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चार लाल, फिर भी जिंदगी लाचार
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समाज कल्याण शिक्षा समिति वृद्धाश्रम में निवास करते बुजुर्ग। संवाद
- फोटो : Sonipat
अपने जिगर के टुकड़ों को बड़ा आदमी बनाने के लिए एक व्यक्ति दिन रात मेहनत करता है और खुद भूखा रहकर उनकी सभी जरूरतों को पूरा करता है, ताकि वह बड़े होकर उसके बुढ़ापे की लाठी बन सकें। लेकिन जब वह औलाद सहारा बनने की बजाए बुजुर्गों को दुत्कारती हैं तो उनके पास आंसू बहाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता। वेस्ट राम नगर स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाले एक बुजुर्ग की दास्तां भी इससे जुदा नहीं है।
समाज कल्याण शिक्षा समिति वृद्धाश्रम मेें तीन वर्षों से रह रहे 80 वर्षीय बुजुर्ग ने रुंधे स्वर में अपनी दास्तां बयां करते हुए बताया कि मेरे चार बेटे हैं। एक दिल्ली पुलिस में है, एक फैक्टरी चला रहा है और दो अपना व्यवसाय करते हैं। सभी बेटे लायक हैं, लेकिन उनकी पत्नियों ने कभी मेरा सम्मान नहीं किया। जब तक कमाई करता था, तब तक सबको अच्छा लगता था। नौकरी छूटने के बाद घर क्या बैठा, सबकी आंख में चुभने लगा। बहुएं कभी रोटी देतीं, कभी नहीं देतीं। बेटे भी बहुओं के आगे बेबस नजर आ रहे थे। रोज-रोज की कलह से मन दुखी हो चुका था। बेटों का घर बसा रहे, इसके लिए घर से निकल जाना ही बेहतर समझा। पर जाऊं कहां, कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया तो अंत में लगा कि ऐसे जीवन से तो मौत भली। जिसके बाद मरने के लिए घर से निकल गया, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। रास्ते में एक पुलिस कर्मचारी मिला, जिसने मुझे दुखी देख सोनीपत के वृद्धाश्रम का पता बताया और अब तीन साल से यहीं रह रहा हूं। यहां मुझे अपनापन और वो सम्मान मिला, जिसकी मैं अपने बच्चों से आस लगाए बैठा था।
पोते की शादी में गया, लेकिन कुछ बदला न देख फिर लौट आया
बुजुर्ग ने बताया कि कुछ माह पहले पोते की शादी थी। पोता खुद यहां लेने आया था, जिसके बाद मैं उसके साथ चला गया। शादी में शरीक हुआ, दो महीने उनके साथ रहा, लेकिन किसी के व्यवहार में परिवर्तन ना देख वापस वृद्धाश्रम में लौट आया। बुजुर्ग का कहना है कि मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों को देखना भी नहीं चाहता।
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दिल्ली की कपड़ा मिल में करता था नौकरी
बुजुर्ग का कहना है कि मैं उस समय का ग्रेजुएट हूं, जब बेहद कम लोग पढ़ाई को तवज्जो देते थे। दिल्ली की कपड़ा मिल में नौकरी करता था। इस दौरान बच्चों को बेहतर शिक्षा दी और शादी कर उनके घर बसाए। उनके सपने पूरे करते-करते अपना तन-मन-धन सब खत्म कर दिया। मिल बंद होने के बाद घर आ गया। जिसके बाद बहुओं को दो रोटी देना भी दूभर हो गया। अपने ही घर में बेगानों जैसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर सका और यहां आ गया।
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समाज कल्याण शिक्षा समिति वृद्धाश्रम मेें तीन वर्षों से रह रहे 80 वर्षीय बुजुर्ग ने रुंधे स्वर में अपनी दास्तां बयां करते हुए बताया कि मेरे चार बेटे हैं। एक दिल्ली पुलिस में है, एक फैक्टरी चला रहा है और दो अपना व्यवसाय करते हैं। सभी बेटे लायक हैं, लेकिन उनकी पत्नियों ने कभी मेरा सम्मान नहीं किया। जब तक कमाई करता था, तब तक सबको अच्छा लगता था। नौकरी छूटने के बाद घर क्या बैठा, सबकी आंख में चुभने लगा। बहुएं कभी रोटी देतीं, कभी नहीं देतीं। बेटे भी बहुओं के आगे बेबस नजर आ रहे थे। रोज-रोज की कलह से मन दुखी हो चुका था। बेटों का घर बसा रहे, इसके लिए घर से निकल जाना ही बेहतर समझा। पर जाऊं कहां, कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया तो अंत में लगा कि ऐसे जीवन से तो मौत भली। जिसके बाद मरने के लिए घर से निकल गया, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। रास्ते में एक पुलिस कर्मचारी मिला, जिसने मुझे दुखी देख सोनीपत के वृद्धाश्रम का पता बताया और अब तीन साल से यहीं रह रहा हूं। यहां मुझे अपनापन और वो सम्मान मिला, जिसकी मैं अपने बच्चों से आस लगाए बैठा था।
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पोते की शादी में गया, लेकिन कुछ बदला न देख फिर लौट आया
बुजुर्ग ने बताया कि कुछ माह पहले पोते की शादी थी। पोता खुद यहां लेने आया था, जिसके बाद मैं उसके साथ चला गया। शादी में शरीक हुआ, दो महीने उनके साथ रहा, लेकिन किसी के व्यवहार में परिवर्तन ना देख वापस वृद्धाश्रम में लौट आया। बुजुर्ग का कहना है कि मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों को देखना भी नहीं चाहता।
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दिल्ली की कपड़ा मिल में करता था नौकरी
बुजुर्ग का कहना है कि मैं उस समय का ग्रेजुएट हूं, जब बेहद कम लोग पढ़ाई को तवज्जो देते थे। दिल्ली की कपड़ा मिल में नौकरी करता था। इस दौरान बच्चों को बेहतर शिक्षा दी और शादी कर उनके घर बसाए। उनके सपने पूरे करते-करते अपना तन-मन-धन सब खत्म कर दिया। मिल बंद होने के बाद घर आ गया। जिसके बाद बहुओं को दो रोटी देना भी दूभर हो गया। अपने ही घर में बेगानों जैसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर सका और यहां आ गया।