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Sirsa News: शहीद कृष्ण कुमार से प्रेरित होकर 30 युवा फौज में कर रहे देश सेवा
Tue, 25 Jul 2023 11:46 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Tue, 25 Jul 2023 11:46 PM IST
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शहीदी स्मारक पर बनी कृष्ण कुमार की प्रतिमा। संवाद
नरेश बैनीवाल
चोपटा (सिरसा) । 26 जुलाई, पूरा देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है और देश के लिए अपना बलिदान देने वाले शहीदों को याद कर उन्हें नमन कर रहा है। कारगिल युद्ध का नाम सुनते ही गांव तरकांवाली के ग्रामीणों में गांव के सिपाही शहीद कृष्ण कुमार की शहादत की यादें ताजा हो जाती हैं। शहीद कृष्ण कुमार की देश भक्ति से प्रेरित होकर करीब 30 युवा फौज में भर्ती होकर देश सेवा का रहे हैं।
कृष्ण कुमार की शहादत पर तो ग्रामीणों को नाज है, परंतु सरकार द्वारा शहीद के शहीदी दिवस पर दिखाई जाती बेरुखी पर वे काफी नाराज हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हमारे जवानों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। हमें तो शहीद कृष्ण कुमार की शहादत का दिन 30 मई याद रहता, परंतु सरकार व प्रशासन हर बार बलिदान दिवस को भूल जाता है। इसके अलावा सरकार द्वारा कई घोषणाएं की गई थी, वह भी आधी अधूरी ही पूरी हुई हैं।
शहीद की वीरांगना संतोष का कहना है कि अपने पति की शहादत पर गर्व है। उन्होंने बताया कि गांव में बने स्मारक पर शहीद की प्रतिमा को परिजनों ने अपने खर्चे पर स्थापित किया है तथा स्मारक की चारदीवारी ग्राम पंचायत ने निकलवाई है। उन्होंने कहा कि गांव के स्कूल का नामकरण तो शहीद के नाम से हो गया है, परंतु स्कूल का दर्जा नहीं बढ़ाया गया है। गांव के पास गुजरने वाली सड़क का नामकरण भी शहीद के नाम होना बाकी है। हालांकि शहीद के आश्रितों को आर्थिक सहायता दी जा चुकी है। शहीद के भाई को सरकारी नौकरी के अलावा परिजनों को गैस एजेंसी भी दी गई है।
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ये हो चुके है सेना में भर्ती
शहीद कृष्ण कुमार की शहादत से प्रेरित होकर जगवीर पुत्र सुभाष चंद्र, केवल पुत्र जसवंत, अंकुश पुत्र ओमप्रकाश, आकाश पुत्र सुभाष चंद्र यादव, शक्ति पुत्र श्योप्रकाश सेना में भर्ती होकर देशसेवा कर रहे हैं।
आठ दुश्मनों को मौत के घाट उतारकर शहीद हुए थे कृृष्ण कुमार
अमर सिंह सोनी ने बताया कि भारतीय सेना में 17वीं जाट रेजिमेंट के सिपाही कृष्ण कुमार सबसे दुर्गम चोटी टाइगर हिल्स पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए 30 मई 1999 को शहीद हो गए थे। इससे पहले उन्होंने अपनी बहादुरी के बल पर आठ पाक सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया था। भीषण गोलीबारी और सर्दी के कारण कृृष्ण कुमार का पार्थिव शरीर 45 दिन बाद बर्फ में मिल गया। इसे लेकर भारतीय सेना के जवान 16 जुलाई को गांव तरकांवाली पहुंचे और पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। शहीद कृष्ण कुमार की सेना में पहली नियुक्ति श्रीनगर में हुई थी व अंत तक वहीं रही।
कृष्ण कुमार में देश सेवा की भावना बचपन से ही थी। कृष्ण एक अच्छा खिलाड़ी होने के साथ साथ पढ़ाई में होशियार था। गांव शाहपूरिया के स्कूल में पढ़ाई करने के लिए जाते तो कृष्ण हमेशा ही देशभक्ति से ओतप्रोत बातें करता था। सरकार ने कृष्ण की शहादत के समय गांव के स्कूल का नामकरण शहीद के नाम व दर्जा बढ़ाने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक स्कूल का दर्जा मिडिल से हाई स्कूल का दर्जा भी नहीं दिया है। - लीलू राम बैनीवाल, सहपाठी, गांव तरकांवाली।
कृष्ण कुमार सदा से ही हंसमुख व सादगी पसंद था। खेलों में समाज सेवा में हर समय आगे रहता था। वाॅलीबाल प्रतियोगिताओं में कई बार साथ खेलते थे। उस समय की बातें कारगिल का नाम सुनते ही याद आने लगती हैं। कृष्ण कुमार गांव में बने युवा क्लब का सदस्य था। वह हमेशा ही फौज में भर्ती होकर देशसेवा करने की बात करता था। उसने इस बात को पूरा करते हुए देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। - राय सिंह, सहपाठी, गांव तरकांवाली।
कारगिल युद्ध में शहीद सिपाही कृष्ण कुमार की शहादत पर हमें नाज है। इस बात का मलाल रहता है कि उनकी शहादत के दिन 30 मई को गांव में स्मारक स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सरकार व प्रशासन की तरफ से कोई नहीं पहुंचता। सरकार घोषणाएं तो करती है, लेकिन अमल करना भूल जाती है या फिर आधी अधूरी ही पूरी हो पाती है। यदि मामला देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले जांबाज सिपाही का हो तो लोगों के मन में पीड़ा होना स्वाभाविक है। - संदीप बांदर, भतीजा तरकांवाली।
कारगिल युद्ध के शहीदों को पूरा देश कभी नहीं भूल सकता। क्षेत्र के युवा कृष्ण कुमार की देशभक्ति से प्रेरणा लेकर फौज में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं और बहुत से युवा भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। सरकार को भी सभी घोषणाएं पूरी करनी चाहिए, जो शहादत के समय की गई थी। - युवा पवन गहलोत गांव नाथूसरी कलां।
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चोपटा (सिरसा) । 26 जुलाई, पूरा देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है और देश के लिए अपना बलिदान देने वाले शहीदों को याद कर उन्हें नमन कर रहा है। कारगिल युद्ध का नाम सुनते ही गांव तरकांवाली के ग्रामीणों में गांव के सिपाही शहीद कृष्ण कुमार की शहादत की यादें ताजा हो जाती हैं। शहीद कृष्ण कुमार की देश भक्ति से प्रेरित होकर करीब 30 युवा फौज में भर्ती होकर देश सेवा का रहे हैं।
कृष्ण कुमार की शहादत पर तो ग्रामीणों को नाज है, परंतु सरकार द्वारा शहीद के शहीदी दिवस पर दिखाई जाती बेरुखी पर वे काफी नाराज हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हमारे जवानों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। हमें तो शहीद कृष्ण कुमार की शहादत का दिन 30 मई याद रहता, परंतु सरकार व प्रशासन हर बार बलिदान दिवस को भूल जाता है। इसके अलावा सरकार द्वारा कई घोषणाएं की गई थी, वह भी आधी अधूरी ही पूरी हुई हैं।
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शहीद की वीरांगना संतोष का कहना है कि अपने पति की शहादत पर गर्व है। उन्होंने बताया कि गांव में बने स्मारक पर शहीद की प्रतिमा को परिजनों ने अपने खर्चे पर स्थापित किया है तथा स्मारक की चारदीवारी ग्राम पंचायत ने निकलवाई है। उन्होंने कहा कि गांव के स्कूल का नामकरण तो शहीद के नाम से हो गया है, परंतु स्कूल का दर्जा नहीं बढ़ाया गया है। गांव के पास गुजरने वाली सड़क का नामकरण भी शहीद के नाम होना बाकी है। हालांकि शहीद के आश्रितों को आर्थिक सहायता दी जा चुकी है। शहीद के भाई को सरकारी नौकरी के अलावा परिजनों को गैस एजेंसी भी दी गई है।
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ये हो चुके है सेना में भर्ती
शहीद कृष्ण कुमार की शहादत से प्रेरित होकर जगवीर पुत्र सुभाष चंद्र, केवल पुत्र जसवंत, अंकुश पुत्र ओमप्रकाश, आकाश पुत्र सुभाष चंद्र यादव, शक्ति पुत्र श्योप्रकाश सेना में भर्ती होकर देशसेवा कर रहे हैं।
आठ दुश्मनों को मौत के घाट उतारकर शहीद हुए थे कृृष्ण कुमार
अमर सिंह सोनी ने बताया कि भारतीय सेना में 17वीं जाट रेजिमेंट के सिपाही कृष्ण कुमार सबसे दुर्गम चोटी टाइगर हिल्स पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए 30 मई 1999 को शहीद हो गए थे। इससे पहले उन्होंने अपनी बहादुरी के बल पर आठ पाक सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया था। भीषण गोलीबारी और सर्दी के कारण कृृष्ण कुमार का पार्थिव शरीर 45 दिन बाद बर्फ में मिल गया। इसे लेकर भारतीय सेना के जवान 16 जुलाई को गांव तरकांवाली पहुंचे और पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। शहीद कृष्ण कुमार की सेना में पहली नियुक्ति श्रीनगर में हुई थी व अंत तक वहीं रही।
कृष्ण कुमार में देश सेवा की भावना बचपन से ही थी। कृष्ण एक अच्छा खिलाड़ी होने के साथ साथ पढ़ाई में होशियार था। गांव शाहपूरिया के स्कूल में पढ़ाई करने के लिए जाते तो कृष्ण हमेशा ही देशभक्ति से ओतप्रोत बातें करता था। सरकार ने कृष्ण की शहादत के समय गांव के स्कूल का नामकरण शहीद के नाम व दर्जा बढ़ाने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक स्कूल का दर्जा मिडिल से हाई स्कूल का दर्जा भी नहीं दिया है। - लीलू राम बैनीवाल, सहपाठी, गांव तरकांवाली।
कृष्ण कुमार सदा से ही हंसमुख व सादगी पसंद था। खेलों में समाज सेवा में हर समय आगे रहता था। वाॅलीबाल प्रतियोगिताओं में कई बार साथ खेलते थे। उस समय की बातें कारगिल का नाम सुनते ही याद आने लगती हैं। कृष्ण कुमार गांव में बने युवा क्लब का सदस्य था। वह हमेशा ही फौज में भर्ती होकर देशसेवा करने की बात करता था। उसने इस बात को पूरा करते हुए देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। - राय सिंह, सहपाठी, गांव तरकांवाली।
कारगिल युद्ध में शहीद सिपाही कृष्ण कुमार की शहादत पर हमें नाज है। इस बात का मलाल रहता है कि उनकी शहादत के दिन 30 मई को गांव में स्मारक स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सरकार व प्रशासन की तरफ से कोई नहीं पहुंचता। सरकार घोषणाएं तो करती है, लेकिन अमल करना भूल जाती है या फिर आधी अधूरी ही पूरी हो पाती है। यदि मामला देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले जांबाज सिपाही का हो तो लोगों के मन में पीड़ा होना स्वाभाविक है। - संदीप बांदर, भतीजा तरकांवाली।
कारगिल युद्ध के शहीदों को पूरा देश कभी नहीं भूल सकता। क्षेत्र के युवा कृष्ण कुमार की देशभक्ति से प्रेरणा लेकर फौज में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं और बहुत से युवा भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। सरकार को भी सभी घोषणाएं पूरी करनी चाहिए, जो शहादत के समय की गई थी। - युवा पवन गहलोत गांव नाथूसरी कलां।