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Sirsa News: श्री कृष्ण-सुदामा का मिलन देख भावुक हुए श्रद्धालु
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ओढां।कथा में श्री कृष्ण-रूकमणी के विवाह के दृश्य का मंचन करते कलाकार। (संवाद)
ओढां। गांव रोहिड़ांवाली के निकट नेशनल हाईवे के किनारे स्थित बेसहारा गोमाता अस्पताल में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का वीरवार को हवन यज्ञ एवं भंडारे के साथ समापन हो गया। कथा के अंतिम दिन कथावाचक ने श्रद्धालुओं को कथा में सुदामा चरित और श्री कृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग बेहद ही सुंदर शब्दों में सुनाया।
कथा के दौरान कलाकारों ने श्री कृष्ण-रूकमणी विवाह व श्री कृष्ण-सुदामा मिलन के दृश्यों का बेहद ही सुंदर ढंग से मंचन किया। इस दौरान मलोट से पहुंचे प्रमुख गोसेवक राजेश चलाना ने अस्पताल में घायल गोवंश को लाने व ले जाने के लिए आठ लाख की लागत की एक एंबुलेंस भेंट की। उन्होंने कहा कि गोसेवा से बढ़कर और कोई सेवा नहीं है।
कथावाचक शास्त्री जयदेव दाधीच ने श्री कृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग सुनाते हुए कहा कि विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री रुक्मणी मन ही मन भगवान श्री कृष्ण को अपना पति मान चुकी थी, लेकिन रुक्मणी का भाई राजकुमार रुकमी भगवान कृष्ण से शत्रुता रखता था। वह रुक्मणी का विवाह चेदी नरेश दमघोष के पुत्र शिशुपाल से करना चाहता था।
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रुक्मणी ने भगवान श्री कृष्ण के पास संदेश भेजा तो श्री कृष्ण रुकमणी का हरण कर द्वारकापुरी के लिए चल पड़े। इस दौरान रुकमी व अन्य राजाओं ने मार्ग में भगवान श्री कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। भगवान कृष्ण ने सभी को युद्ध में पराजित कर जब रुकमी का वध करने के लिए सुदर्शन धारण किया तो रुक्मणी के कहने पर श्री कृष्ण ने रुकमी को क्षमा कर दिया।
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सुदामा की हालत को देखकर वहीं रोक लिया
कथावाचक ने सुदामा चरित का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान श्री कृष्ण के बचपन का सखा सुदामा अपनी पत्नी सुशीला के कहने पर सुदामा अपने बाल सखा द्वारिकाधीश श्री कृष्ण से सहायता मांगने के लिए चला जाता है। श्री कृष्ण के लिए सुशीला सुदामा को चावलों की पोटली देती है। जैसे-तैसे सफर तय कर सुदामा द्वारका पहुंचता है। लेकिन श्री कृष्ण के महल के द्वारपालों ने सुदामा की हालत को देखकर उसे वहीं रोक लिया और उसका उपहास उड़ाया। फिर निराश होकर सुदामा वहां से लौटने लगा, लेकिन जब श्री कृष्ण को सुदामा के आने की खबर मिली तो वे नंगे पैर ही सुदामा के पीछे दौड़ पड़े। इसके बाद श्री कृष्ण व सुदामा का मिलन हुआ।
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कथा के दौरान कलाकारों ने श्री कृष्ण-रूकमणी विवाह व श्री कृष्ण-सुदामा मिलन के दृश्यों का बेहद ही सुंदर ढंग से मंचन किया। इस दौरान मलोट से पहुंचे प्रमुख गोसेवक राजेश चलाना ने अस्पताल में घायल गोवंश को लाने व ले जाने के लिए आठ लाख की लागत की एक एंबुलेंस भेंट की। उन्होंने कहा कि गोसेवा से बढ़कर और कोई सेवा नहीं है।
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कथावाचक शास्त्री जयदेव दाधीच ने श्री कृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग सुनाते हुए कहा कि विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री रुक्मणी मन ही मन भगवान श्री कृष्ण को अपना पति मान चुकी थी, लेकिन रुक्मणी का भाई राजकुमार रुकमी भगवान कृष्ण से शत्रुता रखता था। वह रुक्मणी का विवाह चेदी नरेश दमघोष के पुत्र शिशुपाल से करना चाहता था।
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रुक्मणी ने भगवान श्री कृष्ण के पास संदेश भेजा तो श्री कृष्ण रुकमणी का हरण कर द्वारकापुरी के लिए चल पड़े। इस दौरान रुकमी व अन्य राजाओं ने मार्ग में भगवान श्री कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। भगवान कृष्ण ने सभी को युद्ध में पराजित कर जब रुकमी का वध करने के लिए सुदर्शन धारण किया तो रुक्मणी के कहने पर श्री कृष्ण ने रुकमी को क्षमा कर दिया।
सुदामा की हालत को देखकर वहीं रोक लिया
कथावाचक ने सुदामा चरित का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान श्री कृष्ण के बचपन का सखा सुदामा अपनी पत्नी सुशीला के कहने पर सुदामा अपने बाल सखा द्वारिकाधीश श्री कृष्ण से सहायता मांगने के लिए चला जाता है। श्री कृष्ण के लिए सुशीला सुदामा को चावलों की पोटली देती है। जैसे-तैसे सफर तय कर सुदामा द्वारका पहुंचता है। लेकिन श्री कृष्ण के महल के द्वारपालों ने सुदामा की हालत को देखकर उसे वहीं रोक लिया और उसका उपहास उड़ाया। फिर निराश होकर सुदामा वहां से लौटने लगा, लेकिन जब श्री कृष्ण को सुदामा के आने की खबर मिली तो वे नंगे पैर ही सुदामा के पीछे दौड़ पड़े। इसके बाद श्री कृष्ण व सुदामा का मिलन हुआ।