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Rohtak News: शादी से पहले कराएं खून का मिलान, बच्चे बच जाएंगे थैलेसीमिया से
Thu, 08 May 2025 02:34 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
Updated Thu, 08 May 2025 02:34 AM IST
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रोहतक। शादी से पहले लड़के-लड़की की जन्मकुंडली नहीं, खून की रिपोर्ट का मिलान कराइए। इससे उनकी जिंदगी खुशहाल होगी और उनके बच्चे भी थैलेसीमिया नाम की जन्मजात बीमारी से बचे रहेंगे। खराब क्रोमोसोम वाले दंपती के बच्चे मेजर थैलेसीमिया के शिकार हो जाते हैं, जिन्हें ताउम्र 15-20 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है।
पीजीआई में थैलेसीमिया के करीब 600 मरीजों का इलाज चल रहा है। हर साल 40 नए मरीज पहुंच रहे हैं। इन मरीजों के खून में मौजूद लाल रक्त कण (आरबीसी) 15-20 दिन में खत्म हो जाते हैं, जबकि आम लोगों में यह 120 दिन जीवित रहते हैं। इसी कारण इन्हें 15-20 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है।
पीजीआई की हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. अलका यादव बताती हैं कि थैलेसीमिया दो तरह का होता है। माता-पिता में से किसी एक के क्रोमोसोम खराब हों तो उनके बच्चे माइनर थैलेसीमिया पीड़ित होते हैं। यह सामान्य जिंदगी जीने में सक्षम हैं।
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जिनके माता और पिता, दोनों के क्रोमोसोम खराब हुए तो बच्चे मेजर थैलेसीमिया पीड़ित होंगे। इन्हें ताउम्र खून चढ़ाना पड़ेगा। न देंगे तो जान का जोखिम है।
बोन मैरो ट्रांसप्लांट है स्थायी इलाज
डॉ. अलका के मुताबिक, थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे का अगर 10 वर्ष की आयु में बोन मैरो ट्रांसप्लांट करा दें तो स्थायी इलाज हो सकता है। यह बोन मैरो भाई-बहन या परिवार के ही किसी सदस्य का मैच हो पाता है। मगर, यह इलाज बेहद खर्चीला है।
थैलेसीमिया एक गंभीर बीमारी है, लेकिन जागरूक से न सिर्फ बचा जा सकता है, बल्कि इसका प्रसार भी रोका जा सकता है। पीड़ित बच्चे का बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराने से स्थायी इलाज भी संभव है।
- डॉ. अलका यादव, हेमेटोलॉजिस्ट, पीजीआई।
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पीजीआई में थैलेसीमिया के करीब 600 मरीजों का इलाज चल रहा है। हर साल 40 नए मरीज पहुंच रहे हैं। इन मरीजों के खून में मौजूद लाल रक्त कण (आरबीसी) 15-20 दिन में खत्म हो जाते हैं, जबकि आम लोगों में यह 120 दिन जीवित रहते हैं। इसी कारण इन्हें 15-20 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है।
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पीजीआई की हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. अलका यादव बताती हैं कि थैलेसीमिया दो तरह का होता है। माता-पिता में से किसी एक के क्रोमोसोम खराब हों तो उनके बच्चे माइनर थैलेसीमिया पीड़ित होते हैं। यह सामान्य जिंदगी जीने में सक्षम हैं।
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जिनके माता और पिता, दोनों के क्रोमोसोम खराब हुए तो बच्चे मेजर थैलेसीमिया पीड़ित होंगे। इन्हें ताउम्र खून चढ़ाना पड़ेगा। न देंगे तो जान का जोखिम है।
बोन मैरो ट्रांसप्लांट है स्थायी इलाज
डॉ. अलका के मुताबिक, थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे का अगर 10 वर्ष की आयु में बोन मैरो ट्रांसप्लांट करा दें तो स्थायी इलाज हो सकता है। यह बोन मैरो भाई-बहन या परिवार के ही किसी सदस्य का मैच हो पाता है। मगर, यह इलाज बेहद खर्चीला है।
थैलेसीमिया एक गंभीर बीमारी है, लेकिन जागरूक से न सिर्फ बचा जा सकता है, बल्कि इसका प्रसार भी रोका जा सकता है। पीड़ित बच्चे का बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराने से स्थायी इलाज भी संभव है।
- डॉ. अलका यादव, हेमेटोलॉजिस्ट, पीजीआई।