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गांव बकरियांवाली में 3 सरपंच के बाद दो महीने तक कुत्ते के नाम पर चली चौधर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 11 Nov 2022 11:06 PM IST
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After 3 sarpanches in village Bakrianwali, chaudhar walked in the name of dog for two months
गांव बकरियांवाली में चौपाल में बैठे ग्रामीण चर्चा करते हुए। - फोटो : Sirsa
सिरसा। पंचायत चुनाव की इस बेला में एक रोचक किस्सा सामने आया है गांव बकरियांवाली का। गांव में वर्ष 1771 से 76 के बीच पंचायत में किसी बात को लेकर विवाद हो गया। इस पर एक ही कार्यकाल के दौरान तीन सरपंच बदलने पड़े। विवाद नहीं थमने पर गांव के लोगों ने कुत्ते के नाम पर दो माह का कार्यकाल खाली छोड़ दिया।
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शुक्रवार को गांव बकरियांवाली की चौपाल में बैठे बुजुर्गों के बीच चुनाव को लेकर चर्चा चल रही थी। चौपाल में बैठे भल्लेराम बाना ने एक रोचक किस्सा सुनाया। उसने बताया कि वर्ष 1971 में पंचायत चुनाव हुए तो पंचों के पास सरपंच चुनने का अधिकार था। पहली बार रामजीलाल सरपंच बने। कुछ समय बाद उन्हें हटाकर भागमल को बना दिया। कुछ समय बाद भागमल के हाथ से भी सरपंची चली गई। फिर सरपंच बने हजारीराम। इसी दौरान एक बार फिर विवाद बढ़ने पर पंचायत का कार्यकाल दो माह का बचा तो हजारीराम के सिर से भी सरपंची का ताज छिन गया। इसके बाद गांव के किसी भी व्यक्ति पर सहमति नहीं बन पा रही थी। थक-हारकर आखिर में सभी ने बोला कि चलो अब यह कुत्ता ही सरपंच रहेगा। इस प्रकार दो माह पंचायत का कार्यकाल कुत्ते के नाम पर खाली छोड़ दिया गया। संवाद
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गांव का चुनावी इतिहास
गांव में पंचायत चुनाव का इतिहास काफी रोचक रहा है। महेंद्र, जयप्रकाश, महेंद्र बैनीवाल, विनोद कुमार व अजीत कुमार ने बताया कि वर्ष 1952 में प्रथम बार पंचायत के दौरान सर्वसम्मति से डूंगराम बाना को सरपंच चुना गया। किसी वजह से पद छूट गया तो रूगाराम सहारण को यह पद मिला। इसके पश्चात 1958 में आदराम बाना सरपंच बने, जो कि 1971 तक 14 साल इस पद पर रहे। फिर 1971 के पंचायत चुनाव में पंचों को सरपंच चुनने का अधिकार मिला तो एक ही योजना में तीन सरपंच बदल दिए। पहला भागमल, फिर हजारी राम और अंत में रामजीलाल को सरपंच बनाया गया। 1978 में बीरबल बाना, 1982 में लाधूराम पूनिया, 1988 रामजीलाल, 1991 अर्जुन राम भाकर, 1994 लाधूराम पूनिया, 2000 में विद्या देवी जाखड़, 2005 में लाधूराम पूनिया, 2010 शिमला देवी और 2015 में सुमेस्ता देवी सरपंच बनी। गांव में सबसे अधिक वर्ष तक लाधूराम पूनिया सरपंच बने रहे।
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चुनाव में मतभेद तो होते हैं, लेकिन मनभेद नहीं
गांव में पंचायत चुनाव के दौरान उम्मीदवार के समर्थन में लोगों के बीच थोड़े बहुत मतभेद हो जाते हैं, लेकिन अधिक मनभेद नहीं होता। इसलिए गांव में भाईचारा कायम है और आज तक चुनावी रंजिश सामने नहीं आई।
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