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...एक छोरी पढ़ने मै करै यकीन, कॉलेज जाणा चाहवै सै

Tue, 03 Dec 2019 02:18 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Tue, 03 Dec 2019 02:18 AM IST
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Village girl belive in studying
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रोहतक। जसिया गांव में रात्रि चौपाल में ‘आओ बात करें’ नाटक के माध्यम से ग्रामीणों को बेटियों को पढ़ाने के लिए जागरूक किया गया। इस दौरान एक छोरी पढ़ने मैं करै यकीन, कॉलेज मैं जाणा चाहैव सै गीत के माध्यम से संदेश दिया गया कि अभिभावक अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन असुरक्षित माहौल के चलते बेटियों को बाहर भेजने से डरते हैं। गीत के जरिये कलाकारों ने ग्रामीणों के डर को खत्म करते हुए बताया कि जितनी ज्यादा लड़कियां घरों से बाहर पढ़ने, खेलने व नौकरी करने जाएंगी माहौल उतना ही ज्यादा सुरक्षित होगा। सोमवार को ब्रेक थ्रू संस्था की ओर से सात दिवसीय रात्रि चौपाल नाटक मंचन का समापन हुआ। इस मौके पर जिला समन्वयक पंकज कुमार, संदीप कुमार, पूजा, सुनीता, नरेंद्र, कलाकार कंवलदीप, रोबिन, अमन, सौरभ जैन, महक, पायल, रजत जांगड़ा, अमनदीप, नेहा, दीवाकर, उमा शंकर मौजूद रहे।
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नाटक मंचन के लिए शुभकामनाएं मिलती हैं, सहयोग नहीं
रंगकर्मी संदीप ने कहा कि नाटक मंचन की सूचना फेसबुक-व्हाट्सएप और अन्य माध्यमाें पर दी जाए तो ट्रक भरकर शुभकामनाएं तो मिलती हैं किंतु सहयोग लोडिंग रिक्शा भर भी नहीं मिलता। ऐसे समय में नाटक करना मुश्किल हो जाता है। नाटक के लिए कड़ा अनुशासन चाहिए। रंगकर्म सीखने के लिए हमारे नाट्य शास्त्र से लेकर भारतीय पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भों में बहुत कुछ है लेकिन इससे सीखने के लिए जैसी मेहनत और समय चाहिए, वह किसी के पास नहीं और इतना समय कोई देना भी नहीं चाहता। रोहतक में रंगकर्म के लिए तमाम सुविधायुक्त ऑडिटोरियम नहीं है। फिर हिंदी में टिकट लेकर नाटक देखने की संस्कृति अब तक विकसित नहीं हो पाई है। जबकि बांग्ला और मराठी नाटक के प्रति प्रेम अनन्य है।
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गांवों से नौकरी करने वाली बेटियों की संख्या सिर्फ 4 प्रतिशत
ब्रेक थ्रूसंस्था ने सात दिवसीय नाटक मंचन के दौरान गांवों में जाकर परिस्थितियों को समझा और वहां लिंगभेद पर आधारित समस्या को जानने का प्रयास किया। ग्रामीणों पर बात करने पर निष्कर्ष निकला कि लड़कियों की पढ़ाई ज्यादातर गांव के स्कूलों तक सीमित है। कुछ लड़कियां कॉलेज पढ़ने शहर भी जाती हैं, लेकिन इनकी संख्या 100 प्रतिशत में से सिर्फ 40 प्रतिशत ही है, वहीं नौकरी करने वाली बेटियों की संख्या सिर्फ 4 प्रतिशत है।
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