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कभी जोड़तोड़ में महानायक अब गठबंधन पर संकट
सुनील सिंघल/अमर उजाला,रोहतक
Updated Thu, 28 Aug 2014 01:53 PM IST
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देश की राजनीति में आया राम-गया राम की प्रथा शुरू करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री की पार्टी हजकां चुनाव से ऐन पहले अकेली पड़ती नजर आ रही है। राजनीति की हवा का रुख दूर से ही भांप सत्तारूढ़ दल के साथ मधुर संबंध बनाने में माहिर भजनलाल के बेटे अंतिम प्रयास के बाद भी गठबंधन को बचाने में नाकाम साबित होते नजर आ रहे हैं।
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खुद को ‘राजपूत’ (जिसका राज उसी का पूत) कहने वाले दल-बदल में पीएचडी भजनलाल की पार्टी अब अकेले चुनावी समर में उतरेगी या किसी दूसरे सहयोगी के साथ यह सबसे बड़ा सवाल है। चर्चा यह भी है कि गैर जाट वोटों के ध्रुवीकरण के लिए कुलदीप किसी और पार्टी से भी हाथ मिला सकते हैं।
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हजकां भाजपा को गठबंधन का धर्म न निभाने पर घेरने और न्याय के लिए भावनात्मक अपील की तैयारी में है। 28 अगस्त को चंडीगढ़ में कुलदीप बिश्नोई की प्रेस कांफ्रेंस के साथ ही गठबंधन को लेकर तस्वीर साफ हो जाएगी।
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यूं बनी आया राम-गया राम की कहावत
आया राम-गया राम की कहावत भी हरियाणा की ही देन है। कभी प्रदेश के राज्यपाल रहे तपासे ने कहा था कि जिस तरह हम दिन में कई बार कपड़े बदलते हैं, उसी तरह यहां के विधायक पाला बदलते हैं। फरीदाबाद जिले के विधायक थे गयालाल।
उन्होंने एक ही दिन में कई बार दल-बदलकर रिकॉर्ड बनाया। कभी वे देवीलाल के साथ जाते तो अगले ही पल भजनलाल के पाले में जा बैठते। तभी से आया राम गया राम की कहावत बनी। भजनलाल ने पूरे देश को दल-बदल का रास्ता दिखाया, इसलिए केंद्र सरकार को इसके खिलाफ कानून बनाना पड़ा। केंद्र में भी नरसिंह राव की सरकार बचाने को भजनलाल ने तन-मन-धन से साथ दिया।
पहले दिल बदलते फिर दल बदलवा देते
भजनलाल को गठजोड़ का एक्सपर्ट कहा जाता है। दल-बदल की राजनीति में प्रदेश को नंबर वन तो भजनलाल को पीएचडी माना जाता है। वे कोई भी हथकंडा अपनाकर पहले नेताजी का दिल बदलते और फिर पलक झपकते ही दल बदलवा देते।
जनता पार्टी की सरकार में वे अपने पूरे मंत्रिमंडल और कांग्रेस विधायकों के साथ जनता पार्टी में जा मिले। 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरने पर जब इंदिरा के नेतृत्व में केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो भजनलाल पूरे दल-बल के साथ इंदिरा के दरबार में पेश हो गए।
दूसरों को जोड़ने में थे महारथी
आपात काल के बाद जनता पार्टी की लहर में 1977 में हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में देवीलाल के नेतृत्व में सरकार बनी। देवीलाल सीएम तो बन गए, लेकिन थोड़े ही समय बाद अंदर ही अंदर विधायकों में बगावत शुरू हो गई। एक मंत्री ने बगावती विधायकों को भारत भ्रमण के नाम पर अपनी ओर करने का भरसक प्रयास किया, लेकिन इस खेल में माहिर भजनलाल बाजी मार गए।
28 जून 1979 को भजनलाल सीएम बन गए। ज्यों ही 1980 में इंदिरा गांधी की सरकार बनी तो पूरे दलबल के साथ कांग्रेस दरबार में पेश हो गए। उन्हें जनता दल के नहीं कांग्रेस के सीएम के तौर पर जाना गया। मई 1982 में प्रदेश में पांचवीं विधानसभा के चुनाव हुए। देवीलाल और भजनलाल दोनों के ही पास 36-36 विधायक थे।
राज्यपाल तपासे ने दो दिन में देवीलाल को बहुमत के लिए विधायकों की परेड का फरमान जारी किया। देवीलाल निर्दलीय और कांग्रेस विधायकों को पटाकर बहुमत सिद्ध करने की तैयारी कर ही रहे थे कि भजनलाल ने इंदिरा की शरण ली और राज्यपाल पर दबाव डलवाकर सीएम पद की शपथ ले ली और देवीलाल ताकते रह गए।
चुनावी समर में हजकां कहां
28 अगस्त को भाजपा-हजकां गठबंधन टूटने की औपचारिक घोषणा होने के आसार हैं। सबसे बड़ा सवाल क्या हजकां चुनावी समर में अकेले ही उतरेगी? या अब भी सहयोगी तलाशे जाएंगे? कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि गैर जाट वोटों के ध्रुवीकरण के लिए कुलदीप किसी दूसरी पार्टी से हाथ मिला सकते हैं।
हजकां चाहे अकेले उतेरे या सहयोगी दल के साथ, इतना जरूर है कि ये चुनाव पार्टी के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं। बेहतर प्रदर्शन पार्टी के लिए संजीवनी का काम करेगा तो गैर जाट मतदाता के खिसकने पर पार्टी के अस्तित्व पर सवाल खड़े हो सकते हैं।