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पहले एक कनाल में हरी मिर्च लगाई, अब 10 एकड़ में सब्जियां लगा कमा रहे 12 लाख रुपये सालाना
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किसान रामचंद्र बैनीवाल अपने खेत में लगाई हुई फसल दिखाता हुआ।
- फोटो : Sirsa
चोपटा (सिरसा)। राजस्थान की सीमा से सटे पैंतालिसा क्षेत्र में कई वर्षों से घाटे का सौदा बन रही खेती के चलते आर्थिक तंगी के कारण किसानों के घर परिवारों की स्थिति डगमगाने लगी। ऐसे में कई किसानों ने परंपरागत खेती के साथ-साथ आधुनिक तरीके से खेती करके अपने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने का काम किया। गांव रायपुर के किसान रामचंद्र बैनीवाल ने साल 2015 में मात्र एक कनाल जमीन में हरी मिर्च की खेती कर कमाई शुरू की। जिसमें बचत होने पर अगले साल 1 एकड़ में हरी मिर्च और 2 एकड़ में बैंगन की खेती की। जिससे उसे 4 लाख रुपये की बचत हुई।
उसके बाद रामचंद्र ने 10 एकड़ में तरबूज, गाजर, बैंगन, तोरी, हरी मिर्च, देसी ककड़ी सहित मौसमी सब्जियां लगाना शुरू किया। जिससे उसकी सालाना कमाई लगभग 12 लाख रुपये हुई। कुल 12 एकड़ जमीन में से 10 एकड़ जमीन में ऑर्गेनिक तरीके से मौसमी सब्जियां लगाकर रामचंद्र ने घाटे का सौदा बनी खेती को फायदे में बदल दिया। किसान रामचंद्र के खेत से हिसार, फतेहाबाद सहित राजस्थान के नोहर, भादरा व हनुमानगढ़ सहित दूर-दूर से सब्जियां व तरबूज लेने के लिए व्यापारी आते हैं। विपरीत परिस्थितियों में कुछ करने के जज्बे ने किसान रामचंद्र को आसपास के गांवों सहित हरियाणा व निकटवर्ती राजस्थान में अलग पहचान दिलवाई। जिससे अन्य किसान भी उससे प्रेरणा ले आधुनिक तरीके से खेती शुरू की है।
10 एकड़ में मौसमी सब्जियां लगाकर हो रही है कमाई
जिला सिरसा के गांव रायपुर के किसान रामचंद्र बैनीवाल ने बताया कि परंपरागत कृषि के साथ-साथ कोई अन्य काम धंधा करने का मन उन्होंने 12वीं कक्षा की पढ़ाई के बाद ही बना लिया था। ऐसे में उन्होंने परंपरागत खेती के साथ अतिरिक्त कमाई करने का जरिया खोजना शुरू किया। उन्होंने ने बताया कि परंपरागत खेती में खर्चा ज्यादा बचत कम होने पर घाटा ही लगता है ऐसे में घर की आर्थिक स्थिति काफी बिगड़ गई। तो उन्होंने साल 2015 में मात्र एक कनाल में हरी मिर्च की बिजाई प्रयोग के तौर पर की। उससे उन्हें ठीक-ठाक मुनाफा हुआ। अगले साल अपने घर वालों के सहयोग से 1 एकड़ जमीन में हरी मिर्च और 2 एकड़ जमीन में बैंगन की खेती की जिससे करीब 4 लाख रुपये की बचत हुई । धीरे-धीरे करके मौसमी सब्जियां लगाने का सिलसिला शुरू किया।
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दवा की बजाय जैविक खाद का किया इस्तेमाल
रामचंद्र ने खेती में दवा का प्रयोग बिल्कुल ही बंद कर दिया। फिलहाल वह साल 2020 में पूरी तरह से ऑर्गेनिक सब्जियां लगाने में जुटे हैं। इस दौरान कद्दू, गाजर, मूली, धनियां, आलू, तरबूज, देसी ककड़ी, हरी मिर्च, तोरी, लौकी सहित कई प्रकार की मौसमी सब्जियां लगाकर अपनी कमाई को बढ़ाया। जिससे उन्हें करीब 12 लाख रुपये की हर साल बचत होने लगी। इस खेती में उन्होंने पूरी तरह से जैविक खाद्य, दवाइयों का प्रयोग किया। जैविक दवाइयां बनाने के लिए उन्होंने लस्सी, मेथी दाना, गाय का गोबर, गोमूत्र तथा हरी खाद का ही प्रयोग किया। इस साल उन्होंने 6 एकड़ में तरबूज और 3 एकड़ जमीन में देसी ककड़ी की बिजाई की। जो कि पूरी तरह पक कर तैयार है। उसके खेत से तरबूज खरीदने के लिए हिसार, फतेहाबाद, राजस्थान के हनुमानगढ़, नोहर, भादरा से व्यापारी आ रहे हैं। पिछले वर्ष उन्होंने अकेले तरबूज की खेती से 10 लाख रुपये की कमाई की थी।
ड्रिप सिस्टम से पानी की भी कर रहे बचत
रामचंद्र बैनीवाल ने बताया कि उन्होंने अपने खर्चे से खेत में पानी की डिग्गी बना रखी है।इसके अलावा उन्हें सरकार की सहायता से 7 एकड़ जमीन के लिए ड्रिप सिस्टम मिला हुआ है। जिससे सब्जियों के पौधों व बेलों की सिंचाई करता है। उन्होंने बताया कि ड्रिप सिस्टम से पानी की काफी बचत होती है और पानी, खाद इत्यादि पौधों की जड़ों में सीधे मिल जाता है। किसान रामचंद्र का कहना है कि मार्केट में उन्नत किस्म की ककड़ी और तरबूज की मांग ज्यादा है। किसान परंपरागत फसलों के साथ-साथ इस प्रकार की मौसमी सब्जियां उगाकर अपनी कमाई को बढ़ाकर आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
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उसके बाद रामचंद्र ने 10 एकड़ में तरबूज, गाजर, बैंगन, तोरी, हरी मिर्च, देसी ककड़ी सहित मौसमी सब्जियां लगाना शुरू किया। जिससे उसकी सालाना कमाई लगभग 12 लाख रुपये हुई। कुल 12 एकड़ जमीन में से 10 एकड़ जमीन में ऑर्गेनिक तरीके से मौसमी सब्जियां लगाकर रामचंद्र ने घाटे का सौदा बनी खेती को फायदे में बदल दिया। किसान रामचंद्र के खेत से हिसार, फतेहाबाद सहित राजस्थान के नोहर, भादरा व हनुमानगढ़ सहित दूर-दूर से सब्जियां व तरबूज लेने के लिए व्यापारी आते हैं। विपरीत परिस्थितियों में कुछ करने के जज्बे ने किसान रामचंद्र को आसपास के गांवों सहित हरियाणा व निकटवर्ती राजस्थान में अलग पहचान दिलवाई। जिससे अन्य किसान भी उससे प्रेरणा ले आधुनिक तरीके से खेती शुरू की है।
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10 एकड़ में मौसमी सब्जियां लगाकर हो रही है कमाई
जिला सिरसा के गांव रायपुर के किसान रामचंद्र बैनीवाल ने बताया कि परंपरागत कृषि के साथ-साथ कोई अन्य काम धंधा करने का मन उन्होंने 12वीं कक्षा की पढ़ाई के बाद ही बना लिया था। ऐसे में उन्होंने परंपरागत खेती के साथ अतिरिक्त कमाई करने का जरिया खोजना शुरू किया। उन्होंने ने बताया कि परंपरागत खेती में खर्चा ज्यादा बचत कम होने पर घाटा ही लगता है ऐसे में घर की आर्थिक स्थिति काफी बिगड़ गई। तो उन्होंने साल 2015 में मात्र एक कनाल में हरी मिर्च की बिजाई प्रयोग के तौर पर की। उससे उन्हें ठीक-ठाक मुनाफा हुआ। अगले साल अपने घर वालों के सहयोग से 1 एकड़ जमीन में हरी मिर्च और 2 एकड़ जमीन में बैंगन की खेती की जिससे करीब 4 लाख रुपये की बचत हुई । धीरे-धीरे करके मौसमी सब्जियां लगाने का सिलसिला शुरू किया।
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दवा की बजाय जैविक खाद का किया इस्तेमाल
रामचंद्र ने खेती में दवा का प्रयोग बिल्कुल ही बंद कर दिया। फिलहाल वह साल 2020 में पूरी तरह से ऑर्गेनिक सब्जियां लगाने में जुटे हैं। इस दौरान कद्दू, गाजर, मूली, धनियां, आलू, तरबूज, देसी ककड़ी, हरी मिर्च, तोरी, लौकी सहित कई प्रकार की मौसमी सब्जियां लगाकर अपनी कमाई को बढ़ाया। जिससे उन्हें करीब 12 लाख रुपये की हर साल बचत होने लगी। इस खेती में उन्होंने पूरी तरह से जैविक खाद्य, दवाइयों का प्रयोग किया। जैविक दवाइयां बनाने के लिए उन्होंने लस्सी, मेथी दाना, गाय का गोबर, गोमूत्र तथा हरी खाद का ही प्रयोग किया। इस साल उन्होंने 6 एकड़ में तरबूज और 3 एकड़ जमीन में देसी ककड़ी की बिजाई की। जो कि पूरी तरह पक कर तैयार है। उसके खेत से तरबूज खरीदने के लिए हिसार, फतेहाबाद, राजस्थान के हनुमानगढ़, नोहर, भादरा से व्यापारी आ रहे हैं। पिछले वर्ष उन्होंने अकेले तरबूज की खेती से 10 लाख रुपये की कमाई की थी।
ड्रिप सिस्टम से पानी की भी कर रहे बचत
रामचंद्र बैनीवाल ने बताया कि उन्होंने अपने खर्चे से खेत में पानी की डिग्गी बना रखी है।इसके अलावा उन्हें सरकार की सहायता से 7 एकड़ जमीन के लिए ड्रिप सिस्टम मिला हुआ है। जिससे सब्जियों के पौधों व बेलों की सिंचाई करता है। उन्होंने बताया कि ड्रिप सिस्टम से पानी की काफी बचत होती है और पानी, खाद इत्यादि पौधों की जड़ों में सीधे मिल जाता है। किसान रामचंद्र का कहना है कि मार्केट में उन्नत किस्म की ककड़ी और तरबूज की मांग ज्यादा है। किसान परंपरागत फसलों के साथ-साथ इस प्रकार की मौसमी सब्जियां उगाकर अपनी कमाई को बढ़ाकर आत्मनिर्भर बन सकते हैं।