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प्रगतिशील किसान विरेंद्र सहू नर्सरी में पौधे तैयार कर कर रहे कमाई, हरियाणा सरकार से मिला राज्य स्तरीय पुरस्कार

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 13 Mar 2022 10:26 PM IST
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Progressive farmer Virendra Sahu is earning by preparing saplings in nursery, got state level award from Haryana government
नर्सरी में लगे पौधों की सार संभाल करता किसान। - फोटो : Sirsa
नाथूसरी चोपटा। राजस्थान की सीमा से सटे हरियाणा के पैंतालिसा क्षेत्र में रेतीली जमीन है जिसमें परंपरागत खेती से आमदनी कम हो जाती है और आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो जाती है। लेकिन गांव गिगोरानी के किसान नाथूसरी चोपटा पंचायत समिति के निवर्तमान चेयरमैन विरेंद्र सहू ने पारंपरिक खेती के साथ बागवानी कर कमाई का जरिया खोजा। विरेंद्र ने अपने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए 22 एकड़ भूमि में किन्नू का बाग लगाया व 8 एकड़ में ऑर्गेनिक अमरूद लगाए। इससे परंपरागत कृषि के साथ अतिरिक्त आमदन शुरू हो गई। इसके अलावा सीजन के अनुसार विरेंद्र सहू की ओर से अपने खेत में इजराइली विधि से लगाए गए तरबूज व खरबूजा को क्षेत्र के लोग काफी पसंद करते हैं। इस कमाई के साथ साथ किसान विरेंद्र सहू ने सीडलैस किन्नू व मौसमी, माल्टा व नींबू के पौधे तैयार कर बेचने से कमाई का दायरा भी बढ़ा लिया है।
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वर्णिका सहू फ्रूट नर्सरी गिगोरानी में तैयार उच्च क्वालिटी के पौधों की किसानों में काफी मांग है। लीक से हटकर कुछ करने के जज्बे ने राजनीति व समाजसेवा के साथ साथ विरेंद्र सहू को हरियाणा के साथ-साथ निकटवर्ती राजस्थान के आसपास के गांवों में अलग पहचान भी दिलवाई। प्रगतिशील किसान वीरेंद्र साहू को चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय हिसार में आयोजित कृषि मेले में प्रोग्रेसिव फार्मर एंड हाईटेक नर्सरी के क्षेत्र में सराहनीय कार्य के लिए 15 मार्च को सम्मानित किया जाएगा वीरेंद्र सहू को यह पुरस्कार दूसरी बार मिलेगा। पुरस्कार के लिए सिरसा जिले से एकमात्र किसान वीरेंद्र सहू का चयन किया गया है।
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एमए हिंदी करने के बाद दिया खेती पर ध्यान
वीरेंद्र सहू ने बताया कि एमए हिंदी तक पढ़ाई करने के बाद खेती पर ध्यान देना शुरू किया। परंपरागत खेती के साथ आधुनिक खेती करने के इरादे से साल 2003-04 में अपनी 22 एकड़ भूमि में किन्नू का व 8 एकड़ में ऑर्गेनिक अमरूद लगाए। जिसमें अपने माता पिता का पूरा सहयोग मिला। इसी के साथ-साथ कृषि विभाग से डॉ. लक्ष्यवीर बैनीवाल व डीएचओ सतवीर शर्मा की प्रेरणा से परंपरागत खेती के साथ-साथ अतिरिक्त कमाई का जरिया शुरू होने के बाद पिछले तीन वर्षों से किन्नू, मौसमी व नींबू की पौधे तैयार कर बेचने से कमाई और बढ़ गई है। उसने बताया कि इतनी व्यस्त जीवनशैली होने के बावजूद भी वह हररोज सुबह 5 बजे से तीन या चार घंटे बाग में पौधों की देखभाल अवश्य करते हैं। वीरेंद्र सहू ने बताया कि सरकार के सहयोग से उसने खेत में एक पानी की डिग्गी भी बना ली है।
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पौधे बन रहे हैं किसानों की पहली पसंद
वीरेंद्र सहू ने बताया कि क्षेत्र के किसान बागवानी करना चाहते हैं उन्हें किन्नू व अमरूद आदि के पौधे पंजाब के अबोहर व फाजिल्का से लाने पड़ते हैं। इतनी दूर से पौधे लाने में खर्च भी काफी आता है। इसी समस्या को देखते हुए उन्होंने गांव गिगोरानी में अपने खेत में वर्णिका सहू फ्रूट नर्सरी बनाकर पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से सीडलैस किन्नू की किस्म लाकर नर्सरी में ही पौधे तैयार करने लगा। इसके साथ ही मौसमी, माल्टा व नींबू की कई किस्मों को भी तैयार पौधे तैयार किए जाते हैं। अब किसानों को अन्य राज्यों या दूर से पौधे नहीं लाने पड़ेंगे। उसने सबसे पहले गांव में बाग लगाया। उसके बाग को देखकर गांव के कई किसानों ने भी किन्नू के बाग लगाकर कमाई शुरू कर दी है।

ताइवान कंपनी का खरबूजा व तरबूज खरीदने का रुझान
वीरेंद्र सहू ने बताया कि इजराइली विधि बोए गए ताइवान कंपनी के खरबूजा व तरबूज की काफी मांग है। उन्होंने बताया कि इस विधि से खरबूजा व तरबूज लगाने से मात्र 90 दिनो में प्रति एकड़ के हिसाब से 2 से ढाई लाख रुपये की कमाई हो जाती है। उन्होंने बताया कि वे सब्जियां ऑर्गेनिक तरीके से अपने खेत में ही उगाते हैं। मौसम के अनुसार बैंगन, घीया, तोरी, टमाटर, लहसून, प्याज, गाजर इत्यादि उगा लेते हैं। सहू ने बताया कि वे धान की पराली का प्रबंधन भी देसी तरकी से करते हैं। पराली को वो किन्नू व अमरूद के पेड़ों के पास बिखेर देते हैं। गलने के बाद यह पराली खाद का काम करती है। जिससे दो फायदे होते हैं एक तो पराली को जलाना नहीं पड़ता जिससे प्रदूषण नहीं होता। दूसरा इस विधि से पौधों को प्राकृतिक खाद के रूप में पोषक तत्व ज्यादा मिलते हैं।
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