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लोक संस्कृति को दोबारा लोगों के बीच में जीवित करना जरूरी: प्रियंका कौशिक
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लोक संस्कृति को जीवित रखना जरूरी: प्रियंका कौशिक
-शिरोमणि कवि पंडित मांगेराम सांगी धर्मार्थ समिति की अध्यक्ष और उनकी पोती ने कहा
अमर उजाला ब्यूरो
गोहाना। शिरोमणि कवि पंडित मांगेराम सांगी धर्मार्थ समिति की अध्यक्ष व मांगेराम की पोती प्रियंका कौशिक ने कहा कि सांग जैसी लोक संस्कृति लुप्त होती जा रही है। इससे लोगों के बीच पुनर्जीवित रखना बहुत जरूरी है। समिति के साथ उनका ध्येय भी यही है कि लोक संस्कृति को दोबारा लोगों के बीच में जीवित किया जाए। प्रियंका कौशिक गांव छपरा में लोगों को सांग के प्रति जागरूक करने पहुंची थीं।
प्रियंका कौशिक ने कहा कि स्व. कवि पंडित मांगेराम जब युवा थे, उन्हें गाने का बहुत शौक था। इस शौक के चलते वह अधिक पढ़ भी नहीं पाए और प्रसिद्ध सांगी लख्मी चंद को अपना गुरु बनाया था। उन्होंने कहा कि अब वह हरियाणवी संस्कृति पर शोध कर रही हैं, ताकि इस लुप्त होती संस्कृति को दोबारा से जीवित किया जा सकें। उन्होंने कहा कि सांग के माध्यम से अनेक प्रकार के सामाजिक संदेश लोगों को मिलते थे। इसके लुप्त होने के बाद अब युवा वर्ग टीवी व मोबाइल के माध्यम से अपनी संस्कृति को छोड़कर बाहरी संस्कृति में घुसते जा रहा। ऐसे में अगर युवा सांग के प्रति जागरूक होंगे तो वह भविष्य में अपने परिवार को इस बारे में जानकारी देने में सक्षम होंगे। हमें इस संस्कृति को लुप्त नहीं होने देना चाहिए।
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-शिरोमणि कवि पंडित मांगेराम सांगी धर्मार्थ समिति की अध्यक्ष और उनकी पोती ने कहा
अमर उजाला ब्यूरो
गोहाना। शिरोमणि कवि पंडित मांगेराम सांगी धर्मार्थ समिति की अध्यक्ष व मांगेराम की पोती प्रियंका कौशिक ने कहा कि सांग जैसी लोक संस्कृति लुप्त होती जा रही है। इससे लोगों के बीच पुनर्जीवित रखना बहुत जरूरी है। समिति के साथ उनका ध्येय भी यही है कि लोक संस्कृति को दोबारा लोगों के बीच में जीवित किया जाए। प्रियंका कौशिक गांव छपरा में लोगों को सांग के प्रति जागरूक करने पहुंची थीं।
प्रियंका कौशिक ने कहा कि स्व. कवि पंडित मांगेराम जब युवा थे, उन्हें गाने का बहुत शौक था। इस शौक के चलते वह अधिक पढ़ भी नहीं पाए और प्रसिद्ध सांगी लख्मी चंद को अपना गुरु बनाया था। उन्होंने कहा कि अब वह हरियाणवी संस्कृति पर शोध कर रही हैं, ताकि इस लुप्त होती संस्कृति को दोबारा से जीवित किया जा सकें। उन्होंने कहा कि सांग के माध्यम से अनेक प्रकार के सामाजिक संदेश लोगों को मिलते थे। इसके लुप्त होने के बाद अब युवा वर्ग टीवी व मोबाइल के माध्यम से अपनी संस्कृति को छोड़कर बाहरी संस्कृति में घुसते जा रहा। ऐसे में अगर युवा सांग के प्रति जागरूक होंगे तो वह भविष्य में अपने परिवार को इस बारे में जानकारी देने में सक्षम होंगे। हमें इस संस्कृति को लुप्त नहीं होने देना चाहिए।
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