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बिजली जाने पर आंख खुली तो कमरे में धुंआ था, आग का गुबार देख मैं चिल्लाया आग लग गई, दूसरी छत पर कूदकर जान बचाई
Updated Mon, 19 Mar 2018 02:08 AM IST
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अंकित चौहान/रविंद्र कौशिक
सोनीपत। फैक्टरी में शनिवार की रात 9 बजे तक हम सभी कर्मियों ने काम किया था और सभी 10 बजे तक जाकर सो गए थे। मैं फैक्टरी की दूसरी मंजिल पर बने कमरे में अकेला सोता हूं। मैने अपने कमरे का अंदर से ताला लगाया हुआ था। रविवार को तड़के लगभग 3.30-4 बजे बिजली चली गई तो कमरे में काफी गर्मी थी और मेरी आंख खुल गई। मेरी आंख खुली तो मैने देखा कि कमरे में काफी धुंआ है और कमरा गर्म हो रहा है, जिससे मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। धुंआ तेजी से बढ़ा तो मैने कमरे का ताला खोलने के लिए चाबी ढूंढी, लेकिन अंधेरे के कारण चाबी नहीं मिली। मैने कमरे का ताला तोड़ दिया और बाहर आकर देखा तो नीचे से आग का गुबार उठ रहा था। फैक्टरी में आग लगने की यह पूरी घटना वहां काम करने वाले बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मेठी गांव के रहने वाले राकेश ने अमर उजाला को बताई।
फैक्टरी कर्मी राकेश कमरे से बाहर निकलने के बाद की बात बताते हुए कहता है कि साहब बस उसके बाद किस तरह हमने अपनी जान बचाई है, हमें ही पता है। उसके बाद राकेश ने बताया कि मैने कमरे से बाहर आकर नीचे से आग की लपटें उठती हुई देखी तो खुद भी बेसुध हो गया। लेकिन सोचा कि यहां रहेंगे तो हम भी जल जाएंगे। इसलिए मैने चिल्लाना शुरू कर दिया कि आग लग गई है भागो, आग लग गई है भागो। मैं तुरंत ही फैक्टरी में सबसे ऊपर छत पर पहुंच गया तो जालंधर जागा हुआ था जो छत पर सोया हुआ था। उसी समय मेरे व जालंधर के चिल्लाने पर शकुंतला, हरेंद्र, चंदन, धर्मबीर अन्य भी छत पर आ गए। अंधेरा होने के कारण यह भी पता नहीं चल रहा था कि कितने लोग छत पर आए है और वह कौन-कौन है। संजीत, गुरुदेव व कुंदन जब छत पर आए तो उनके कपड़ों में आग लगी हुई थी। हम सभी अपनी जान बचाने के लिए बराबर वाली फैक्टरी नंबर 290 वाली की छत पर कूद गए। वहां कूदने से मेरे, चंदन व धर्मबीर के पैर में चोट लग गई और हमे वहां से दूसरी फैक्टरी में काम करने वाले कर्मियों ने लाकर अस्पताल में भर्ती कराया। क्योंकि मेरे व अन्य कई के पैर से चला नहीं जा रहा था और हम छत पर पड़े हुए थे। इस तरह राकेश ने फैक्टरी में आग लगने के बाद क्या-क्या हुआ और उन्होंने किस तरह जागने के बाद जान बचाई, यह पूरी बात अमर उजाला को बताई है।
हमें सामने दिख रही थी मौत
फैक्टरी कर्मी राकेश ने पूरी घटना के बारे में बताया जरूर, लेकिन वह फैक्टरी में आग लगने के बाद वहां फंसे होने को याद करके बार-बार सिंहर जाता था। उसने बताया कि जब कमरे से निकलकर बाहर आया तो नीचे ऊंची-ऊंची आग की लपटें उठ रहीं थीं। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि मौत आज सामने है और किसी भी तरह से नहीं बच सकते। लेकिन उसी समय अचानक छत पर जाकर नीचे कूदने का ख्याल आया और छत से बराबर वाली फैक्टरी की छत पर कूद गए। पैर जरूर टूट गए, लेकिन जिंदगी बच गई।
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वीरेंद्र व जालंधर साथ सोए थे, जालंधर कूदकर बच गया
फैक्टरी में छत पर जालंधर व वीरेंद्र राम दोनों साथ में छत पर सोए हुए थे। जब आग लगी तो उस समय राकेश शोर मचा रहा था और छत पर सोया जालंधर भी जाग गया। जालंधर ने बताया कि उसने अपने साथ सोए हुए साथी वीरेंद्र राम को जगा दिया। जब वह सभी छत पर एकत्र हो गए और नीचे कमरों में सोने वाले अधिकतर कर्मी छत पर आ गए तो उन्होंने बराबर वाली फैक्टरी की छत पर कूदना शुरू कर दिया। जिस फैक्टरी में आग लगी थी, उसकी छत से बराबर वाली फैक्टरी की छत लगभग 15 फुट नीचे है। वहां तक आने के बाद वीरेंद्र राम वापस चला गया। जालंधर ने बताया कि वह छत की ऊंचाई ज्यादा होने के कारण नहीं कूदा और वह सीढ़ियों से आने के कारण फैक्टरी में नीचे आ गया। जालंधर ने बताया कि शायद उसी समय वह आग की चपेट में आकर फंस गया और वह किसी भी तरह से नहीं निकल सका।
सुशील ने ढूंढी सीढ़ी तो उसे लगाकर उतर गया
जिस समय फैक्टरी में आग लगी और वहां फंसे कर्मी छत पर पहुंचकर दूसरी फैक्टरी की छत पर कूदने लगे तो उसी समय कर्मी सुशील को याद आया कि छत पर सीढ़ी रखी हुई है। उसने तुरंत ही सीढ़ी उठाकर बराबर वाली फैक्टरी की छत पर लगा दी और वह आसानी से बराबर वाली फैक्टरी की छत पर उतर गया। जबकि वीरेंद्र राम उससे पहले ही छत से फैक्टरी में नीचे उतर आया था। अगर उसके आने से पहले सीढ़ी मिल जाती तो वीरेंद्र भी छत की ऊंचाई देखकर सीढ़ियों से जाने की कोशिश नहीं करता।
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सोनीपत। फैक्टरी में शनिवार की रात 9 बजे तक हम सभी कर्मियों ने काम किया था और सभी 10 बजे तक जाकर सो गए थे। मैं फैक्टरी की दूसरी मंजिल पर बने कमरे में अकेला सोता हूं। मैने अपने कमरे का अंदर से ताला लगाया हुआ था। रविवार को तड़के लगभग 3.30-4 बजे बिजली चली गई तो कमरे में काफी गर्मी थी और मेरी आंख खुल गई। मेरी आंख खुली तो मैने देखा कि कमरे में काफी धुंआ है और कमरा गर्म हो रहा है, जिससे मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। धुंआ तेजी से बढ़ा तो मैने कमरे का ताला खोलने के लिए चाबी ढूंढी, लेकिन अंधेरे के कारण चाबी नहीं मिली। मैने कमरे का ताला तोड़ दिया और बाहर आकर देखा तो नीचे से आग का गुबार उठ रहा था। फैक्टरी में आग लगने की यह पूरी घटना वहां काम करने वाले बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मेठी गांव के रहने वाले राकेश ने अमर उजाला को बताई।
फैक्टरी कर्मी राकेश कमरे से बाहर निकलने के बाद की बात बताते हुए कहता है कि साहब बस उसके बाद किस तरह हमने अपनी जान बचाई है, हमें ही पता है। उसके बाद राकेश ने बताया कि मैने कमरे से बाहर आकर नीचे से आग की लपटें उठती हुई देखी तो खुद भी बेसुध हो गया। लेकिन सोचा कि यहां रहेंगे तो हम भी जल जाएंगे। इसलिए मैने चिल्लाना शुरू कर दिया कि आग लग गई है भागो, आग लग गई है भागो। मैं तुरंत ही फैक्टरी में सबसे ऊपर छत पर पहुंच गया तो जालंधर जागा हुआ था जो छत पर सोया हुआ था। उसी समय मेरे व जालंधर के चिल्लाने पर शकुंतला, हरेंद्र, चंदन, धर्मबीर अन्य भी छत पर आ गए। अंधेरा होने के कारण यह भी पता नहीं चल रहा था कि कितने लोग छत पर आए है और वह कौन-कौन है। संजीत, गुरुदेव व कुंदन जब छत पर आए तो उनके कपड़ों में आग लगी हुई थी। हम सभी अपनी जान बचाने के लिए बराबर वाली फैक्टरी नंबर 290 वाली की छत पर कूद गए। वहां कूदने से मेरे, चंदन व धर्मबीर के पैर में चोट लग गई और हमे वहां से दूसरी फैक्टरी में काम करने वाले कर्मियों ने लाकर अस्पताल में भर्ती कराया। क्योंकि मेरे व अन्य कई के पैर से चला नहीं जा रहा था और हम छत पर पड़े हुए थे। इस तरह राकेश ने फैक्टरी में आग लगने के बाद क्या-क्या हुआ और उन्होंने किस तरह जागने के बाद जान बचाई, यह पूरी बात अमर उजाला को बताई है।
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हमें सामने दिख रही थी मौत
फैक्टरी कर्मी राकेश ने पूरी घटना के बारे में बताया जरूर, लेकिन वह फैक्टरी में आग लगने के बाद वहां फंसे होने को याद करके बार-बार सिंहर जाता था। उसने बताया कि जब कमरे से निकलकर बाहर आया तो नीचे ऊंची-ऊंची आग की लपटें उठ रहीं थीं। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि मौत आज सामने है और किसी भी तरह से नहीं बच सकते। लेकिन उसी समय अचानक छत पर जाकर नीचे कूदने का ख्याल आया और छत से बराबर वाली फैक्टरी की छत पर कूद गए। पैर जरूर टूट गए, लेकिन जिंदगी बच गई।
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वीरेंद्र व जालंधर साथ सोए थे, जालंधर कूदकर बच गया
फैक्टरी में छत पर जालंधर व वीरेंद्र राम दोनों साथ में छत पर सोए हुए थे। जब आग लगी तो उस समय राकेश शोर मचा रहा था और छत पर सोया जालंधर भी जाग गया। जालंधर ने बताया कि उसने अपने साथ सोए हुए साथी वीरेंद्र राम को जगा दिया। जब वह सभी छत पर एकत्र हो गए और नीचे कमरों में सोने वाले अधिकतर कर्मी छत पर आ गए तो उन्होंने बराबर वाली फैक्टरी की छत पर कूदना शुरू कर दिया। जिस फैक्टरी में आग लगी थी, उसकी छत से बराबर वाली फैक्टरी की छत लगभग 15 फुट नीचे है। वहां तक आने के बाद वीरेंद्र राम वापस चला गया। जालंधर ने बताया कि वह छत की ऊंचाई ज्यादा होने के कारण नहीं कूदा और वह सीढ़ियों से आने के कारण फैक्टरी में नीचे आ गया। जालंधर ने बताया कि शायद उसी समय वह आग की चपेट में आकर फंस गया और वह किसी भी तरह से नहीं निकल सका।
सुशील ने ढूंढी सीढ़ी तो उसे लगाकर उतर गया
जिस समय फैक्टरी में आग लगी और वहां फंसे कर्मी छत पर पहुंचकर दूसरी फैक्टरी की छत पर कूदने लगे तो उसी समय कर्मी सुशील को याद आया कि छत पर सीढ़ी रखी हुई है। उसने तुरंत ही सीढ़ी उठाकर बराबर वाली फैक्टरी की छत पर लगा दी और वह आसानी से बराबर वाली फैक्टरी की छत पर उतर गया। जबकि वीरेंद्र राम उससे पहले ही छत से फैक्टरी में नीचे उतर आया था। अगर उसके आने से पहले सीढ़ी मिल जाती तो वीरेंद्र भी छत की ऊंचाई देखकर सीढ़ियों से जाने की कोशिश नहीं करता।