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खेलरत्न बजरंग पूनिया व दीपा मलिक के जज्बे की कहानी
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दीपा मलिक
- फोटो : Sonipat
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खेलरत्न बजरंग पूनिया व दीपा मलिक के जज्बे की कहानी
अंकित चौहान
सोनीपत। पैरालंपिक मेडलिस्ट दीपा मलिक व पहलवान बजरंग पूनिया को खेलरत्न दिए जाने की घोषणा हो गई है, लेकिन इन दोनों ने खेलों में जिस तरह का जज्बा दिखाया है। वह जज्बा बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है। पाकिस्तान के साथ कारगिल में देश की खातिर पति कर्नल बिक्रम सिंह जंग लड़ रहे थे, तभी दीपा मलिक भी बीमारी में मौत से जंग लड़ रही थीं। दीपा मलिक ने मौत से जंग जरूर जीती, लेकिन उसके शरीर का निचला हिस्सा सुन्न हो गया। उसके बावजूद दस साल बाद दीपा ने खेलना शुरू किया और गोल्ड मेडल की झड़ी लगा दी। बजरंग पूनिया भी पहलवान ऐसे ही नहीं बने हैं, बल्कि हनुमान के भक्त पिता ने बेटे के जन्म लेते ही पहलवान बनाना तय कर लिया था और इसलिए ही उसका नाम बजरंग रखा था। बजरंग पूनिया भी लगातार मेडल जीतकर इतिहास रच रहा है।
दीपा ने मौत से जंग जीतकर 50 से ज्यादा गोल्ड जीते
सोनीपत के भैंसवाल कलां गांव की रहने वाली दीपा मलिक 1999 में बीमार हो गई थीं और उस समय ही पाकिस्तान के साथ कारगिल की जंग छिड़ गई। दीपा मलिक की तीन ट्यूमर सर्जरी हुई और वह मौत से जंग जीत गईं, लेकिन उनके शरीर का निचला हिस्सा सुन्न हो गया। पति कर्नल बिक्रम सिंह देश के लिए कारगिल में जंग लड़ रहे थे, लेकिन दीपा ने कभी हौसला नहीं खोया। दीपा ने निचला हिस्सा सुन्न होने के बाद खेलों को अपनी जिंदगी का सहारा बना लिया और दीपा ने 2009 से पदक जीतने का सिलसिला शुरू किया तो उसके बाद झड़ी लगा दी। दीपा मलिक अभी तक पैराएथलीट के शॉटपुट, डिस्कस थ्रो व जेवलिन में 50 से ज्यादा स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। दीपा मलिक पहली ऐसी भारतीय महिला हैं, जिसने पैरालंपिक में रजत पदक जीता हुआ है। इस तरह दीपा मलिक ने मौत को मात देकर देश के लिए मेडल जीते और अब वह खेलरत्न बन गई हैं।
हनुमान भक्त पिता ने पहलवान बनाने को बेटे का नाम बजरंग रखा
मूलरूप से झज्जर जिले के खुड्डन व वर्तमान में सोनीपत के सुजान सिंह पार्क के पास रहने वाले बजरंग पूनिया के पहलवान बनने के साथ ही नाम को लेकर अजीब कहानी है। बजरंग पूनिया के पिता बलवान सिंह हनुमान भक्त हैं तो वह कुश्ती के काफी शौकीन थे। इस कारण ही उनका सपना था कि वह बेटों को कुश्ती के लिए तैयार करेंगे। बजरंग पूनिया का नाम भी बजरंग बली के नाम पर रखा और उसके जन्म के साथ ही पिता बलवान ने तय कर लिया था कि इसे पहलवान बनाना है। बजरंग पूनिया भी पिता बलवान के सपने को साकार करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहा है और उसने कुश्ती के लिए ही पांच साल पहले गांव छोड़ दिया था। वह सोनीपत के साई सेंटर में प्रैक्टिस करने के साथ ही खुद खाना बनाकर खाता। जिसके बाद परिवार वाले सभी सोनीपत में आकर रहने लगे, जिससे बजरंग की प्रैक्टिस अन्य काम के कारण प्रभावित नहीं हो। उसके बाद से बजरंग लगातार देश के लिए मेडल जीत रहा है। बजरंग पूनिया ऐसे इकलौते पहलवान हैं जो कॉमनवेल्थ व एशियन गेम्स के साथ ही लगातार पांच गोल्ड व वर्ल्ड चैंपियनशिप में रजत जीत चुके हैं। बजरंग इस समय वर्ल्ड के नंबर वन पहलवान हैं।
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कबड्डी कोच आरएस खोखर ने लगातार मेडल दिलाए, द्रोणाचार्य अब मिला
कबड्डी खिलाड़ी तैयार करने में सोनीपत के रहने वाले कोच आरएस खोखर से शायद ही कोई बड़ा नाम होगा। दिल्ली में टेलीग्राफ में नौकरी करते हुए 1972 में नेशनल तक खेले और उसके बाद 1982 में एनआईएस कोर्स करके कोच बन गए। आरएस खोखर ने उसके तुरंत बाद ही साई ज्वाइन कर लिया और उन्होंने देश को लगातार बेहतर खिलाड़ी दिए। उसके बाद वह 1988 में भारतीय कबड्डी टीम के कोच बन गए और वह उसके बाद से लगातार कबड्डी को ऊंचाइयों पर लेकर जाने में लगे हैं। उनके कोच रहते हुए भारतीय कबड्डी टीम कई एशियन गेम्स में गोल्ड जीत चुकी है तो अन्य कई मेडल दिलाने में उनकी अहम भागीदारी रही है। कोच आरएस खोखर कहते हैं कि उनको द्रोणाचार्य अवार्ड दस साल पहले मिल जाना चाहिए था, लेकिन अब इतने लंबे समय बाद दिया गया है।
पहलवान पूजा व बॉक्सर सोनिया को अर्जुन अवार्ड तो मनोज को ध्यानचंद अवार्ड
हिसार की रहने वाली पहलवान पूजा ढांडा भी पिछले साल लगातार कई चैंपियनशिप में देश के लिए मेडल जीतती रही हैं तो उसने ओलंपिक व वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतने वाली पहलवानों तक को चित किया था। पूजा की उन उपलब्धियों को देखते हुए अर्जुन अवार्ड दिया गया है। इस तरह ही जींद की रहने वाली बॉक्सर सोनिया लाठर के मुक्के लगातार बरस रहे हैं। सोनिया ने एशियन व वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश के लिए सिल्वर मेडल जीते हैं और उनको भी अर्जुन अवार्ड दिया गया है। रोहतक के रहने वाले पहलवान मनोज ने कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए सिल्वर मेडल जीता था, जिनको अब ध्यानचंद अवार्ड दिया गया है।
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अंकित चौहान
सोनीपत। पैरालंपिक मेडलिस्ट दीपा मलिक व पहलवान बजरंग पूनिया को खेलरत्न दिए जाने की घोषणा हो गई है, लेकिन इन दोनों ने खेलों में जिस तरह का जज्बा दिखाया है। वह जज्बा बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है। पाकिस्तान के साथ कारगिल में देश की खातिर पति कर्नल बिक्रम सिंह जंग लड़ रहे थे, तभी दीपा मलिक भी बीमारी में मौत से जंग लड़ रही थीं। दीपा मलिक ने मौत से जंग जरूर जीती, लेकिन उसके शरीर का निचला हिस्सा सुन्न हो गया। उसके बावजूद दस साल बाद दीपा ने खेलना शुरू किया और गोल्ड मेडल की झड़ी लगा दी। बजरंग पूनिया भी पहलवान ऐसे ही नहीं बने हैं, बल्कि हनुमान के भक्त पिता ने बेटे के जन्म लेते ही पहलवान बनाना तय कर लिया था और इसलिए ही उसका नाम बजरंग रखा था। बजरंग पूनिया भी लगातार मेडल जीतकर इतिहास रच रहा है।
दीपा ने मौत से जंग जीतकर 50 से ज्यादा गोल्ड जीते
सोनीपत के भैंसवाल कलां गांव की रहने वाली दीपा मलिक 1999 में बीमार हो गई थीं और उस समय ही पाकिस्तान के साथ कारगिल की जंग छिड़ गई। दीपा मलिक की तीन ट्यूमर सर्जरी हुई और वह मौत से जंग जीत गईं, लेकिन उनके शरीर का निचला हिस्सा सुन्न हो गया। पति कर्नल बिक्रम सिंह देश के लिए कारगिल में जंग लड़ रहे थे, लेकिन दीपा ने कभी हौसला नहीं खोया। दीपा ने निचला हिस्सा सुन्न होने के बाद खेलों को अपनी जिंदगी का सहारा बना लिया और दीपा ने 2009 से पदक जीतने का सिलसिला शुरू किया तो उसके बाद झड़ी लगा दी। दीपा मलिक अभी तक पैराएथलीट के शॉटपुट, डिस्कस थ्रो व जेवलिन में 50 से ज्यादा स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। दीपा मलिक पहली ऐसी भारतीय महिला हैं, जिसने पैरालंपिक में रजत पदक जीता हुआ है। इस तरह दीपा मलिक ने मौत को मात देकर देश के लिए मेडल जीते और अब वह खेलरत्न बन गई हैं।
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हनुमान भक्त पिता ने पहलवान बनाने को बेटे का नाम बजरंग रखा
मूलरूप से झज्जर जिले के खुड्डन व वर्तमान में सोनीपत के सुजान सिंह पार्क के पास रहने वाले बजरंग पूनिया के पहलवान बनने के साथ ही नाम को लेकर अजीब कहानी है। बजरंग पूनिया के पिता बलवान सिंह हनुमान भक्त हैं तो वह कुश्ती के काफी शौकीन थे। इस कारण ही उनका सपना था कि वह बेटों को कुश्ती के लिए तैयार करेंगे। बजरंग पूनिया का नाम भी बजरंग बली के नाम पर रखा और उसके जन्म के साथ ही पिता बलवान ने तय कर लिया था कि इसे पहलवान बनाना है। बजरंग पूनिया भी पिता बलवान के सपने को साकार करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहा है और उसने कुश्ती के लिए ही पांच साल पहले गांव छोड़ दिया था। वह सोनीपत के साई सेंटर में प्रैक्टिस करने के साथ ही खुद खाना बनाकर खाता। जिसके बाद परिवार वाले सभी सोनीपत में आकर रहने लगे, जिससे बजरंग की प्रैक्टिस अन्य काम के कारण प्रभावित नहीं हो। उसके बाद से बजरंग लगातार देश के लिए मेडल जीत रहा है। बजरंग पूनिया ऐसे इकलौते पहलवान हैं जो कॉमनवेल्थ व एशियन गेम्स के साथ ही लगातार पांच गोल्ड व वर्ल्ड चैंपियनशिप में रजत जीत चुके हैं। बजरंग इस समय वर्ल्ड के नंबर वन पहलवान हैं।
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कबड्डी कोच आरएस खोखर ने लगातार मेडल दिलाए, द्रोणाचार्य अब मिला
कबड्डी खिलाड़ी तैयार करने में सोनीपत के रहने वाले कोच आरएस खोखर से शायद ही कोई बड़ा नाम होगा। दिल्ली में टेलीग्राफ में नौकरी करते हुए 1972 में नेशनल तक खेले और उसके बाद 1982 में एनआईएस कोर्स करके कोच बन गए। आरएस खोखर ने उसके तुरंत बाद ही साई ज्वाइन कर लिया और उन्होंने देश को लगातार बेहतर खिलाड़ी दिए। उसके बाद वह 1988 में भारतीय कबड्डी टीम के कोच बन गए और वह उसके बाद से लगातार कबड्डी को ऊंचाइयों पर लेकर जाने में लगे हैं। उनके कोच रहते हुए भारतीय कबड्डी टीम कई एशियन गेम्स में गोल्ड जीत चुकी है तो अन्य कई मेडल दिलाने में उनकी अहम भागीदारी रही है। कोच आरएस खोखर कहते हैं कि उनको द्रोणाचार्य अवार्ड दस साल पहले मिल जाना चाहिए था, लेकिन अब इतने लंबे समय बाद दिया गया है।
पहलवान पूजा व बॉक्सर सोनिया को अर्जुन अवार्ड तो मनोज को ध्यानचंद अवार्ड
हिसार की रहने वाली पहलवान पूजा ढांडा भी पिछले साल लगातार कई चैंपियनशिप में देश के लिए मेडल जीतती रही हैं तो उसने ओलंपिक व वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतने वाली पहलवानों तक को चित किया था। पूजा की उन उपलब्धियों को देखते हुए अर्जुन अवार्ड दिया गया है। इस तरह ही जींद की रहने वाली बॉक्सर सोनिया लाठर के मुक्के लगातार बरस रहे हैं। सोनिया ने एशियन व वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश के लिए सिल्वर मेडल जीते हैं और उनको भी अर्जुन अवार्ड दिया गया है। रोहतक के रहने वाले पहलवान मनोज ने कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए सिल्वर मेडल जीता था, जिनको अब ध्यानचंद अवार्ड दिया गया है।

बजरंग पूनिया- फोटो : Sonipat

आरएस खोखर- फोटो : Sonipat

पूजा ढांडा- फोटो : Sonipat

सोनिया लाठर- फोटो : Sonipat