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अंग्रेजों को कॉटन देने वाले हलके में बंद हो रहीं इकाइयां
ब्यूरो/अमर उजाला, सिरसा
Updated Tue, 28 Oct 2014 01:19 AM IST
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सफेद सोना पैदा करने में प्रदेश भर में अग्रणी डबवाली के उद्योग आखिरी सांस ले रहे हैं। चार-पांच दशक में यहां 10 से ज्यादा कॉटन फैक्टरियां बंद हो चुकी हैं और अब केवल दो ही बची हैं।
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ऐसे में नई सरकार से वेंटिलेटर पर पड़े कृषि आधारित उद्योगों में नई जान फूंकने की आस है। भारत में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान ही डबवाली का कॉटन पूरे मुल्क में ही नहीं ब्रिटेन में भी मशहूर रहा है।
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कॉटन को देश की मुख्य बंदरगाह तक पहुंचाने के बाद ब्रिटेन ले जाने के लिए अंग्रेजों ने डबवाली में रेलवे लाइन विकसित की।
आजादी मिलने के बाद हलका डबवाली में कॉटन आधारित उद्योग स्थापित होने लगे। शहर के चारों कोनों में कारखाने खुलने से रोजगार के व्यापक अवसर नजर आने लगे।
उस समय डबवाली में करीब 10 से 12 कॉटन फैक्टरी स्थापित हुई, लेकिन प्रदेश में समय-समय पर आई सरकारों की नजरअंदाजी के चलते एक के बाद एक ये उद्योग बंद होते चले गए।
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इस वर्ष भी करोड़ों रुपये का घाटा सहकर दो फैक्टरी बंद हो गई। डबवाली जैसे कॉटन उत्पादक क्षेत्र में अब मात्र दो फैक्टरी बची हैं और वे भी अपनी अंतिम सांस ले रही हैं।
1987 में हुई थी सुगबुगाहट
वर्ष 1987 में देवीलाल की सरकार आने के बाद हलका डबवाली में कॉटन आधारित उद्योग विकसित करने की मुहिम शुरू हुई थी।
इसके लिए गांव सकताखेड़ा के निकट जगह का चयन करने की भी प्रक्रिया आरंभ हो गई थी, लेकिन योजना सिरे नहीं चढ़ पाई।
इसके बाद किसी भी सरकार ने हलका डबवाली में उद्योग स्थापित करने की कोशिश नहीं की।
हरियाणा में नहीं मिल रहा सही भाव
इस वर्ष उपमंडल डबवाली में 77 हजार 278 हेक्टेयर क्षेत्र में कॉटन का उत्पादन हुआ है। इसके बावजूद डबवाली क्षेत्र में कॉटन आधारित उद्योग पनपने की बजाए सिमट रहे हैं।
इस वर्ष बंद हुई दो फैक्टरी की वजह सरकार रही है। चूंकि पिछले वर्ष भाव कम होने की वजह से किसानों ने अपनी फसल को डबवाली में लाने की अपेक्षा पंजाब में स्थित फैक्टरी मालिकों को बेच दिया था।
इस बार भी ऐसा हो रहा है भाव 3900 से 4100 रुपये है। हरियाणा का माल पंजाब में जा रहा है। जिससे डबवाली स्थित फैक्टरियों को कॉटन मिलने में दिक्कत आ रही है। डबवाली की अनाज मंडी से भी करीब 75 फीसदी माल पंजाब में जा रहा है।
पंजाब में ऊंची है रुई की कीमत
गांव शेरगढ़ स्थित श्री राधा-कृष्ण कॉटेक्स के संचालक दीपक गोयल ने बताया कि पंजाब में रुई हरियाणा के मुकाबले 100 रुपये महंगी है।
इसके चलते वहां स्थित फैक्ट्रियां हरियाणा से अधिक भाव देकर किसानों से कॉटन ले जा रही है। इसके साथ वे हरियाणा को टैक्स और मार्केट फीस के रूप में चूना लगा रही हैं। वहीं हरियाणा में स्थित फैक्टरियों की कमर भी तोड़ रही हैं।
इसी का नतीजा रहा कि पिछले वर्ष आवश्यक कॉटन न मिलने के के कारण दो फैक्टरियों को करोड़ों रुपये का घाटा सहना पड़ा। उम्मीद है नई सरकार उद्योगों के लिए अच्छी पॉलिसी लेकर आएगी।
पंजाब में जाने से रुके कॉटन
सत्यनारायण रामचंद्र कॉटन फैक्टरी के संचालक पवन शारदा ने बताया कि इस वर्ष पूरे भारत में कॉटन व्यवसाय को 254 लाख गांठ की जरूरत है, लेकिन उत्पादन 425 लाख गांठ का हुआ है।
किसान कम भाव के कारण फसल को मार्केट में नहीं ला रहे। जो माल आ रहा है, उसे पंजाब में भेजा जा रहा है। इससे डबवाली में खुली फैक्टरियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं हरियाणा सरकार को भी राजस्व की क्षति हो रही है।
फैक्टरियां घाटे में चल रही हैं। डबवाली जैसे कॉटन उत्पादक क्षेत्र के लिए सरकार को विशेष पॉलिसी बनाने की जरूरत है ताकि कॉटन आधारित उद्योग धंधे स्थापित होने के साथ-साथ क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सके।
हरियाणा में बनवा रखे हैं लाइसेंस
किसान चाहे हरियाणा प्रदेश का हो या फिर पंजाब का। वह अपनी फसल कहीं भी बेचे उसे रोका नहीं जा सकता। यहां तक पंजाब के व्यापारियों का सवाल है, कुछ लोगों ने हरियाणा में अपना लाइसेंस बना रखा है।
वे बोली करने के बाद माल को ले जा सकते हैं। रामबाग के नजदीक एक नाका लगाया हुआ है, जहां गलत तरीके से ले जाया जा रहा माल पकड़ लिया जाता है।
- हेतराम, कार्यकारी सचिव, मार्केट कमेटी, डबवाली