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Mission 2028: सफलता की नई इबारत लिखने को पसीना बहा रहीं पहलवान बेटियां, विवादों से बेपरवाह जोश है हाई
Wed, 28 Jun 2023 12:24 PM IST
निवेदिता वर्मा
विकास सैनी, अमर उजाला, रोहतक (हरियाणा)
विकास सैनी, अमर उजाला, रोहतक (हरियाणा)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Wed, 28 Jun 2023 12:24 PM IST
सार
रोहतक के सर छोटू राम स्टेडियम में दो-तीन साल पहले तक कुछ 100 तक बच्चे प्रैक्टिस के लिए आते थे। इनमें लगभग 50-60 लड़कियां होती थीं। लेकिन, पिछले वर्षों में छोटी बच्चियों में पहलवानी के प्रति रुझान बढ़ा है।
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रोहतक के अखाड़े में प्रेक्टिस करते खिलाड़ी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
विस्तार
अखाड़े में उतरकर दुनिया को दंग करने वाली पहलवान बेटियों की अगली पौध सफलता की नई इबारत लिखने के लिए तैयार हो रही है। ओलंपिक में उतरकर देश को स्वर्ण पदक दिलाने की चाहत लिए ये बच्चियां अभी से मिशन 2028 में जुट गई हैं।
रोहतक के छोटूराम स्टेडियम के हॉल में दमखम आजमाती इन नन्हीं पहलवानों का जोश और जज्बा देखकर कोई भी इनके हौसले की दाद दिए बिना नहीं रह सकेगा। कुछ महिला पहलवानों और कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष के बीच चल रहे विवादों से इतर इन बच्चियों की आंखों में सिर्फ देश के लिए ओलंपिक में पदक लाने का सपना है।
अमर उजाला ने अखाड़े में उतरीं इन बच्चियों से उनका लक्ष्य जानने का प्रयास किया तो मासूमियत भरे उनके जवाब में बुलंद इरादे भी साफ दिखे। अल सुबह ये बेटियां घर से निकल स्टेडियम में दंड-बैठक लगाकर खुद को मजबूत बना रही हैं। इनमें से कुछ तो हाल ही में स्कूली, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक भी जीत कर लाई हैं। इनमें कोई परिवार की पहली बेटी है तो कोई चौथी पीढ़ी की पहलवान।
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रोहतक के छोटूराम स्टेडियम के हॉल में दमखम आजमाती इन नन्हीं पहलवानों का जोश और जज्बा देखकर कोई भी इनके हौसले की दाद दिए बिना नहीं रह सकेगा। कुछ महिला पहलवानों और कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष के बीच चल रहे विवादों से इतर इन बच्चियों की आंखों में सिर्फ देश के लिए ओलंपिक में पदक लाने का सपना है।
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अमर उजाला ने अखाड़े में उतरीं इन बच्चियों से उनका लक्ष्य जानने का प्रयास किया तो मासूमियत भरे उनके जवाब में बुलंद इरादे भी साफ दिखे। अल सुबह ये बेटियां घर से निकल स्टेडियम में दंड-बैठक लगाकर खुद को मजबूत बना रही हैं। इनमें से कुछ तो हाल ही में स्कूली, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक भी जीत कर लाई हैं। इनमें कोई परिवार की पहली बेटी है तो कोई चौथी पीढ़ी की पहलवान।
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मुझे रेसलर बनना है इसलिए अखाड़े में हूं: यशिका
कृपाल नगर की यशिका तीसरी कक्षा में पढ़ती है। इसका सपना रेसलर बनना है। देश के लिए ओलंपिक में पदक लाकर सभी का मान सम्मान बढ़ाना चाहती है। इसीलिए पढ़ाई के साथ अभी से कुश्ती के मैट पर दमखम आजमाने लगी है। पहलवानों की तरह सुबह शाम कड़ी मेहनत कर पसीना बहा रही यह बच्ची अपने मजबूत इरादों के साथ कोच के दिए हर लक्ष्य को पूरा कर रही है। उसके पिता सज्जन सिंह ट्रैक सूट का कारोबार करते हैं। बड़ा भाई चिराग सातवीं में पढ़ता है, जो किताबों तक सीमित है लेकिन यशिका अपने घर की पहली खिलाड़ी और पहलवान बनने जा रही है।
चौथी पीढ़ी के रूप में पोती ने संभाली दादा की पगड़ी
पिलाना की सविता ने हाल ही में किर्गिस्तान में हुई सब जूनियर एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर अपने इरादे जता दिए हैं। मिशन 2028 के लिए पिछले पांच साल से जुटी यह बेटी परिवार की चौथी पहलवान है। परदादा टेकराम दलाल के बाद दादा मुखत्यार सिंह और पिता सुनील के बाद पहलवानी में नाम कमाने उतरी इस बेटी ने स्नातक की पढ़ाई के लिए भी आवेदन कर दिया है। घर में बड़ा भाई अनिल है। अनिल भी राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुका है। सविता का अगला लक्ष्य जूनियर एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में पदक जीतना है। यह चैंपियनशिप जॉर्डन के अमान में 14 जुलाई से शुरू होगी।
तनु ने साक्षी से प्रेरित होकर शुरू की कुश्ती
मोखरा निवासी तनु अपने परिवार की पहली पहलवान बेटी है। पिता राजबीर बस चालक हैं और बड़ा भाई रितिक पहलवानी से दूर है। हाल ही में 12वीं पास करने के बाद अब तनु कुश्ती के साथ स्नातक की पढ़ाई भी कर रही है। इसका लक्ष्य मिशन 2028 (ओलंपिक) है। अपना यह सपना हकीकत बनाने के लिए पिछले साढ़े चार साल से मैट पर दमखम आजमा रही है। अपने ही गांव की साक्षी मलिक से प्रेरित होकर तनु रेसलिंग में उतरी है। वह कैडेट चैंपियनशिप 2021 में बुडापेस्ट में स्वर्ण पदक जीत चुकी है।
कृपाल नगर की यशिका तीसरी कक्षा में पढ़ती है। इसका सपना रेसलर बनना है। देश के लिए ओलंपिक में पदक लाकर सभी का मान सम्मान बढ़ाना चाहती है। इसीलिए पढ़ाई के साथ अभी से कुश्ती के मैट पर दमखम आजमाने लगी है। पहलवानों की तरह सुबह शाम कड़ी मेहनत कर पसीना बहा रही यह बच्ची अपने मजबूत इरादों के साथ कोच के दिए हर लक्ष्य को पूरा कर रही है। उसके पिता सज्जन सिंह ट्रैक सूट का कारोबार करते हैं। बड़ा भाई चिराग सातवीं में पढ़ता है, जो किताबों तक सीमित है लेकिन यशिका अपने घर की पहली खिलाड़ी और पहलवान बनने जा रही है।
चौथी पीढ़ी के रूप में पोती ने संभाली दादा की पगड़ी
पिलाना की सविता ने हाल ही में किर्गिस्तान में हुई सब जूनियर एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर अपने इरादे जता दिए हैं। मिशन 2028 के लिए पिछले पांच साल से जुटी यह बेटी परिवार की चौथी पहलवान है। परदादा टेकराम दलाल के बाद दादा मुखत्यार सिंह और पिता सुनील के बाद पहलवानी में नाम कमाने उतरी इस बेटी ने स्नातक की पढ़ाई के लिए भी आवेदन कर दिया है। घर में बड़ा भाई अनिल है। अनिल भी राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुका है। सविता का अगला लक्ष्य जूनियर एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में पदक जीतना है। यह चैंपियनशिप जॉर्डन के अमान में 14 जुलाई से शुरू होगी।
तनु ने साक्षी से प्रेरित होकर शुरू की कुश्ती
मोखरा निवासी तनु अपने परिवार की पहली पहलवान बेटी है। पिता राजबीर बस चालक हैं और बड़ा भाई रितिक पहलवानी से दूर है। हाल ही में 12वीं पास करने के बाद अब तनु कुश्ती के साथ स्नातक की पढ़ाई भी कर रही है। इसका लक्ष्य मिशन 2028 (ओलंपिक) है। अपना यह सपना हकीकत बनाने के लिए पिछले साढ़े चार साल से मैट पर दमखम आजमा रही है। अपने ही गांव की साक्षी मलिक से प्रेरित होकर तनु रेसलिंग में उतरी है। वह कैडेट चैंपियनशिप 2021 में बुडापेस्ट में स्वर्ण पदक जीत चुकी है।
साथी बच्चों को हराया तो दादा ने बनाया पहलवान
मूलरूप से टिटौली (अब सेक्टर-दो) निवासी खुशी इन दिनों स्टेडियम में पहलवानी के गुर सीख रही है। मिशन 2028 के लिए खुद को तैयार कर रही इस बेटी ने बचपन में गांव की कुश्ती में साथी बच्चों को हराया तो दादा भीम सिंह कुंडू ने उसे पहलवान बनाना तय किया। वह अब तक खेलो इंडिया में कांस्य पदक, नेशनल चैंपियनशिप, रांची में रजत पदक जीत चुकी है। पिता संदीप दिल्ली पुलिस में हैं। छोटा भाई हर्ष पढ़ रहा है। खुशी खेल के साथ पढ़ाई पर भी ध्यान दे रही है। हाल ही में 12वीं पास कर स्नातक प्रथम वर्ष के लिए आवेदन किया है।
परिवार की पहली पहलवान बनी सलोनी
मूलरूप से हिमाचल प्रदेश (अब रोहतक सेक्टर चार) निवासी सलोनी का सपना अंतरराष्ट्रीय पहलवान बनना है। मिशन 2028 की तैयारी में जुटी यह बेटी परिवार की पहली पहलवान है। कुश्ती में कुछ अलग कर दिखाने के लिए घर छोड़कर रोहतक के छोटूराम स्टेडियम में पहलवानी के गुर सीख रही है। उसकी इस पिछले तीन साल की तपस्या में मां संध्या पिता की भूमिका भी निभा रही है। पिता प्रवेश कुमार कारोबार में व्यस्त हैं। बड़ा भाई कुणाल पढ़ाई में ही रुचि रखता है। सलोनी ने भी 12वीं के बाद स्नातक की पढ़ाई के लिए आवेदन किया है। हाल ही में दिल्ली में हुए स्कूल नेशनल गेम्स में सलोनी रजत पदक व अंडर-17 नेशनल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत चुकी है।
दो साल में डेढ़ गुनी हो गई बेटियों की संख्या
सर छोटू राम स्टेडियम में दो-तीन साल पहले तक 100 बच्चे प्रेक्टिस के लिए आते थे। इनमें लगभग 50-60 लड़कियां होती थीं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में छोटी बच्चियों में पहलवानी के प्रति रुझान बढ़ा है। हर महीने पहलवानी की प्रेक्टिस के लिए छोटी बच्चियों के अभिभावक प्रवेश के लिए पूछताछ कर रहे हैं। स्टेडियम में मौजूद एक कोच के मुताबिक इस समय यहां 125 के करीब पहलवान तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें 90 से ज्यादा लड़कियां है। करीब 25 बच्चियों की उम्र तो 10 साल से कम है।
मूलरूप से टिटौली (अब सेक्टर-दो) निवासी खुशी इन दिनों स्टेडियम में पहलवानी के गुर सीख रही है। मिशन 2028 के लिए खुद को तैयार कर रही इस बेटी ने बचपन में गांव की कुश्ती में साथी बच्चों को हराया तो दादा भीम सिंह कुंडू ने उसे पहलवान बनाना तय किया। वह अब तक खेलो इंडिया में कांस्य पदक, नेशनल चैंपियनशिप, रांची में रजत पदक जीत चुकी है। पिता संदीप दिल्ली पुलिस में हैं। छोटा भाई हर्ष पढ़ रहा है। खुशी खेल के साथ पढ़ाई पर भी ध्यान दे रही है। हाल ही में 12वीं पास कर स्नातक प्रथम वर्ष के लिए आवेदन किया है।
परिवार की पहली पहलवान बनी सलोनी
मूलरूप से हिमाचल प्रदेश (अब रोहतक सेक्टर चार) निवासी सलोनी का सपना अंतरराष्ट्रीय पहलवान बनना है। मिशन 2028 की तैयारी में जुटी यह बेटी परिवार की पहली पहलवान है। कुश्ती में कुछ अलग कर दिखाने के लिए घर छोड़कर रोहतक के छोटूराम स्टेडियम में पहलवानी के गुर सीख रही है। उसकी इस पिछले तीन साल की तपस्या में मां संध्या पिता की भूमिका भी निभा रही है। पिता प्रवेश कुमार कारोबार में व्यस्त हैं। बड़ा भाई कुणाल पढ़ाई में ही रुचि रखता है। सलोनी ने भी 12वीं के बाद स्नातक की पढ़ाई के लिए आवेदन किया है। हाल ही में दिल्ली में हुए स्कूल नेशनल गेम्स में सलोनी रजत पदक व अंडर-17 नेशनल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत चुकी है।
दो साल में डेढ़ गुनी हो गई बेटियों की संख्या
सर छोटू राम स्टेडियम में दो-तीन साल पहले तक 100 बच्चे प्रेक्टिस के लिए आते थे। इनमें लगभग 50-60 लड़कियां होती थीं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में छोटी बच्चियों में पहलवानी के प्रति रुझान बढ़ा है। हर महीने पहलवानी की प्रेक्टिस के लिए छोटी बच्चियों के अभिभावक प्रवेश के लिए पूछताछ कर रहे हैं। स्टेडियम में मौजूद एक कोच के मुताबिक इस समय यहां 125 के करीब पहलवान तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें 90 से ज्यादा लड़कियां है। करीब 25 बच्चियों की उम्र तो 10 साल से कम है।