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ताकी सब सेफ रहें... सड़कों पर ट्रैफिक नियम उकेर जागरूक कर रहीं चार बेटियां
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शहर की सड़कें आवागमन के लिए सुगम व सुरक्षित हों। बच्चे व बुजुर्ग किसी अनहोनी का शिकार न बनें। यह सोच है शहर की चार जागरूक बेटियों की। अपनी इस सोच को साकार बनाने के लिए वे पिछले चार दिन से जुटी हुई हैं। राजीव चौक (दिल्ली बाईपास) पर हाथों में पेंट व ब्रश लेकर खुद ट्रैफिक नियम उकेर रही हैं। ये बेटियां अपने दैनिक जीवन से रात 12 से तीन बजे तक तीन घंटे इसी काम में लगा रही हैं। ही हैं। उनके इस अभियान में किसी का पति तो किसी के पिता भी रात भर जाग रहे हैं। इन बेटियों की समाज के प्रति सोच को लेकर अमर उजाला ने बातचीत की तो उनकी यह सोच सामने आई। आइए आपको भी इससे रूबरू कराएं।
दरअसल, पुलिस, नगर निगम व प्रशासन ने बॉटनर संस्था के साथ मिलकर शहर के एक अभियान शुरू किया है। इसके तहत शहर की सड़कों को सुरक्षित व आवागमन सुगम बनाने का प्रयास किया जा रहा है। अभियान का फोकस फिलहाल मुख्य चौराहे व भीड़ भरे इलाके के स्कूलों के आसपास ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारु बनाने पर है। संस्था ने शहर के 12 स्थानों को अभियान के तहत चिह्नित किया है। इसी कड़ी में सुखपुरा चौक व बस स्टेंड के बाद अब दिल्ली बाईपास पर ट्रैफिक नियमों की पालना सुनिश्चित करने का प्रयास शुरू किया है। इसके तहत रोहतक की चारों बेटियां देर रात घर का काम निपटा कर अपनी सोच को साकार बनाने निकलती हैं। इनका मानना है। शहर की सड़कें स्कूली बच्चों व बुजुर्गों के लिए अनसेफ हैं। ऐसे में हादसों का डर बना रहता है। इनसे निपटा जा सकता है। इसके लिए वाहन चालकों को यातायात नियमों के तहत सड़क चलने व चौराहों से गुजरना होगा। नियम तोड़ कर चलने से हादसे ही होंगे। इसीलिए संस्था ने लोगों को नियमों का पालन करने की आदत डालने की मुहिम छेड़ी है।
म्यूजिक पढ़ी छात्रा पढ़ाने निकली ट्रैफिक नियम : निकिता
ये करीब एक महीने पहले की बात है। दिल्ली बाईपास पर एक कार ने स्कूटी सवार बुजुर्ग को गिराकर दिया। सड़क पर गिरे इस बुजुर्ग को उठाने कोई सामने नहीं आया। मैंने सहेली के साथ इसे व स्कूटी को उठाया। घायल बुजुर्ग को पानी पिलाया। हालचाल पूछा। इसके बाद वह अपने घर चला गया। यहीं से मेरा मन ट्रैफिक नियमों के प्रति संजीदा हुआ। मैं नारायणी सेना चेरिटेबल ट्रस्ट से हाल ही में जुड़ी हूं। ट्रस्ट का बॉटनर संस्था के साथ मिलकर शहर में पहली बार ट्रैफिक संबंधी अभियान शुरू करने का पता लगा तो मैं अपने घर भिवानी से रोहतक आ गई।
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निकिता शर्मा, एमडीयू छात्रा।
ट्रैफिक जाम में फंसे बच्चे देख अभियान से जुड़ी
मैं एक शिक्षिका हूं। रोजाना स्कूल आना जाना होता है। इस दौरान बच्चों को अक्सर ट्रैफिक जाम में फंसा देखती हूं। वे बेबस व लाचार से घर या स्कूल जाने की इंतजार करते रहते हैं। सड़क पार करना तो और भी मुश्किल होता है। तेज रफ्तार वाहनों व नियमों को तोड़ने वाले चालकों के कारण हादसों का डर बना रहता है। यही देखकर बॉटनर संस्था के ट्रैफिक अभियान से जुड़ी हूं। दिल्ली बाईपास पर स्कूली बच्चे व पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित पथ मुहैया कराने का प्रयास चल रहा है। इसके लिए अपने परिजनों के साथ रात को टीम का हाथ बंटा रही हूं।
रूबिया भारती, सेक्टर 14, रोहतक।
गांव में ही पैदल चलना मुश्किल, शहर में बढ़ जाता है रिस्क
मैं गांव ईस्माइला की रहने वाली हूं। गांव में ही काफी ट्रैफिक रहता है। अपने बच्चे को पैदल या साइकिल से स्कूल नहीं भेजते हैं। यह जिम्मेदारी हम पति-पत्नी खुद संभालते हैं। शहर में तो रिस्क और बढ़ जाता है। बच्चों के लिए यहां चलना खतरे से खाली नहीं है। बेतरतीब सड़कों पर खड़े वाहन, तेज रफ्तार व लापरवाही ड्राइविंग करने वाले कभी भी हादसा कर सकते हैं। ऐसे में ट्रैफिक नियमों की पालना जरूरी बन जाती है। इसीलिए बॉटनर संस्था के अभियान का अपनाया है। अब पिछले चार दिनों से पति के साथ रात को दिल्ली बाईपास पर नियमों के तहत व्यवस्था बनाने जा रही हूं। ससुराल वालों का भी पूरा सहयोग मिल रहा है।
ज्योति शर्मा, गृहणी, इस्माईला।
गलती की माफी नहीं देता है सड़क हादसा
मैं आईटीआई में इंस्ट्रक्टर हूं। सड़कों पर रोज आना जाना होता है। आबादी के साथ वाहनों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इस कारण शहर की सड़कें बच्चों व बुजुर्गों के लिए चलने लायक नहीं रह गई हैं। सड़क पर चलते समय वाहन चालक की गलती किसी को माफी नहीं देती है। यह केवल सजा देती है। नियम तोड़कर चालक पुलिस के चालान से बच सकता है, मगर सड़क पर की गलती पर बचने की गुंजाइश नहीं है। इसलिए नियमों की पालना जरूरी है। यही सबक औरों को समझा सकूं, इसलिए शहर में शुरू हुई ट्रैफिक अभियान से जुड़ी हूं। कई बार सड़क हादसे व ट्रैफिक की समस्या को करीब से देखा है।
शिवानी, इंस्ट्रक्टर, आईटीआई।
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दरअसल, पुलिस, नगर निगम व प्रशासन ने बॉटनर संस्था के साथ मिलकर शहर के एक अभियान शुरू किया है। इसके तहत शहर की सड़कों को सुरक्षित व आवागमन सुगम बनाने का प्रयास किया जा रहा है। अभियान का फोकस फिलहाल मुख्य चौराहे व भीड़ भरे इलाके के स्कूलों के आसपास ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारु बनाने पर है। संस्था ने शहर के 12 स्थानों को अभियान के तहत चिह्नित किया है। इसी कड़ी में सुखपुरा चौक व बस स्टेंड के बाद अब दिल्ली बाईपास पर ट्रैफिक नियमों की पालना सुनिश्चित करने का प्रयास शुरू किया है। इसके तहत रोहतक की चारों बेटियां देर रात घर का काम निपटा कर अपनी सोच को साकार बनाने निकलती हैं। इनका मानना है। शहर की सड़कें स्कूली बच्चों व बुजुर्गों के लिए अनसेफ हैं। ऐसे में हादसों का डर बना रहता है। इनसे निपटा जा सकता है। इसके लिए वाहन चालकों को यातायात नियमों के तहत सड़क चलने व चौराहों से गुजरना होगा। नियम तोड़ कर चलने से हादसे ही होंगे। इसीलिए संस्था ने लोगों को नियमों का पालन करने की आदत डालने की मुहिम छेड़ी है।
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म्यूजिक पढ़ी छात्रा पढ़ाने निकली ट्रैफिक नियम : निकिता
ये करीब एक महीने पहले की बात है। दिल्ली बाईपास पर एक कार ने स्कूटी सवार बुजुर्ग को गिराकर दिया। सड़क पर गिरे इस बुजुर्ग को उठाने कोई सामने नहीं आया। मैंने सहेली के साथ इसे व स्कूटी को उठाया। घायल बुजुर्ग को पानी पिलाया। हालचाल पूछा। इसके बाद वह अपने घर चला गया। यहीं से मेरा मन ट्रैफिक नियमों के प्रति संजीदा हुआ। मैं नारायणी सेना चेरिटेबल ट्रस्ट से हाल ही में जुड़ी हूं। ट्रस्ट का बॉटनर संस्था के साथ मिलकर शहर में पहली बार ट्रैफिक संबंधी अभियान शुरू करने का पता लगा तो मैं अपने घर भिवानी से रोहतक आ गई।
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निकिता शर्मा, एमडीयू छात्रा।
ट्रैफिक जाम में फंसे बच्चे देख अभियान से जुड़ी
मैं एक शिक्षिका हूं। रोजाना स्कूल आना जाना होता है। इस दौरान बच्चों को अक्सर ट्रैफिक जाम में फंसा देखती हूं। वे बेबस व लाचार से घर या स्कूल जाने की इंतजार करते रहते हैं। सड़क पार करना तो और भी मुश्किल होता है। तेज रफ्तार वाहनों व नियमों को तोड़ने वाले चालकों के कारण हादसों का डर बना रहता है। यही देखकर बॉटनर संस्था के ट्रैफिक अभियान से जुड़ी हूं। दिल्ली बाईपास पर स्कूली बच्चे व पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित पथ मुहैया कराने का प्रयास चल रहा है। इसके लिए अपने परिजनों के साथ रात को टीम का हाथ बंटा रही हूं।
रूबिया भारती, सेक्टर 14, रोहतक।
गांव में ही पैदल चलना मुश्किल, शहर में बढ़ जाता है रिस्क
मैं गांव ईस्माइला की रहने वाली हूं। गांव में ही काफी ट्रैफिक रहता है। अपने बच्चे को पैदल या साइकिल से स्कूल नहीं भेजते हैं। यह जिम्मेदारी हम पति-पत्नी खुद संभालते हैं। शहर में तो रिस्क और बढ़ जाता है। बच्चों के लिए यहां चलना खतरे से खाली नहीं है। बेतरतीब सड़कों पर खड़े वाहन, तेज रफ्तार व लापरवाही ड्राइविंग करने वाले कभी भी हादसा कर सकते हैं। ऐसे में ट्रैफिक नियमों की पालना जरूरी बन जाती है। इसीलिए बॉटनर संस्था के अभियान का अपनाया है। अब पिछले चार दिनों से पति के साथ रात को दिल्ली बाईपास पर नियमों के तहत व्यवस्था बनाने जा रही हूं। ससुराल वालों का भी पूरा सहयोग मिल रहा है।
ज्योति शर्मा, गृहणी, इस्माईला।
गलती की माफी नहीं देता है सड़क हादसा
मैं आईटीआई में इंस्ट्रक्टर हूं। सड़कों पर रोज आना जाना होता है। आबादी के साथ वाहनों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इस कारण शहर की सड़कें बच्चों व बुजुर्गों के लिए चलने लायक नहीं रह गई हैं। सड़क पर चलते समय वाहन चालक की गलती किसी को माफी नहीं देती है। यह केवल सजा देती है। नियम तोड़कर चालक पुलिस के चालान से बच सकता है, मगर सड़क पर की गलती पर बचने की गुंजाइश नहीं है। इसलिए नियमों की पालना जरूरी है। यही सबक औरों को समझा सकूं, इसलिए शहर में शुरू हुई ट्रैफिक अभियान से जुड़ी हूं। कई बार सड़क हादसे व ट्रैफिक की समस्या को करीब से देखा है।
शिवानी, इंस्ट्रक्टर, आईटीआई।