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तरकांवाली के ग्रामीणों को कारगिल सुनते ही याद आ जाती है कृष्ण कुमार की शहादत

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 25 Jul 2021 11:15 PM IST
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The villagers of Tarkanwali remember the martyrdom of Krishna Kumar as soon as they hear the name Kargil.
शहीद सिपाही कृष्ण कुमार की प्रतिमा। - फोटो : Sirsa
चोपटा। देश में 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। जिसमें देश के बहादुर बेटों ने सीमाओं की रक्षा के लिए शहादत दी। भारतीय सेना में 17वीं जाट रेजिमेंट का बहादुर सिपाही कृष्ण कुमार निवासी गांव तरकांवाली कारगिल में सबसे दुर्गम चोटी टाइगर हिल्स पर दुश्मनों से लड़ते हुए 30 मई 1999 को शहीद हो गया। लेकिन शहीद होने से पहले अपनी बहादुरी के बल पर 8 पाक सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया।
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भीषण गोलीबारी और सर्दी के कारण सेना कृृष्ण कुमार का पार्थिव शरीर बरामद नहीं कर पाई थी। करीब 45 दिन बाद बर्फ में शहीद का शव मिल पाया। जिसे लेकर भारतीय सेना के जवान 16 जुलाई को गांव तरकांवाली पहुंचे और पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। कृष्ण की शादी 27 मई 1998 को समीप के ही गांव जांडवाला बागड़ में ओमप्रकाश की पुत्री संतोष से हुई थी। शहीद की वीरांगना संतोष का कहना है कि वह अपने परिजनों के साथ गांव के पास खेत में बनी ढाणी में रहती है। वहां पर जाने वाली सड़क अभी तक कच्ची है। रेत भरे रास्ते से गुजरना काफी मुश्किल होता है। उसे इस बात का मलाल रहता है कि शहादत के दिन को सरकार व प्रशासन हर बार भूल जाता है, लेकिन वह कभी नहीं भूलती। उसका कहना है कि उसे अपने पति की पति की शहादत पर गर्व है। यदि सरकार इसी प्रकार शहीद ही शहादत की अनदेखी करती रही तो तो यह देश के लिए शहादत देने वालों का घोर अपमान होगा।
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कृष्ण में देश सेवा की भावना बचपन से ही थी। वह एक अच्छा खिलाड़ी होने के साथ पढ़ाई में भी काफी होशियार था। सरकार ने कृष्ण की शहादत के समय गांव के स्कूल का नाम उसके नाम पर करने व दर्जा बढ़ाने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक स्कूल का दर्जा नहीं बढ़ाया गया है।
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- मिठू सेवानिवृत्त फौजी तरकांवाली
शहीद कृष्ण की शहादत पर गांव तरकांवाली के ही नहीं बल्कि पूरे पैंतालिसा क्षेत्र के लोगों को नाज है। कारगिल युद्ध के शहीदों को पूरा देश कभी नहीं भूल सकता। क्षेत्र के युवा कृष्ण की देशभक्ति से प्रेरणा लेकर फौज में भर्ती होकर देशसेवा कर रहे हैं। सरकार को सभी घोषणाएं पूरी करनी चाहिए जो शहादत के समय की गई थी।
-सुरेश शर्मा गांव नाथूसरी कलां
कृष्ण गांव में बने युवा कल्ब का सदस्य था। वह हमेशा हर सामाजिक कार्यों में भाग लेता था। इसके साथ ही फौज में भर्ती होने की बातें भी करता रहता था। कृष्ण की शहादत पर हमें नाज है। लेकिन इस बात का मलाल रहता है कि उसकी शहादत के दिन 30 मई को गांव में स्मारक स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सरकार व प्रशासन कि तरफ से कोई नहीं पहुंचता।

- रमेश कुमार फौजी, गांव तरकांवाली
सरकार ने जो घोषणाएं की थी वह भी आधी अधूरी ही पूरी हो पाई है। इतना जरूर है कि शहीद के आश्रितों को आर्थिक सहायता दी जा चूकी है, शहीद के भाई को सरकारी नौकरी के अलावा परिजनों को गैस एंजेसी भी दे रखी है। गांव के स्कूल का नामकरण तो शहीद के नाम से हो गया है परंतु स्कूल का दर्जा नहीं बढ़ाया गया है। गांव के पास गुजरने वाली सड़क का नामकरण शहीद के नाम होना बाकी है। इसके अलावा गांव में बने स्मारक पर शहीद की प्रतिमा को परिजनों ने अपने खर्चे पर स्थापित किया है तथा स्मारक की चहारदीवारी ग्राम पंचायत द्वारा निकलवाई गई है। शहीद के घर को जाने वाली सड़क अभी तक कच्ची है। सिरसा में गोल डिग्गी चौक पर शहीद कृष्ण कुमार की प्रतिमा स्थापित की गई है।
-संदीप कुमार
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