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ओलंपिक में हरियाणा की धाक: चंदगीराम ने बजवाया था शाकाहार का डंका, 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में लगाया था दांव
Fri, 12 Jul 2024 01:56 PM IST
नवीन दलाल
योगेश नारायण दीक्षित, रोहतक (हरियाणा)
योगेश नारायण दीक्षित, रोहतक (हरियाणा)
Published by: नवीन दलाल
Updated Fri, 12 Jul 2024 01:56 PM IST
सार
चंदगीराम कालीरामण ऐसे पहलवान थे जो सिर्फ अखाड़े में पसीना बहाना जानते थे, खेल संघों के दांव-पेच नहीं। इसका नतीजा हुआ कि 1970 के एशियाई खेल में स्वर्ण पदक विजेता को 1972 के ओलंपिक में जाने वाले प्रारंभिक भारतीय दल में शामिल नहीं किया गया
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मास्टर चंदगीराम
- फोटो : फाइल
विस्तार
ओलंपिक खेलों में हरियाणा की दमदार मौजूदगी हमेशा से रही है। चाहे पदक विजेता हॉकी टीम में भागीदारी की बात हो या कुश्ती में पदक हासिल करने की, हरियाणवी प्रतिभाओं ने हमेशा सुर्खियां बटोरी हैं। ऐसा ही एक नाम मास्टर चंदगीराम का है। उन्होंने न सिर्फ 1972 में हुए म्यूनिख ओलंपिक में दमदार मुकाबले से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा, बल्कि पहलवानी में शाकाहार का परचम लहराया था। आज जब पेरिस ओलंपिक में भाग लेने वाले हरियाणा के ज्यादातर खिलाड़ियों से पूरे देश को पदक की आस है, मास्टर चंदगीराम जैसे दिग्गजों का संघर्ष प्रेरित करता है।
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पहलवान चंदगीराम का एशियाई खेलों की कुश्ती स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतना और फिर ओलंपिक तक का सफर संघर्ष की मिसाल है। उनका जन्म हिसार जिले के हांसी उपमंडल के गांव सिसाय में 9 नवंबर 1937 को हुआ था। उन्होंने 9 से 20 दिसंबर 1970 तक बैंकाॅक में हुए एशियाई खेलों की फ्रीस्टाइल कुश्ती के 100 किलो भारवर्ग में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था। उस समय उनकी उम्र 33 साल थी।
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इसके दो साल बाद यानी 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। यहां अपने शाकाहारी आहार और उसके गुणगान के चलते उन्होंने 90 किलो शाकाहारी मांसपेशियों वाले पहलवान के रूप में पहचान बनाई थी। दुनिया यह देखकर दंग रह गई कि जिस हैवीवेट मुकाबले में उतरने वाले हर पहलवान के भोजन में कितने किलो रेडमीट और अंडे दिए जाएं, इसकी चर्चा होती है, उसमें ऐसा पहलवान भी उतरा है जो सिर्फ दूध, घी, मक्खन और शाकाहार लेता है।
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लोगों के प्यार ने दिलवाया ओलंपिक का टिकट
चंदगीराम कालीरामण ऐसे पहलवान थे जो सिर्फ अखाड़े में पसीना बहाना जानते थे, खेल संघों के दांव-पेच नहीं। इसका नतीजा हुआ कि 1970 के एशियाई खेल में स्वर्ण पदक विजेता को 1972 के ओलंपिक में जाने वाले प्रारंभिक भारतीय दल में शामिल नहीं किया गया। इसके खिलाफ हरियाणा के साथ पूरे देश में आवाज उठने लगी।
उस समय के समाचार पत्रों में बड़े-बड़े लेख लिखकर ओलंपिक दल के चयन पर सवाल उठाए जाने लगे। लिखा गया कि हिंद केसरी, रूस्तम-ए-हिंद, भारत केसरी और एशियाड स्वर्ण पदक विजेता अजेय पहलवान को ओलंपिक में भेजने पर संशय बनाए रखना कुश्ती के साथ सरकार का मजाक है। इसके बाद चंदगीराम को प्रशिक्षण के लिए चुना गया और फिर ओलंपिक दल में शामिल किया गया।
लड़कियों को अखाड़े तक लाने की पहल
ओलंपिक कुश्ती में 2004 में महिला वर्ग को शामिल किया गया था। इससे पहले ही पद्मश्री चंदगीराम ने तभी हरियाणा के अखाड़ों में लड़कियों को लाने की पहल की थी। उन्होंने इसकी शुरुआत अपने घर से की। अपनी बेटी सोनिका कालीरामण और दीपिका कालीरामण को उन्होंने बड़े मुकाबलों के लिए खुद प्रशिक्षित कर अखाड़े में उतारा। उनकी प्रेरणा से साथी पहलवान जगरूप राठी ने अपनी बेटी नेहा राठी को कुश्ती में उतारा। चंदगीराम ने चरखी दादरी के बलाली गांव निवासी गुरु महावीर फोगाट को अपनी बेटियों गीता और बबीता को मैट पर उतारने के लिए मनाया। इसी का नतीजा है गीता और बबीता के बाद उनकी भतीजी विनेश फोगाट अब तीसरी बार ओलंपिक के मैट पर उतरने जा रही है।