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कथा में प्रवेश करें तो आपका ध्यान भगवान के सुमिरन में होना चाहिए : पलक किशोरी
Sun, 30 Mar 2025 11:45 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Sun, 30 Mar 2025 11:45 PM IST
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डबवाली की नंदीशाला में कथावाचन करतीं कथावाचक पलक किशोरी। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
सिरसा। डबवाली की नंदीशाला में रविवार को श्रीमद्भागवत कथा की शुरुआत हुई। कथा वाचक पलक किशोरी ने कथा का वाचन किया। इससे पहले उन्होंने नंदीशाला में नंदी को गुड़ खिलाया।
कथा वाचक पलक किशोरी ने कहा कि कथा में आने पर आपका परिचय भगवान का भक्त होना चाहिए। कथा में प्रवेश करें तो आपका ध्यान भगवान के सुमिरन में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान की इच्छा के बिना उनका कोई नाम नहीं ले पाता हैए याद नहीं कर पाता है। उनकी इच्छा से हुआ है कि आज आप यहां बैठकर उनका नाम सुन पाएंगे। हमें भगवान को समर्पण के भाव के साथ याद करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सभी लीलाओं का दर्पण है। यह कथा हमें भगवान के समीप लाती है। भगवान के करीब होते हैं तो अपने यर्थात को जान पाते हैं।
उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग श्रीमद्भगत गीता और श्रीमद्भागवत को एक समझते हैं, लेकिन दोनों अलग अलग हैं। वैदिक धर्म ने शास्त्रों को श्रुति और स्मृति में वर्गीकरण किया गया है। श्रुति परम ज्ञान होता है। इसके बाद आपको कुछ ज्ञान की जरूरत नहीं पड़ती है। अंतिम सत्य परम ज्ञान। श्रुति के आधार पर हम उचित व अनुचित का निर्धारण करते हैं। बाद के ग्रंथों को चार वेदों में बांटा गया है। श्रुति को कभी लिखा नहीं गया है, उसे सुना गया है। वह कब से चल रहा है, उसके बारे में हम नहीं जानते है। इसका न आदि है और न ही अंत।
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उन्होंने कहा कि कि हमें उप निषदों के बारे में बताया कि प्राण ही उत्पति है। संस्कृति में प्रा का अर्थ होता है परम व ण का अर्थ है अणु। अणु का मतलब उत्पति है। ओम शब्द के बारे में उप निषदों में ऊं की व्याख्या पूर्ण रूप से दी गई है। सांख्य शास्त्र में पुरुष और प्रकृति है। दोनों के सहयोग से ही उत्पति है। इसके अलावा हमारे 18 पुराण है। इनमें सबसे विशाल श्रीमद्भागवत कथा है। श्रीमद्भागत कथा में भगवान के अवतारों की कथा। भगवान श्रीकृष्ण को समझना है तो श्रीमद्भागवत गीता और श्रीमद्भागवत को पढ़ना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि शास्त्रों में भगवान के तीन स्वरूप है, सत्य, चित और आनंद है। इन तीनों को समझना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति भी परिवर्तनशील है और मनुष्य भी परिवर्तनशील है। सब कुछ समय-समय पर बदलता है।
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सिरसा। डबवाली की नंदीशाला में रविवार को श्रीमद्भागवत कथा की शुरुआत हुई। कथा वाचक पलक किशोरी ने कथा का वाचन किया। इससे पहले उन्होंने नंदीशाला में नंदी को गुड़ खिलाया।
कथा वाचक पलक किशोरी ने कहा कि कथा में आने पर आपका परिचय भगवान का भक्त होना चाहिए। कथा में प्रवेश करें तो आपका ध्यान भगवान के सुमिरन में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान की इच्छा के बिना उनका कोई नाम नहीं ले पाता हैए याद नहीं कर पाता है। उनकी इच्छा से हुआ है कि आज आप यहां बैठकर उनका नाम सुन पाएंगे। हमें भगवान को समर्पण के भाव के साथ याद करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सभी लीलाओं का दर्पण है। यह कथा हमें भगवान के समीप लाती है। भगवान के करीब होते हैं तो अपने यर्थात को जान पाते हैं।
उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग श्रीमद्भगत गीता और श्रीमद्भागवत को एक समझते हैं, लेकिन दोनों अलग अलग हैं। वैदिक धर्म ने शास्त्रों को श्रुति और स्मृति में वर्गीकरण किया गया है। श्रुति परम ज्ञान होता है। इसके बाद आपको कुछ ज्ञान की जरूरत नहीं पड़ती है। अंतिम सत्य परम ज्ञान। श्रुति के आधार पर हम उचित व अनुचित का निर्धारण करते हैं। बाद के ग्रंथों को चार वेदों में बांटा गया है। श्रुति को कभी लिखा नहीं गया है, उसे सुना गया है। वह कब से चल रहा है, उसके बारे में हम नहीं जानते है। इसका न आदि है और न ही अंत।
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उन्होंने कहा कि कि हमें उप निषदों के बारे में बताया कि प्राण ही उत्पति है। संस्कृति में प्रा का अर्थ होता है परम व ण का अर्थ है अणु। अणु का मतलब उत्पति है। ओम शब्द के बारे में उप निषदों में ऊं की व्याख्या पूर्ण रूप से दी गई है। सांख्य शास्त्र में पुरुष और प्रकृति है। दोनों के सहयोग से ही उत्पति है। इसके अलावा हमारे 18 पुराण है। इनमें सबसे विशाल श्रीमद्भागवत कथा है। श्रीमद्भागत कथा में भगवान के अवतारों की कथा। भगवान श्रीकृष्ण को समझना है तो श्रीमद्भागवत गीता और श्रीमद्भागवत को पढ़ना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि शास्त्रों में भगवान के तीन स्वरूप है, सत्य, चित और आनंद है। इन तीनों को समझना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति भी परिवर्तनशील है और मनुष्य भी परिवर्तनशील है। सब कुछ समय-समय पर बदलता है।