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Rohtak News: रोहतक में 1995 से गणेश चतुर्थी मना रहे मराठी
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रोहतक। हरियाणा की राजनीतिक का केंद्र कहे जाने वाले रोहतक में धार्मिक आयोजन में खूब होते हैं। करीब तीन दशक से यहां गणेश चतुर्थी पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसकी शुरूआत मराठा समुदाय के लोगों ने 1995 में की थी। मराठा परिवार वर्ष 1985 में महाराष्ट्र से रोहतक आकर रहने लगे। मंगलवार को इन परिवारों के सदस्यों ने पारंपरिक ढोल की ताल पर नाचते झूमते गणेश प्रतिमा विसर्जन किया। गुलाल उड़ाते श्रद्धालुओं के गणपति बप्पा के जयकारों से इलाका गूंज उठा।
गणपति महाराज की पूजा-अर्चना में मराठी महिलाओं के साथ पुरुषों की भी सहभागिता रहती है। यहां मराठा समाज के लगभग 15 से 20 परिवार हैं, इनमें करीब 90 से ज्यादा सदस्य हैं। सभी पारंपरिक तरीके से गणपति विसर्जन करते हैं। मराठा समाज से जुड़ी रंजना व संगीता ने बताया कि महाराष्ट्र के घरों में गणपति विराजमान करने पर पांच दिन बाद उनकी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। पंडाल में विराजमान गणपति की प्रतिमा का 11 दिन बाद विसर्जन किया जाता है। इसी परंपरा को यहां आगे बढ़ाते हुए 11 दिन बाद अनंत चतुर्दशी को विसर्जन किया गया।
पारंपरिक कपड़े पहनकर करते हैं विसर्जन
महिलाएं पारंपरिक साड़ी पहनती हैं। बिंदी लगाने के अलावा चूड़ियां पहनती हैं। गले में गणपति बप्पा की फोटो का पटका बांधती हैं। सोलह शृंगार कर गणपति बप्पा की आरती की जाती है। इसके बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
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गणपति महाराज की पूजा-अर्चना में मराठी महिलाओं के साथ पुरुषों की भी सहभागिता रहती है। यहां मराठा समाज के लगभग 15 से 20 परिवार हैं, इनमें करीब 90 से ज्यादा सदस्य हैं। सभी पारंपरिक तरीके से गणपति विसर्जन करते हैं। मराठा समाज से जुड़ी रंजना व संगीता ने बताया कि महाराष्ट्र के घरों में गणपति विराजमान करने पर पांच दिन बाद उनकी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। पंडाल में विराजमान गणपति की प्रतिमा का 11 दिन बाद विसर्जन किया जाता है। इसी परंपरा को यहां आगे बढ़ाते हुए 11 दिन बाद अनंत चतुर्दशी को विसर्जन किया गया।
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पारंपरिक कपड़े पहनकर करते हैं विसर्जन
महिलाएं पारंपरिक साड़ी पहनती हैं। बिंदी लगाने के अलावा चूड़ियां पहनती हैं। गले में गणपति बप्पा की फोटो का पटका बांधती हैं। सोलह शृंगार कर गणपति बप्पा की आरती की जाती है। इसके बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
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