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Sonipat News: प्राकृतिक खेती की ओर लौटें किसान, गोवंश की देशी नस्लों को दें बढ़ावा- आचार्य देवव्रत

Sat, 07 Mar 2026 01:38 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sat, 07 Mar 2026 01:38 AM IST
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Farmers should return to natural farming and promote indigenous breeds of cattle - Acharya Devvrat
सोनीपत के राई ​स्थित पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में किसानों और पशुपालकों के सीधा संवाद करते गुजरात - फोटो : rajori news
फोटो: 11
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सोनीपत। किसान गाय की देशी नस्लों को बढ़ावा दें, साथ ही प्राकृतिक खेती को अपनाएं जिससे हम सभी को शुद्ध भोजन मिल सके। प्राकृतिक खेती करने से लागत कम होगी जिससे किसानों की आय बढ़ेगी। ये बातें शुक्रवार को गुजरात एवं महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने राई स्थित पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में किसानों और पशुपालकों से संवाद कार्यक्रम में कहीं।
कार्यक्रम में विभिन्न जिलों के किसानों और पशुपालकों ने भाग लिया। राज्यपाल ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने उपजाऊ भूमि को बंजर बना दिया है। अब मिट्टी की उर्वरता देशी गोवंश के गोबर और गोमूत्र से बनने वाले जीवामृत व घन जीवामृत के उपयोग से ही बहाल की जा सकती है।
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नस्ल सुधार पर उन्होंने किसानों से हरियाणा नस्ल, गिर, साहीवाल, राठी, थारपारकर जैसी देशी नस्लों के संवर्धन पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि खुद उन्होंने 180 एकड़ के फार्म में देशी नस्ल की गोवंश के सुधार से दुग्ध उत्पादन में अच्छा परिणाम पाया है।
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झज्जर जिले की गांव फरमान निवासी रेनू सांगवान ने राज्यपाल को बताया कि वह काफी समय से देशी गोवंश के संवर्धन पर कार्य कर रही हैं। उनके पास 280 देशी गोवंश हैं। अधिकतम 24 लीटर दूध की देशी गाय भी है। इसके अलावा गांव भैंसवाल जिला सोनीपत के किसान ने बताया कि उनकी शुद्ध हरियाणा नस्ल की गाय 26 लीटर दूध दे रही है। गांव निदाना जिला रोहतक से आए सारण देव ने बताया कि उसके पास 17 लीटर से अधिक की शुद्ध हरियाणा नस्ल की कई गोवंश हैं।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने किसानों से आह्वान किया कि वे देशी नस्लों को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्राकृतिक खेती की ओर लौटें। उन्होंने कहा कि देशी गायों के गोबर और गौमूत्र से तैयार की जाने वाली प्राकृतिक खाद और जैविक कीटनाशक रासायनिक उर्वरकों यूरिया और डीएपी की तुलना में अधिक लाभकारी हैं।

इनके प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, उत्पादन क्षमता में सुधार होता है, एवं खेती अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनती है। अंत में किसानों और पशुपालकों ने राज्यपाल के विचारों की सराहना करते हुए देशी नस्लों के संरक्षण और प्राकृतिक खेती अपनाने की प्रतिबद्धता जताई।
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