सोनीपत से 14 से ज्यादा देशों तक पहुंची एटलस, 40 लाख साईकिल साल में बनाईं, अब सभी यूनिट बंद
- आर्थिक हालत बिगड़ने से यूनिट बंद होती चली गई
- इसका सबसे बड़ा खामियाजा हजारों कर्मियों को भुगतना पड़ा, जो बेरोजगार हो गए
- सोनीपत में एटलस साइकिल लिमिटेड की सबसे पहली यूनिट 1951 में लगी थी
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विश्व साइकिल दिवस पर गाजियाबाद के साहिबाबाद में एटलस कंपनी का आखिरी प्लांट बंद होने से मचे घमासाम के बीच सोनीपत की यादें ताजा हो गईं। यहां नींव रखे जाने के बाद 14 से ज्यादा देशों तक पहुंचने वाली एटलस साइकिल को प्रबंधन ने जहां पहले ही समेटना शुरू कर दिया था, वहीं अब उसकी सभी यूनिट पर ताला लगा दिया गया है। जिस सोनीपत से एटलस की शुरुआत हुई थी, यहां उसकी एक यूनिट 2006 में बंद करके पुणे शिफ्ट कर दी गई थी। इसके अलावा शहर की मुख्य फैक्टरी को 2003 में धीरे-धीरे समेटना शुरू किया तो 2018 में उसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया।
इस तरह दुनिया में मशहूर एटलस साइकिल जहां 40 लाख सालाना का उत्पादन करती थी, अब उसका पूरी तरह से नाम खत्म होता चला गया। इसका सबसे बड़ा कारण प्रबंधन के निजी कारणों से फैक्टरी पर ध्यान नहीं देना माना जा रहा है। जिससे आर्थिक हालत बिगड़ने से यूनिट बंद होती चली गई और इसका सबसे बड़ा खामियाजा हजारों कर्मियों को भुगतना पड़ा, जो बेरोजगार हो गए।
सोनीपत में एटलस साइकिल लिमिटेड की सबसे पहली यूनिट 1951 में लगी थी, जो यहां लगातार अपना कारोबार बढ़ाती गई। इस फैक्टरी में सबसे पहले 120 साइकिल प्रतिदिन बनाई जाती थी और यह संख्या भी डिमांड के आधार पर बढ़ती गई। 1990 के दौर तक पहुंचते-पहुंचते एटलस साइकिल की देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक में डिमांड होने लगी।
40 लाख साइकिलें सालाना उत्पादन क्षमता वाली यह कंपनी देश के अलावा डेनमार्क, जर्मनी, हॉलैंड, इराक, कुवैत, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, ओमान, यूएई, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, साउथ अफ्रीका तक एक्सपोर्ट होने लगा। यह एक्सपोर्ट 1994-95 में शुरू हुआ था और 2002 तक स्थिति बेहतर रही। उस समय सोनीपत की मुख्य फैक्टरी में जहां हजारों कर्मी काम करते थे, वहीं सोनीपत शहर में जगह नहीं होने के कारण रसोई गांव में लगाए गए प्लांट के अंदर भी लगभग एक हजार कर्मियों को रोजगार मिला।
लेकिन 2003 तक पहुंचते-पहुंचते कंपनी ने यहां से फैक्टरी को समेटकर पुणे की ओर का रुख कर लिया। यहां सबसे पहले आधा प्लांट बंद किया गया और वहां काम करने वाले कर्मियों को यहां से पुणे शिफ्ट करने की बात कही गई। लेकिन उस समय अधिकतर कर्मियों ने नौकरी छोड़ दी और कर्मी काफी कम रह गए। सोनीपत की मेन फैक्टरी को समेटने के बाद रसोई गांव में चल रही यूनिट को 2006 में पूरी तरह से बंद कर दिया गया।
सोनीपत की मुख्य फैक्टरी में सामान का प्रोडक्शन पूरी तरह से बंद था तो फरवरी 2018 में कंपनी प्रबंधकों ने नियामकीय फाइलिंग में फैक्टरी को पूरी तरह से बंद किया जा रहा है। अब फैक्टरी में ऑर्डर पूरे करने के लिए केवल मैन्युफैक्चरिंग होगी और ऑर्डर पूरा होने पर पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा। जिसमें लगभग 200 कर्मियों से अगस्त 18 तक काम कराया गया और उसके बाद फैक्टरी पर पूरी तरह से ताला लगा दिया गया। इस तरह देश के सबसे बड़े ब्रांड में शामिल एटलस पूरी तरह से सिमट गया।
एटलस बंद होने से बाजार पर पड़ा बड़ा असर
एटलस साइकिल बंद होने से हजारों कर्मचारियों का रोजगार चला गया था। जिसका बड़ा असर शहर के बाजार पर पड़ा। एटलस में नौकरी कर चुके कर्मचारी बताते हैं कि जब एटलस को बंद किया गया तो बाजार में अचानक से भीड़ खत्म हो गई थी। क्योंकि लोगों के पास पैसा नहीं था और जिनके पास पैसा था, वह उसको भविष्य के लिए बचाना चाहते थे। हालांकि बेरोजगार हुए लोगों ने धीरे-धीरे दूसरी जगह नौकरी करनी शुरू की और उसके लगभग तीन साल बाद तक कुछ हालात सुधरे। यह जरूर है कि अगर आज एटलस चलती रहती तो उसके सहारे हजारों लोगों को रोजगार मिलता रहता।
सोनीपत को एक समय में एटलस के कारण पहचान मिलनी शुरू हो गई थी, क्योंकि देश के साथ ही विदेशों तक यहां से साइकिल जाती थी। एटलस देश का सबसे बड़ा नाम बन गया था और विदेश तक साइकिल की मांग बढ़ने लगी थी। लेकिन कंपनी प्रबंधन के बीच कुछ खींचतान चलने लगी, जिसके बाद आर्थिक हालत बिगड़ती चली गई। इसका असर फैक्टरी पर पड़ना शुरू हुआ और उसके बाद हालत सुधरने की जगह लगातार बिगड़ती चली गई। जिससे कंपनी की सभी यूनिटें बंद होती चली गईं। इससे कर्मियों को काफी परेशानी हुई, लेकिन उसके बाद कुछ ने दूसरी जगह नौकरी करनी शुरू कर दी और किसी ने यहां से पलायन कर लिया
-संजय बड़वासनियां, पूर्व कर्मी एटलस।
शहर में जिस समय एटलस फैक्टरी चल रही थी, उसका असर बाजार पर भी दिखाई देता था। जिस समय फैक्टरी बंद हुई, उस समय बाजार की हालत भी काफी खराब हो गई थी। क्योंकि उस समय तक शहर की आबादी भी ज्यादा नहीं थी और शहर का व्यापार एटलस फैक्टरी पर काफी निर्भर था। इसलिए एटलस फैक्टरी बंद होने से बाजार में काम पूरी तरह से खत्म हो गया और उसके कई साल बाद जाकर स्थिति में सुधार हुआ। यह जरूर है कि फैक्टरी चलती रहती तो उससे रोजगार भी मिलता और बाजार पर उसका असर भी दिखाई देता।
- संजय सिंगला, प्रधान जिला व्यापार मंडल