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भगौडे़ डॉक्टरों को सबक सिखाएगा पीजीआई
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Fri, 15 Jan 2016 02:21 AM IST
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पीजीआई प्रबंधन अब जल्द अपने भगौड़ों डॉक्टरों को सबक सिखाने की तैयारी
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में है। कई सालों बाद देर से ही सही संस्थान को इन डॉक्टरों की सुध आई है।
बिना शर्त पूरा किए और मंजूरी न लेकर बाहर मोटी कमाई करने वाले वरिष्ठ
डॉक्टरों के खिलाफ पीजीआई प्रबंधन ने कार्रवाई का मन बनाया हुआ है।
नौकरी छोड़े बिना गए, संस्थान उठा रहा परेशानी
बिना नौकरी छोड़कर और बिना नोटिस देकर गए वरिष्ठ डॉक्टरों के जाने से संस्थान इस पद को नहीं भर पा रहा है। पीजीआई प्रबंधन की मानें तो पद खाली होने के बाद ही इस पद के लिए आवेदन मांगे जा सकते हैं।
मोटी कमाई करके लौट आते हैं संस्थान में
सूत्रों की मानें तो कई संस्थानों में ऐसा होता रहा है कि डॉक्टर संस्थान को बिना जानकारी दिए बाहर मोटी कमाई करने के लिए चले जाते हैं। कुछ समय बाद संस्थान में जुगाड़ लगाकर वापस आकर वरिष्ठता बरकरार रखते हुए काम करने लगते हैं।
बोले अधिकारी
बगैर बताए और बगैर शर्त पूरी किए जो डॉक्टर संस्थान में नहीं आ रहे हैं, ऐसे डॉक्टरों की फाइल तैयार है। नियमानुसार इस पर कार्रवाई होगी। संस्थान में नियम तोड़ने वालों को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ा जाएगा।
- डॉ. राकेश गुप्ता, निदेशक, पीजीआई
केस एक : बतौर नैफ्रोलॉजिस्ट दे रहे धोखा
पीजीआई में नियुक्त हुए एक डॉक्टर बतौर नैफ्रोलॉजिस्ट दिल्ली के निजी अस्पताल में काम कर रहे हैं। उन्होंने दिल्ली एम्स से डॉक्टरेट ऑफ मेडिसिन सरकारी सीट पर की है।
पीजीआई संस्थान ने बांड भरवाया था कि डीएम करने के बाद वे पांच साल तक अपनी सेवाएं संस्थान को देंगे। यदि वे बीच में नौकरी छोड़ते हैं तो उन्हें निर्धारित राशि जमा करानी होगी। अभी तक डॉक्टर ने न तो बांड की राशि जमा कराई न ही पीजीआई में काम किया।
यह है नियम
एमडी डॉक्टर को पीजीआई बतौर रेगुलर कंसलटेंट नियुक्त किया जाता। इसके लिए उसे करीब एक लाख रुपये प्रति माह वेतन दिया जाता। डॉक्टर को तीन साल की डॉक्टरेट ऑफ मेडिसिन के लिए सरकारी सीट पर एम्स भेजा जाता है। डॉक्टर को कोर्स के दौरान पूरी सैलरी दी जाती है।
हालांकि डॉक्टर से बांड भरवाया जाता है कि कोर्स के बाद पांच साल तक अपनी सेवाएं पीजीआई को देगा। ऐसा न करने पर करने पर उसे अपनी तीन साल की सैलरी के साथ पांच लाख रुपये अतिरिक्त लौटाने होते हैं।
केस दो : कंसलटेंट पहुंचे सऊदी अरब
एनेस्थिसिया विभाग से बतौर कंसलटेंट एक डॉक्टर सऊदी अरब के एक निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन्होंने न तो इसके लिए मंजूरी ली है और न ही त्याग पत्र दिया है। संस्थान इसके लिए कोई कार्रवाई नहीं कर पाया है। नतीजा यह है कि यह सीट खाली पड़ी है, जिसे भरा भी नहीं जा सकता।
केस तीन : 2006 से संस्थान को नहीं दे रहें सेवाएं
एनेस्थिसिया और इएनटी विभाग के बतौर एसोसिएट प्रोफेसर पीजीआई के दो डॉक्टर वर्ष 2006 से संस्थान को अपनी सेवाएं नहीं दे रहे हैं। इन्होंने न तो कोई मंजूरी ली है और न ही त्याग पत्र दिया है। सूत्रों की मानें तो दोनों आस्ट्रेलिया के एक निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
नौकरी छोड़े बिना गए, संस्थान उठा रहा परेशानी
बिना नौकरी छोड़कर और बिना नोटिस देकर गए वरिष्ठ डॉक्टरों के जाने से संस्थान इस पद को नहीं भर पा रहा है। पीजीआई प्रबंधन की मानें तो पद खाली होने के बाद ही इस पद के लिए आवेदन मांगे जा सकते हैं।
मोटी कमाई करके लौट आते हैं संस्थान में
सूत्रों की मानें तो कई संस्थानों में ऐसा होता रहा है कि डॉक्टर संस्थान को बिना जानकारी दिए बाहर मोटी कमाई करने के लिए चले जाते हैं। कुछ समय बाद संस्थान में जुगाड़ लगाकर वापस आकर वरिष्ठता बरकरार रखते हुए काम करने लगते हैं।
बोले अधिकारी
बगैर बताए और बगैर शर्त पूरी किए जो डॉक्टर संस्थान में नहीं आ रहे हैं, ऐसे डॉक्टरों की फाइल तैयार है। नियमानुसार इस पर कार्रवाई होगी। संस्थान में नियम तोड़ने वालों को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ा जाएगा।
- डॉ. राकेश गुप्ता, निदेशक, पीजीआई
केस एक : बतौर नैफ्रोलॉजिस्ट दे रहे धोखा
पीजीआई में नियुक्त हुए एक डॉक्टर बतौर नैफ्रोलॉजिस्ट दिल्ली के निजी अस्पताल में काम कर रहे हैं। उन्होंने दिल्ली एम्स से डॉक्टरेट ऑफ मेडिसिन सरकारी सीट पर की है।
पीजीआई संस्थान ने बांड भरवाया था कि डीएम करने के बाद वे पांच साल तक अपनी सेवाएं संस्थान को देंगे। यदि वे बीच में नौकरी छोड़ते हैं तो उन्हें निर्धारित राशि जमा करानी होगी। अभी तक डॉक्टर ने न तो बांड की राशि जमा कराई न ही पीजीआई में काम किया।
यह है नियम
एमडी डॉक्टर को पीजीआई बतौर रेगुलर कंसलटेंट नियुक्त किया जाता। इसके लिए उसे करीब एक लाख रुपये प्रति माह वेतन दिया जाता। डॉक्टर को तीन साल की डॉक्टरेट ऑफ मेडिसिन के लिए सरकारी सीट पर एम्स भेजा जाता है। डॉक्टर को कोर्स के दौरान पूरी सैलरी दी जाती है।
हालांकि डॉक्टर से बांड भरवाया जाता है कि कोर्स के बाद पांच साल तक अपनी सेवाएं पीजीआई को देगा। ऐसा न करने पर करने पर उसे अपनी तीन साल की सैलरी के साथ पांच लाख रुपये अतिरिक्त लौटाने होते हैं।
केस दो : कंसलटेंट पहुंचे सऊदी अरब
एनेस्थिसिया विभाग से बतौर कंसलटेंट एक डॉक्टर सऊदी अरब के एक निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन्होंने न तो इसके लिए मंजूरी ली है और न ही त्याग पत्र दिया है। संस्थान इसके लिए कोई कार्रवाई नहीं कर पाया है। नतीजा यह है कि यह सीट खाली पड़ी है, जिसे भरा भी नहीं जा सकता।
केस तीन : 2006 से संस्थान को नहीं दे रहें सेवाएं
एनेस्थिसिया और इएनटी विभाग के बतौर एसोसिएट प्रोफेसर पीजीआई के दो डॉक्टर वर्ष 2006 से संस्थान को अपनी सेवाएं नहीं दे रहे हैं। इन्होंने न तो कोई मंजूरी ली है और न ही त्याग पत्र दिया है। सूत्रों की मानें तो दोनों आस्ट्रेलिया के एक निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।