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कोर्ट ने भ्रष्ट मुनीम को भाई समेत सुनाई तीन-तीन साल की कैद
ब्यूरो/अमर उजाला/सिरसा
Updated Sat, 13 Feb 2016 02:01 AM IST
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बीमार मालिक बिस्तर पर लेट गया। बेटा नहीं था, मुलाजिम को दिल के साथ लगाकर काम सौंप दिया। मुलाजिम ने विश्वास का कत्ल करते हुए पैसे उड़ाने शुरू कर दिए।
अपने भाई को भी षड्यंत्र में शामिल कर लिया। दोनों ने मालिक के विश्वास को जमकर लूटा। मामले का खुलासा होने के बाद क्राइम ब्रांच ने मामले की जांच दी। लाखों के गबन की रिपोर्ट प्रस्तुत की। शुक्रवार को अदालत ने मालिक को धोखा देने वाले दो भाईयों को तीन-तीन साल की कैद तथा पंद्रह-पंद्रह हजार रुपये अर्थदंड सुनाया। केस करीब 10 साल तक चला।
क्या है मामला
कालांवाली की फर्म मै. श्रीराम हंसराज के मालिक रामगोपाल पुत्र चंदू लाल ने 1994-95 में नवीन कुमार पुत्र ज्ञान चंद निवासी कालांवाली की सिफारिश पर उसके भानजे प्रदीप कुमार पुत्र राजकुमार निवासी शीशवाल को बतौर मुनीम रखा था। पांच-छह साल तक प्रदीप ने ईमानदारी और लगन से काम किया। जिस पर वह उस पर अति विश्वास करने लगा। धीरे-धीरे सारा काम उसे सौंप दिया। बेटी की शादी के बाद वह बिल्कुल अकेला हो गया।
बीमारी के चलते प्रदीप कुमार उसके विश्वास का नाजायज फायदा उठाने लगा। प्रदीप कुमार उसके पास खाली चेक पर मुहर लगाकर और हस्ताक्षर करवाकर रख लेता था। मौका मिलने पर चेक पर रकम भरकर, निकलवाकर अपने घर ले जाता था। लेकिन इस राशि को रोजनामचा में दर्ज न करके सीधे रोकड़ में जमा करता था। उसकी आढ़त पर आने वाले जमींदारों ने उसे बताया कि उन्हें बेची गई फसल राशि नहीं मिली है।
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इस पर उसने रिकॉर्ड की छानबीन की। पाया कि बैंक से राशि ज्यादा निकलवाई गई है और रोकड़ में काफी कम दिखाया गया है। बैंक बैलेंस शीट भी नहीं मिल रही है। खरीद एजेंसियों से प्राप्त राशि भी न रोकड़ में है और न ही लेजर में है। फर्जी रिकॉर्ड तैयार करके प्रदीप ने उससे धोखा किया है। वर्ष 2006 में रामगोपाल ने डबवाली की उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में प्रदीप तथा उसके भाई दीपक के खिलाफ इस्तगासा दायर करके इंसाफ की गुहार लगाई। जिस पर तत्कालीन उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी एके सिंगल की अदालत ने सीआरपी की धारा-156 (3) के तहत आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करने के आदेश दिए।
कालांवाली पुलिस ने केस दर्ज करने के बाद मामले को स्टेट क्राईम ब्रांच हिसार के सुपुर्द कर दिया। मामले की तफ्तीश के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को महाराष्ट्र के नगर जालना से गिरफ्तार करके स्थानीय अदालत में पेश किया था। करीब दस वर्ष तक चले मामले की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी परवेश सिंगला की अदालत ने दोनों भाईयों को तीन-तीन वर्ष के कारावास तथा पंद्रह-पंद्रह हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।
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अपने भाई को भी षड्यंत्र में शामिल कर लिया। दोनों ने मालिक के विश्वास को जमकर लूटा। मामले का खुलासा होने के बाद क्राइम ब्रांच ने मामले की जांच दी। लाखों के गबन की रिपोर्ट प्रस्तुत की। शुक्रवार को अदालत ने मालिक को धोखा देने वाले दो भाईयों को तीन-तीन साल की कैद तथा पंद्रह-पंद्रह हजार रुपये अर्थदंड सुनाया। केस करीब 10 साल तक चला।
क्या है मामला
कालांवाली की फर्म मै. श्रीराम हंसराज के मालिक रामगोपाल पुत्र चंदू लाल ने 1994-95 में नवीन कुमार पुत्र ज्ञान चंद निवासी कालांवाली की सिफारिश पर उसके भानजे प्रदीप कुमार पुत्र राजकुमार निवासी शीशवाल को बतौर मुनीम रखा था। पांच-छह साल तक प्रदीप ने ईमानदारी और लगन से काम किया। जिस पर वह उस पर अति विश्वास करने लगा। धीरे-धीरे सारा काम उसे सौंप दिया। बेटी की शादी के बाद वह बिल्कुल अकेला हो गया।
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बीमारी के चलते प्रदीप कुमार उसके विश्वास का नाजायज फायदा उठाने लगा। प्रदीप कुमार उसके पास खाली चेक पर मुहर लगाकर और हस्ताक्षर करवाकर रख लेता था। मौका मिलने पर चेक पर रकम भरकर, निकलवाकर अपने घर ले जाता था। लेकिन इस राशि को रोजनामचा में दर्ज न करके सीधे रोकड़ में जमा करता था। उसकी आढ़त पर आने वाले जमींदारों ने उसे बताया कि उन्हें बेची गई फसल राशि नहीं मिली है।
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इस पर उसने रिकॉर्ड की छानबीन की। पाया कि बैंक से राशि ज्यादा निकलवाई गई है और रोकड़ में काफी कम दिखाया गया है। बैंक बैलेंस शीट भी नहीं मिल रही है। खरीद एजेंसियों से प्राप्त राशि भी न रोकड़ में है और न ही लेजर में है। फर्जी रिकॉर्ड तैयार करके प्रदीप ने उससे धोखा किया है। वर्ष 2006 में रामगोपाल ने डबवाली की उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में प्रदीप तथा उसके भाई दीपक के खिलाफ इस्तगासा दायर करके इंसाफ की गुहार लगाई। जिस पर तत्कालीन उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी एके सिंगल की अदालत ने सीआरपी की धारा-156 (3) के तहत आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करने के आदेश दिए।
कालांवाली पुलिस ने केस दर्ज करने के बाद मामले को स्टेट क्राईम ब्रांच हिसार के सुपुर्द कर दिया। मामले की तफ्तीश के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को महाराष्ट्र के नगर जालना से गिरफ्तार करके स्थानीय अदालत में पेश किया था। करीब दस वर्ष तक चले मामले की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी परवेश सिंगला की अदालत ने दोनों भाईयों को तीन-तीन वर्ष के कारावास तथा पंद्रह-पंद्रह हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।