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हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर ली शपथ-हिंदी को बढ़ावा देंगे
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आईसीएस कोचिंग सेंटर में हिंदी हैं हम अभियान के तहत शपथ लेते साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक और अन्
- फोटो : Sonipat
सोनीपत। हिंदी भले ही हमारी मातृभाषा हो, लेकिन आज भी हिंदी को वह स्थान नहीं मिल सका है जो उससे मिलना चाहिए था। युवाओं को बताना होगा कि किस तरह से हिंदी उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने में सहयोगी साबित हो सकती है। इसीलिए अंग्रेजी से ज्यादा उनको हिंदी को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। हिंदी को बढ़ावा देने के साथ ही सर्वोच्च ओहदे तक पहुंचाने के लिए अमर उजाला के हिंदी है हम अभियान के तहत शहर के आईसीएस कोचिंग सेंटर में हिंदी के शिक्षक, साहित्यकार, कवि और समाजसेवी एकत्र हुए। जहां हिंदी की वर्तमान स्थिति से लेकर उसके उत्थान के लिए सुझाव दिए गए। इसके साथ ही हरियाणा साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. पूर्णमल गौड़ समेत हिंदी शिक्षकों, लेखकों व समाजसेवियों ने हिंदी को बढ़ावा देने की शपथ ली।
प्रबुद्ध लोगों का संकल्प उन्हीं की जुबानी
हिंदी को जब तक हम अपनी मातृभाषा समझकर अपनी मां की तरह सम्मान नहीं करेंगे और उसे अपनी जिंदगी में शामिल नहीं करेंगे, तब तक हिंदी को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता है। इसलिए हर किसी को हिंदी को अपने जीवन में अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा महत्ता देनी होगी। अपने परिवार के बच्चों मेें हिंदी को संस्कार की तरह भरना होगा। अंग्रेजी को केवल पढ़ाई में विषय की तरह सीमित रखना चाहिए। साहित्य अकादमी भी अब हिंदी आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ ही साहित्यकारों को पूरा सम्मान दे रही है और उनको हर सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। जिससे हिंदी की तरफ रुझान बढ़े और उसका असर भी धीरे-धीरे होता दिख भी रहा है।
-डॉ. पूर्णमल गौड़, पूर्व निदेशक हरियाणा साहित्य अकादमी।
इस समय बच्चों के लिए हिंदी केवल एक विषय बनकर रह गई है। वह मानते हैं कि इसको सीखने व अपने जीवन में अपनाने से भविष्य में कोई फायदा नहीं होने वाला है। बच्चों को लगता है कि अंग्रेजी सीखने व बोलने वाले ही अग्रणी होते हैं और यह सोच परिवार से मिल रही है। इसलिए हर किसी को यह सोच बदलनी होगी और इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपने बच्चों को हिंदी से जोड़ते हुए भविष्य में उससे होने वाले फायदों को बताना होगा, जिससे हिंदी के उत्थान में मदद मिल सकती है।
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-बबीता खत्री, शिक्षिका
हिंदी को हम मातृभाषा केवल कहते हैं, लेकिन मातृभाषा की तरह उसको अपनी जिंदगी में अपनाते नहीं हैं। आज हिंदी की जिस तरह से दयनीय हालत हो रही है, उसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। उसके लिए माता-पिता जिम्मेदार हैं जो अपने बच्चों को अंग्रेजी बोलते हुए देख ज्यादा खुश होते हैं। इसलिए यह सोच बदलनी होगी और बच्चों को अंग्रेजी की तरह ही हिंदी के महत्व के बारे में बताएंगे तो उससे बदलाव आने की बड़ी उम्मीद है। इसमें सभी को आगे आने होगा, क्योंकि किसी एक के आगे आने से बदलाव नहीं आ सकता है।
-शालू त्यागी, कवयित्री।
हिंदी को केवल किसी विशेष दिवस पर याद करके हम एक राह तैयार करते हैं। लेकिन हिंदी के उत्थान की मंजिल को तभी छुआ जा सकता है, जब हम अपने जीवन में नियमित हिंदी का उपयोग करें। इसके लिए समाज के हर वर्ग शिक्षक, सामाजिक संस्था, सरकारी कर्मी आदि को सहयोग करना होगा। जिससे हिंदी के लिए लोगों को जागरूक कर सकें और उसका फायदा बताकर लोगों को जीवन में नियमित करने की तरफ अग्रसर कर सकें। सरकार भी हिंदी के उत्थान के लिए सरकारी कार्यालयों में अनिवार्य करें तो उसका बड़ा असर दिखाई देगा।
-प्रवीण वर्मा, समाजसेवी।
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प्रबुद्ध लोगों का संकल्प उन्हीं की जुबानी
हिंदी को जब तक हम अपनी मातृभाषा समझकर अपनी मां की तरह सम्मान नहीं करेंगे और उसे अपनी जिंदगी में शामिल नहीं करेंगे, तब तक हिंदी को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता है। इसलिए हर किसी को हिंदी को अपने जीवन में अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा महत्ता देनी होगी। अपने परिवार के बच्चों मेें हिंदी को संस्कार की तरह भरना होगा। अंग्रेजी को केवल पढ़ाई में विषय की तरह सीमित रखना चाहिए। साहित्य अकादमी भी अब हिंदी आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ ही साहित्यकारों को पूरा सम्मान दे रही है और उनको हर सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। जिससे हिंदी की तरफ रुझान बढ़े और उसका असर भी धीरे-धीरे होता दिख भी रहा है।
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-डॉ. पूर्णमल गौड़, पूर्व निदेशक हरियाणा साहित्य अकादमी।
इस समय बच्चों के लिए हिंदी केवल एक विषय बनकर रह गई है। वह मानते हैं कि इसको सीखने व अपने जीवन में अपनाने से भविष्य में कोई फायदा नहीं होने वाला है। बच्चों को लगता है कि अंग्रेजी सीखने व बोलने वाले ही अग्रणी होते हैं और यह सोच परिवार से मिल रही है। इसलिए हर किसी को यह सोच बदलनी होगी और इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। अपने बच्चों को हिंदी से जोड़ते हुए भविष्य में उससे होने वाले फायदों को बताना होगा, जिससे हिंदी के उत्थान में मदद मिल सकती है।
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-बबीता खत्री, शिक्षिका
हिंदी को हम मातृभाषा केवल कहते हैं, लेकिन मातृभाषा की तरह उसको अपनी जिंदगी में अपनाते नहीं हैं। आज हिंदी की जिस तरह से दयनीय हालत हो रही है, उसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। उसके लिए माता-पिता जिम्मेदार हैं जो अपने बच्चों को अंग्रेजी बोलते हुए देख ज्यादा खुश होते हैं। इसलिए यह सोच बदलनी होगी और बच्चों को अंग्रेजी की तरह ही हिंदी के महत्व के बारे में बताएंगे तो उससे बदलाव आने की बड़ी उम्मीद है। इसमें सभी को आगे आने होगा, क्योंकि किसी एक के आगे आने से बदलाव नहीं आ सकता है।
-शालू त्यागी, कवयित्री।
हिंदी को केवल किसी विशेष दिवस पर याद करके हम एक राह तैयार करते हैं। लेकिन हिंदी के उत्थान की मंजिल को तभी छुआ जा सकता है, जब हम अपने जीवन में नियमित हिंदी का उपयोग करें। इसके लिए समाज के हर वर्ग शिक्षक, सामाजिक संस्था, सरकारी कर्मी आदि को सहयोग करना होगा। जिससे हिंदी के लिए लोगों को जागरूक कर सकें और उसका फायदा बताकर लोगों को जीवन में नियमित करने की तरफ अग्रसर कर सकें। सरकार भी हिंदी के उत्थान के लिए सरकारी कार्यालयों में अनिवार्य करें तो उसका बड़ा असर दिखाई देगा।
-प्रवीण वर्मा, समाजसेवी।