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1987 में जीते रणजीत सिंह 31 साल बाद चढ़ेंगे विधानसभा की सीढ़ियां
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अपनी बड़ी भहन का आर्शिवाद लेते निर्दलीय विधायक रणजीत सिंह।
- फोटो : Sirsa
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सिरसा। सिरसा जिले की पांच विधानसभा सीटों पर सतारूढ़ भाजपा को कोई सीट नहीं मिली। पांच में से रानियां विधानसभा सीट पर आजाद उम्मीदवार रणजीत सिंह की जीत हुई। रणजीत सिंह को रानियां से दो विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा था। इसी के चलते ही कांग्रेस पार्टी ने अबकी बार उसकी टिकट काटकर नए उम्मीदवार विनीत कंबोज को दी। लेकिन विनीत कंबोज पांचवें नंबर पर रहे। टिकट कटने पर रणजीत सिंह ने आजाद चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। रणजीत सिंह 1987 के बाद अब 31 साल बाद विधानसभा चुनाव जीते हैं। इस समय के दौरान न तो वे लोकसभा और न ही विधानसभा जीत पाए।
कांग्रेस में रहकर कभी जीत नहीं पाए रणजीत सिंह
रणजीत सिंह 1987 में चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल की सरकार में कृषि मंत्री बने। चौधरी देवीलाल देश के उप प्रधानमंत्री बने तो ओपी चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। लेकिन रणजीत सिंह ने उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं हकिया और कांग्रेस में शामिल हो गए। 1996 के विधानसभा चुनावों में रणजीत सिंह को टिकट नहीं मिली। इसके बाद 1998 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी की सरकार गिरने पर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें हिसार लोकसभा क्षेत्र से टिकट दी। लेकिन वे हार गए। 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दी। लेकिन वे कांग्रेस सरकार में योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे। 2009 में नए परिसीमन के बाद रानियां विधानसभा सीट से लड़े और लेकिन कृष्ण कंबोज से हार गए। 2014 में रामचंद्र कंबोज से हार गए। लेकिन टिकट कटने के बाद कांग्रेस से बागी होकर आजाद चुनाव मैदान में उतरे और जीत गए। ऐसे में रणजीत सिंह जितना समय कांग्रेस में रहे, कभी विधायक नहीं बन पाए।
टिकट कटने पर यूं हुआ था घटनाक्रम
तीन अक्तूबर को कांग्रेस ने जब टिकटों की घोषणा की तो रणजीत सिंह ने रानियां में समर्थकों की बैठक बुलाई। चौटाला के डबवाली रोड स्थित निवास स्थान पर इनेलो सुप्रीमो ओपी चौटाला से मुलाकात करने के लिए कांग्रेस छोड़ चुके चौधरी रणजीत सिंह भी पहुंचे। तब चर्चा चली कि वे इनेलो से रानियां से उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन रणजीत सिंह ने इन चर्चाओं पर विराम लगा दिया और कहा कि वे आजाद ही लड़ेंगे। वे अपने पिता समान बड़े भाई ओपी चौटाला से आशीर्वाद लेने के लिए गए थे। वे आजाद उम्मीदवार के तौर पर ही चुनाव लड़ेंगे।
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कांग्रेस में रहकर कभी जीत नहीं पाए रणजीत सिंह
रणजीत सिंह 1987 में चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल की सरकार में कृषि मंत्री बने। चौधरी देवीलाल देश के उप प्रधानमंत्री बने तो ओपी चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। लेकिन रणजीत सिंह ने उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं हकिया और कांग्रेस में शामिल हो गए। 1996 के विधानसभा चुनावों में रणजीत सिंह को टिकट नहीं मिली। इसके बाद 1998 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी की सरकार गिरने पर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें हिसार लोकसभा क्षेत्र से टिकट दी। लेकिन वे हार गए। 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दी। लेकिन वे कांग्रेस सरकार में योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे। 2009 में नए परिसीमन के बाद रानियां विधानसभा सीट से लड़े और लेकिन कृष्ण कंबोज से हार गए। 2014 में रामचंद्र कंबोज से हार गए। लेकिन टिकट कटने के बाद कांग्रेस से बागी होकर आजाद चुनाव मैदान में उतरे और जीत गए। ऐसे में रणजीत सिंह जितना समय कांग्रेस में रहे, कभी विधायक नहीं बन पाए।
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टिकट कटने पर यूं हुआ था घटनाक्रम
तीन अक्तूबर को कांग्रेस ने जब टिकटों की घोषणा की तो रणजीत सिंह ने रानियां में समर्थकों की बैठक बुलाई। चौटाला के डबवाली रोड स्थित निवास स्थान पर इनेलो सुप्रीमो ओपी चौटाला से मुलाकात करने के लिए कांग्रेस छोड़ चुके चौधरी रणजीत सिंह भी पहुंचे। तब चर्चा चली कि वे इनेलो से रानियां से उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन रणजीत सिंह ने इन चर्चाओं पर विराम लगा दिया और कहा कि वे आजाद ही लड़ेंगे। वे अपने पिता समान बड़े भाई ओपी चौटाला से आशीर्वाद लेने के लिए गए थे। वे आजाद उम्मीदवार के तौर पर ही चुनाव लड़ेंगे।
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