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जान पर खेलकर 25 मासूमों को बचाया था आग से
अमर उजाला सिरसा/ब्यूरो
Updated Sat, 02 Jan 2016 01:58 AM IST
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आग का दरिया पार करके 25 मासूम जिंदगियों को बचाते हुए शहादत पाने वाले रियल हीरो संजय ग्रोवर के लिए डबवाली न्याय मांग रहा है।
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20 वर्ष पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने संजय को शौर्य पुरस्कार देने की मांग की थी, जिस पर आज तक किसी सरकार ने गौर नहीं किया है।
तीस वर्षीय संजय ग्रोवर 23 दिसंबर 1995 को डीएवी स्कूल का वार्षिक कार्यक्रम देखने के लिए राजीव मैरिज पैलेस में गए थे। कार्यक्रम के दौरान आग लगने के बाद वह बाहर आ गया।
लेकिन आग में चारों ओर से घिरेे बच्चों की चीखों ने उसे रोक लिया। वह पैलेस के नजदीक रहने वाले तेजपाल सिंह के घर चला गया।
घर की महिला को अपने स्कूटर की चाबी, पर्स तथा ड्राइविंग लाइसेंस सौंपकर संजय ने अपने शरीर पर कंबल लपेटा और आग की लपटों में कूद गया।
एक-एक करके संजय ने 25 मासूम जिंदगियां बचाई। आग की सूचना पाकर उनके पिता प्यारे लाल ग्रोवर अपने बड़े बेटे सतभूषण ग्रोवर तथा मंझले बेटे प्रवीण के साथ घटना स्थल पर पहुंचे।
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लेकिन संजय उन्हें वहां नहीं मिला। प्रवीण भाई को ढूंढता हुआ सरकारी अस्पताल में पहुंचा। घायलों को देखते हुए आगे बढ़ रहा था।
अग्निकांड में बुरी तरह जले अपने भाई संजय को वह पहचान नहीं पाया। लेकिन संजय ने उसे पहचान लिया। प्रवीण को देखकर वह बोला कि मैं तेरा भाई, संजय हूं....।
उपचार के लिए संजय को बठिंडा में लेजाया गया। बाद में उसे डीएमसी लुधियाना में ले जाया गया। नौ दिन तक वह वहां उपचाराधीन रहा।
जब भी पारिवारिक सदस्य संजय से हादसे के बारे में जानकारी लेना चाहते तो वह उन्हें चुप करवा देता। बस इतना कहता कि अगर मौका मिल जाता तो वह और बच्चों की जिंदगियां बचा लेता...।
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मरने के बाद उसकी आंखें तथा शरीर दान कर देना। एक जनवरी 1996 को अल सुबह ढाई बजे संजय ने दम तोड़ दिया।
डबवाली में हुआ अंतिम संस्कार
संजय का शव का डीएमसी में पोस्टमार्टम करवाने के बाद उन्होंने डबवाली के रामबाग में उसे पंचतत्वों में विलीन कर दिया। उस समय संजय के बड़े बेटे पारूल की उम्र महज सवा छह साल तथा छोटे बेटे नवनीत की उम्र सवा साल थी।
कलाकार था संजय
संजय ग्रोवर का जन्म छह दिसंबर 1965 को डबवाली निवासी प्यारे लाल ग्रोवर के घर हुआ था। साल 1981 में हरियाणा के बहादुरगढ़ में हरियाणा राज्य विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेकर दूसरा स्थान प्राप्त किया।
साल 1985 में श्रीगुरु नानक कॉलेज किलियांवाली की ओर से डलहौजी में यूथ लीडरशिप ट्रेनिंग कैंप में बेस्ट कैंपर का सम्मान पाया। साल 1984-85 में गुरुनानक कॉलेज का बेस्ट एक्टर घोषित किया गया।
उन्होंने जंगी राम की हवेली, स्योंक, शरीफजादे, बुड्ढा विआहिया गया आदि नाटकों में प्रशंसनीय भूमिका अदा की। पंजाब के अबोहर, जीरा, मुक्तसर में हुए यूथ फेस्टिवल, कार्यक्रमों में मंच संचालन किया।
साल 1992 में रोटेशिया-92 कांफ्रेंस के अंतर्गत कोलकाता तथा नेपाल का एक माह का टूर करने तथा जिला सिरसा से जाने वाले सदस्यों में से बेस्ट मेंबर का पुरस्कार पाया।
19 बार किया रक्तदान
महज 30 साल की उम्र में संजय ने रक्तदान के क्षेत्र में ऊंचा नाम कमाया। संजय ने शिक्षा के साथ-साथ 19 बार रक्तदान किया। सिरसा में घग्घर नदी में आई बाढ़ के प्रभावितों के लिए प्रतिदिन लंगर बनवाकर वहां पहुंचाते थे।
मृत्यु उपरांत सम्मान
संजय की मृत्यु के बाद उसकी बहादुरी को सलाम करते हुए 1995 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार ने राष्ट्रीय युवा पुरस्कार, 1997 में रेड एंड व्हाइट कंपनी ने बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने संजय ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए भारत सरकार को अपनी सिफारिश की थी। मगर यह सिफारिश बीस बरस बाद भी सिरे नहीं चढ़ी है। यह सवाल बना हुआ है कि सिफारिश फाइलों में गुम हो गई या फिर राजनीति की भेंट चढ़ गई?
शौर्य पुरस्कार का हकदार है डबवाली का लाल
अग्निकांड पीड़ित आरके नीना, मथरा दास चलाना, जयमुनी गोयल ने बताया कि सरकारों ने अग्निकांड पीड़ितों से बहुत से वादे किए थे। जिन्हें पूरा करवाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
अब भी पीड़ितों के लिए बहुत कुछ करना बाकी है। लेकिन सरकारें मुंह फेरे हुए हैं। संजय ग्रोवर को मरणोपरांत शौर्य पुरस्कार देने की घोषणा पूरी होनी चाहिए।