{"_id":"641b662cdcc5dfc3170e0814","slug":"earth-is-warming-fast-humans-are-responsible-for-the-change-rohtak-news-c-17-roh1018-101508-2023-03-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"Rohtak News: तेजी से गर्म हो रही धरती, बदलाव के लिए मानव दोषी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Rohtak News: तेजी से गर्म हो रही धरती, बदलाव के लिए मानव दोषी
विज्ञापन
प्रो. राजेश धनखड़। अमर उजाला
विकास सैनी
रोहतक। धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इतिहास में दर्ज रिकाॅर्ड में यह सबसे अधिक है। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के अलावा वाहनों और उद्योगों का प्रदूषण भी ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह बताई जा रही है।
मौसम संबंधी स्थिति में बदलाव के लिए मानव खुद भी दोषी है। इसमें डीजल वाहनों का अंधाधुंध प्रयोग, वाहनों के टायरों से सड़कों पर उड़ती धूल, निर्माण कार्य व वन क्षेत्र घटना मुख्य रूप से शामिल है। प्रदूषण पर अंकुश लगाकर मौसमी स्थिति में बदलाव लाना संभव है। यह कहना है महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय ( एमडीयू) के पर्यावरण विज्ञान विभाग की अध्यक्ष एवं डीन लाइफ साइंस प्रो. राजेश धनखड़ का।
मौसम के बदलते व्यवहार की जानकारी साझा करते हुए उन्होंने कहा कि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन बढ़ गया है। ये गैसें पृथ्वी को ढक कर सूर्य की गर्मी रोक लेती हैं। इससे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन होता है। इतिहास में दर्ज किसी भी समय की तुलना में दुनिया अब तेजी से गर्म हो रही है। कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाकर बिजली और गर्मी पैदा करने से बड़े स्तर पर वैश्विक उत्सर्जन हो रहा है। विनिर्माण और उद्योग उत्सर्जन का उत्पादन करते हैं। ज्यादातर जीवाश्म ईंधन को जलाने से लेकर सीमेंट, लोहा, स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, कपड़े और अन्य सामान बनाने के लिए ऊर्जा का उत्पादन करते हैं। खनन और अन्य औद्योगिक प्रक्रियाएं भी गैसें छोड़ती हैं। खेतों या चरागाहों के लिए या अन्य कारणों से जंगल काटने से ग्रीन हाउस में गैस उत्सर्जन होता है। पेड़ काटने पर वे अपने में जमा कर रहे कार्बन को भी छोड़ देते हैं। इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ जाता है। वन कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित करते हैं। उन्हें नष्ट करने से उत्सर्जन को वातावरण से बाहर रखने की प्रकृति की क्षमता भी सीमित हो जाती है। मौसमी स्थिति में बदलाव के बड़े कारक चिंता का विषय हैं।
विज्ञापन
प्रकृति आधारित समाधान संभव
वनों की क्षमता, उनके वनीकरण और पुनर्वनीकरण को प्रकृति-आधारित समाधानों के रूप में लिया जा सकता है। वन जीवित पारिस्थितिक तंत्र हैं। ऐसे कई कारक हैं, जिन्हें मनुष्य नियंत्रित नहीं कर सकता है। ये कार्बनडाई ऑक्साइड को लेने के लिए वन की क्षमता पर प्रभाव डाल सकते हैं। वन न केवल कार्बन डाईऑक्साइड लेते हैं, बल्कि मीथेन और प्रतिक्रियाशील घटकों के स्रोत भी हैं। ये अल्पावधि में जलवायु को प्रभावित करते हैं। जलवायु अधिनियम 1990 के स्तर की तुलना में 2030 तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 49 प्रतिशत और 2050 तक 95 प्रतिशत की कमी की मांग करता है। इसमें बिजली, उद्योग, निर्मित पर्यावरण, यातायात और परिवहन, कृषि और भूमि उपयोग मुख्य है। सार्वजनिक परिवहन के विकल्प, सरकार को बढ़ते शहरों के साथ समान उपायों के लिए प्रतिबद्ध होने की आवश्यकता है। नई इमारतों का मतलब हरित डिजाइन विधियों को पुरस्कृत करने का नया अवसर है। यह शहरी संसाधनों पर तनाव को कम करने में मदद करता है। इसमें अपार्टमेंट व मनोरंजन स्थल शामिल हैं।
पिछली एक सदी में बढ़ा 0.7 डिग्री तापमान
यूनिसेफ भी धरती के बढ़ते तापमान व जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित है। इसलिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। संस्था के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 1901 से 2018 के बीच 0.7 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा है। इसके चलते वर्ष 1993 से 2017 में उत्तर भारतीय समुद्र का जल स्तर भी 3.3 मिलीमीटर बढ़ गया। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी प्रकार जारी रहा तो आने वाले दिनों में स्थिति गंभीर बन सकती है। धरती का तापमान करीब एक डिग्री और बढ़ने का अंदेशा है। ऐसा होने पर समुद्र जल स्तर बढ़ जाएगा। इससे अनगिनत छोटे टापू व हमारे देश के तटवर्ती कई शहर जलमग्न होने का खतरा भी कई गुणा बढ़ जाएगा।
विज्ञापन
रोहतक। धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इतिहास में दर्ज रिकाॅर्ड में यह सबसे अधिक है। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के अलावा वाहनों और उद्योगों का प्रदूषण भी ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह बताई जा रही है।
मौसम संबंधी स्थिति में बदलाव के लिए मानव खुद भी दोषी है। इसमें डीजल वाहनों का अंधाधुंध प्रयोग, वाहनों के टायरों से सड़कों पर उड़ती धूल, निर्माण कार्य व वन क्षेत्र घटना मुख्य रूप से शामिल है। प्रदूषण पर अंकुश लगाकर मौसमी स्थिति में बदलाव लाना संभव है। यह कहना है महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय ( एमडीयू) के पर्यावरण विज्ञान विभाग की अध्यक्ष एवं डीन लाइफ साइंस प्रो. राजेश धनखड़ का।
विज्ञापन
मौसम के बदलते व्यवहार की जानकारी साझा करते हुए उन्होंने कहा कि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन बढ़ गया है। ये गैसें पृथ्वी को ढक कर सूर्य की गर्मी रोक लेती हैं। इससे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन होता है। इतिहास में दर्ज किसी भी समय की तुलना में दुनिया अब तेजी से गर्म हो रही है। कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाकर बिजली और गर्मी पैदा करने से बड़े स्तर पर वैश्विक उत्सर्जन हो रहा है। विनिर्माण और उद्योग उत्सर्जन का उत्पादन करते हैं। ज्यादातर जीवाश्म ईंधन को जलाने से लेकर सीमेंट, लोहा, स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, कपड़े और अन्य सामान बनाने के लिए ऊर्जा का उत्पादन करते हैं। खनन और अन्य औद्योगिक प्रक्रियाएं भी गैसें छोड़ती हैं। खेतों या चरागाहों के लिए या अन्य कारणों से जंगल काटने से ग्रीन हाउस में गैस उत्सर्जन होता है। पेड़ काटने पर वे अपने में जमा कर रहे कार्बन को भी छोड़ देते हैं। इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ जाता है। वन कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित करते हैं। उन्हें नष्ट करने से उत्सर्जन को वातावरण से बाहर रखने की प्रकृति की क्षमता भी सीमित हो जाती है। मौसमी स्थिति में बदलाव के बड़े कारक चिंता का विषय हैं।
विज्ञापन
प्रकृति आधारित समाधान संभव
वनों की क्षमता, उनके वनीकरण और पुनर्वनीकरण को प्रकृति-आधारित समाधानों के रूप में लिया जा सकता है। वन जीवित पारिस्थितिक तंत्र हैं। ऐसे कई कारक हैं, जिन्हें मनुष्य नियंत्रित नहीं कर सकता है। ये कार्बनडाई ऑक्साइड को लेने के लिए वन की क्षमता पर प्रभाव डाल सकते हैं। वन न केवल कार्बन डाईऑक्साइड लेते हैं, बल्कि मीथेन और प्रतिक्रियाशील घटकों के स्रोत भी हैं। ये अल्पावधि में जलवायु को प्रभावित करते हैं। जलवायु अधिनियम 1990 के स्तर की तुलना में 2030 तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 49 प्रतिशत और 2050 तक 95 प्रतिशत की कमी की मांग करता है। इसमें बिजली, उद्योग, निर्मित पर्यावरण, यातायात और परिवहन, कृषि और भूमि उपयोग मुख्य है। सार्वजनिक परिवहन के विकल्प, सरकार को बढ़ते शहरों के साथ समान उपायों के लिए प्रतिबद्ध होने की आवश्यकता है। नई इमारतों का मतलब हरित डिजाइन विधियों को पुरस्कृत करने का नया अवसर है। यह शहरी संसाधनों पर तनाव को कम करने में मदद करता है। इसमें अपार्टमेंट व मनोरंजन स्थल शामिल हैं।
पिछली एक सदी में बढ़ा 0.7 डिग्री तापमान
यूनिसेफ भी धरती के बढ़ते तापमान व जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित है। इसलिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। संस्था के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 1901 से 2018 के बीच 0.7 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा है। इसके चलते वर्ष 1993 से 2017 में उत्तर भारतीय समुद्र का जल स्तर भी 3.3 मिलीमीटर बढ़ गया। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी प्रकार जारी रहा तो आने वाले दिनों में स्थिति गंभीर बन सकती है। धरती का तापमान करीब एक डिग्री और बढ़ने का अंदेशा है। ऐसा होने पर समुद्र जल स्तर बढ़ जाएगा। इससे अनगिनत छोटे टापू व हमारे देश के तटवर्ती कई शहर जलमग्न होने का खतरा भी कई गुणा बढ़ जाएगा।