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Sirsa News: दूरदर्शन पर चाचा को भंगड़ा करते देख मनिंद्र सिंह बनाया प्रोफेशन, विदेशों तक बनाई पहचान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 17 Sep 2023 11:17 PM IST
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Manindra Singh became a profession after seeing his uncle performing Bhangra on Doordarshan, gained recognition even in foreign countries.
अनुपमा जाखड़
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सिरसा। कहते है हर सफल इंसान के पीछे उसकी एक कहानी जरूर जुड़ी होती है। जिससे प्रेरणा लेकर इंसान अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करता है। ऐसा ही कुछ पटियाला के रहने वाले मनिंद्र सिंह ने किया है। मनिंद्र ने दूरदर्शन पर अपने चाचा के भंगड़े को देखकर अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया और आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है।

हाल ही में मनिंद्र सिंह शहर की चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय में चल रही थियेटर वर्कशाॅप में विद्यार्थियों को भंगड़े के स्टेप सिखा रहा है। सिंह के पास इस समय 100 से लेकर 150 छात्र भंगड़े की विधा सीख रहे हैं। भंगड़ा सिखाने का ये सफर अधिकारिक रूप से 2012 से शुरू हुआ। मनिंद्र सिंह अब तक पंजाबी संस्कृति का प्रचार प्रसार नेशनल से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक कर चुके हैं। मनिंद्र सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश, सऊदी अरब, इंडोनेशिया सहित अन्य देशों में जा चुके हैं। यहां पर उन्हें व उनकी टीम को वहां की पंजाबी संस्थाओं, प्रशासन की ओर से बुलाया जाता है। संवाद
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अब तक मनिंद्र को मिल चुके हैं कई अवाॅर्ड
मनिंद्र सिंह बताते है कि अब तक उन्हें बहुत से अवॉर्ड मिल चुके हैं। मनिंद्र को जोन में 3 गोल्ड मेडल, इंटरजोन में 3 गोल्ड मेडल, इंटरजोन में 2 गोल्ड मेडल, नेशनल में 2 गोल्ड मेडल व इंटरनेशनल में 1 गोल्ड मेडल मिल चुका है।
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पंजाबी सभ्यता को बचाने के लिए लगाते है निशुल्क में वर्कशॉप

भंगड़ा कोच मनिंद्र सिंह बताते है कि पंजाबी सभ्यता को बचाने के लिए वो निरंतर प्रयास कर रहे है। जिसके तहत वो पटियाला शहर में निशुल्क वर्कशॉप लगाते हैं। इस दौरान वो उन युवाओं को फ्री में भंगड़ा सिखाते है जो असल में पंजाबी कल्चर से प्रेम करता है और इसे आगे बढ़ाने के लिए उनके साथ है।




इस प्रकार शुरू हुआ भंगड़ा कोच बनने का सफर



मनिंद्र सिंह बताते हैं कि जब छोटे थे तो दूरदर्शन देखा करते थे, क्योंकि उस समय इतने चैनल नहीं हुआ करते थे। उस समय उनके चाचा तजिंद्र सिंह जालंधर दूरदर्शन में भंगड़ा टीम में होते थे। जिनका कार्यक्रम प्रतिदिन आता था। उन्हीं को देखकर उनके मन में भंगड़ा करने का शौक जगा। 2012 में उन्हें पटियाला विश्वविद्यालय में बतौर भंगड़ा निदेशक विद्यार्थियों को विधा सिखाने का अवसर मिला।


स्कूल में शिक्षक ने दी फटकार, आज उसी शिक्षक ने लगाई सिफारिश



मनिंद्र ने बताया कि जब वो बचपन में करीब 7-8 साल की उम्र में स्कूल में भंगड़ा करना चाहते थे तो उस समय उन्हें शिक्षकों का स्पोर्ट नहीं मिला। एक शिक्षक ने भंगड़ा करने पर फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि तू जिंदगी में कभी भी भंगड़ा नहीं कर सकता। सिंह ने बताया कि आज उन्हीं शिक्षक ने मुझसे अपने बेटे को भंगड़ा सिखाने के लिए सिफारिश लगाई। सिंह ने कहा कि आज वो जिस मुकाम पर है उसका पूरा श्रेय उनके परिवार को जाता है। क्योंकि उनके परिवार ने हर मुश्किल में उनका साथ निभाया।



विदेशों में पंजाबी कल्चर का बहुत क्रेज


भंगड़ा कोच मनिंद्र सिंह ने बताया कि जब वो विदेशों में जाते है तो उन्हें बहुत मान-सम्मान दिया जाता है। यहीं नहीं बाहर के लोगों में पंजाबी कल्चर को लेकर बहुत ज्यादा क्रेज है। हर कोई पंजाबी गानों को सुनता है। लोग भंगड़ा करते है, गिद्दा करते है। यहां तक जब वो मध्यप्रदेश या फिर यूपी में जाते है तो वहां भी लोग पंजाबी गानों व भंगड़े को बहुत पसंद करते हैं। उन्हें भंगड़े में प्रयोग होने वाली रंग-बिरंगी पोशाक, सखीफूल, भंगड़े में प्रयोग होने वाले वाद्ययंत्र बहुत पसंद आते हैं।
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