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Rohtak News: नवरात्रि में सांझी पूजा का विशेष महत्व
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बहादुरगढ़। नवरात्र में सांझी पूजा का विशेष महत्व है। महिलाएं घर की दीवारों पर देवी मां की प्रतिमा बनाती हैं। सांझी कला नवरात्र में दुर्गा पूजा के रूप में हरियाणवी संस्कृति की लोक पारंपरिक कला है। दीवार पर गोबर के साथ मिट्टी के बने हुए सितारों एवं सांझी के विभिन्न अंगों को दीवार पर लगाया जाता है।
यह पारंपरिक कला सदियों पुरानी हैं, जो अब समाज में लुप्त होने के कगार पर है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाएं सांझी बनाकर उनकी संध्या के समय पूजा भी करती हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में तो बहुत कम महिलाएं दीवार पर सांझी बनाती हैं। इसी कड़ी में गांव सांखौल में हारी सांझी हारी विरासत प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रतियोगिता को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह है और महिलाएं बढ़चढ़ कर इस प्रतियोगिता में भाग ले रही हैं।
प्रतियोगिता का उद्देश्य अपनी संस्कृति और विरास्त को संजो कर रखना है। प्रतियोगिता में जिसकी सांझी सबसे सुंदर होगी, उस महिला को सामान समिति की ओर से किया जाएगा। ग्रामीणों ने बताया कि इस परंपरा में भी गोवंश के संरक्षण का संदेश छिपा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गाय को जितना महत्व दिया है, वह ऐसी परंपराओं में साफ झलकता है। यह परंपरा गोवंश के संरक्षण एवं संवर्धन का संकेत देती है। उन्होंने बताया कि दशहरे के दिन दोपहर बाद सांझी को जोहड़ या तालाब में बहा दिया जाता है।
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यह पारंपरिक कला सदियों पुरानी हैं, जो अब समाज में लुप्त होने के कगार पर है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाएं सांझी बनाकर उनकी संध्या के समय पूजा भी करती हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में तो बहुत कम महिलाएं दीवार पर सांझी बनाती हैं। इसी कड़ी में गांव सांखौल में हारी सांझी हारी विरासत प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रतियोगिता को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह है और महिलाएं बढ़चढ़ कर इस प्रतियोगिता में भाग ले रही हैं।
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प्रतियोगिता का उद्देश्य अपनी संस्कृति और विरास्त को संजो कर रखना है। प्रतियोगिता में जिसकी सांझी सबसे सुंदर होगी, उस महिला को सामान समिति की ओर से किया जाएगा। ग्रामीणों ने बताया कि इस परंपरा में भी गोवंश के संरक्षण का संदेश छिपा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गाय को जितना महत्व दिया है, वह ऐसी परंपराओं में साफ झलकता है। यह परंपरा गोवंश के संरक्षण एवं संवर्धन का संकेत देती है। उन्होंने बताया कि दशहरे के दिन दोपहर बाद सांझी को जोहड़ या तालाब में बहा दिया जाता है।
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