरती का पापों से भार उतारने के लिए साधारण मानव जैसी लीला कर रहे थे तो ऋषि भारद्वाज के मन में भी उनकी लीलाओं को देखकर संशय आ गया था। इसके निवारण के लिए उन्हें ऋषि याज्ञवल्क्य की शरणागत होना पड़ा।
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साध्वी रितु ने बताया कि प्रत्यक्ष को किसी भी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए जब गुरु हमारे जीवन में परमात्मा का साक्षात्कार करवा देता है तो हमारे सारे संशय समाप्त हो जाते हैं। जब माता सती भोलेनाथ के वचनों पर संशय कर बैठी तो उन्हें प्रभु को सदा के लिए खोना पड़ा। इसके बाद प्रभु की प्राप्ति के लिए माता सती को दूसरा जन्म लेना पड़ा था। इससे हमें संदेश मिलता है कि प्रभु की भक्ति पाकर मनुष्य अपने जीवन को पार लगा सकता है।