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फरमाणा में पकने को तैयार कपास की फसल पर चलाना पड़ा ट्रैक्टर
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महम। गांव फरमाणा में खेतों में बारिश के बाद जलभराव से कपास की फसल नष्ट हो गई है। अब किसान इस पर ट्रैक्टर चलाने को मजबूर हो गए हैं। वे धान बोने की तैयारी कर रहे हैं।
किसान राजकुमार बिसला ने बताया कि खेतों में कई फुट बारिश का पानी जमा हो चुका है। कपास की फसल होने की संभावना तो पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है। इसलिए किसानों ने जोखिम लिया है कि पछेती धान ही लगा दी जाए। बिट्टू, फूलकुमार व गुलाबा आदि किसानों ने कपास की फसल नष्ट कर दी है। इसकी जगह धान लगाने की तैयारी शुरू कर दी है।
10 से 15 हजार रुपये प्रति एकड़ तक हो चुका है खर्च
राजकुमार ने बताया कि कपास की फसल पर 10 से 15 हजार रुपये प्रति एकड़ तक का खर्च हो चुका था। कपास की बिजाई के समय नहरी पानी की आपूर्ति पर्याप्त नहीं थी। ऐसे में किसानों ने ट्यूबवेलों से सिंचाई की थी। हैरो और रूटावेटर से जमीन तैयार करवाई गई। एक एकड़ में दो थैली बीज की लगी। एक हजार से अधिक रुपये का दो बार होने वाला स्प्रे आया तथा 35 रुपये प्रति टंकी के हिसाब से स्प्रे करने वाला लेता है।
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ठेके पर जमीन लेने वाले किसानों को दोहरी मार
उन किसानों को दोहरी मार पड़ी है, जिन्होंने ठेके पर जमीन लेकर बिजाई की थी। राजकुमार बिसला का कहना है कि इस इलाके में लगभग 40 हजार रुपये प्रति एकड़ का ठेका है। छह महीने की फसल तो गई। अब धान का सीजन जा चुका है। पता नहीं पछेती धान होगी या नहीं। किसानों का कहना है कि पिछले दो साल से धान की फसल नष्ट हो रही थी। पर्याप्त बारिश हो नहीं रही थी। नहरी पानी भी पूरा नहीं मिल रहा था। हालात ये थे कि धान ने बाली तक नहीं निकली थी। यही कारण रहा कि किसानों धान की बजाय कपास का विकल्प भी चुन लिया था। इस बार बारिश ज्यादा हो गई। कपास की फसल भी नष्ट हो गई।
इतने पानी में कपास नहीं हो सकती : कृषि अधिकारी
कृषि अधिकारी देवेंद्र सांगवान ने कहा है कि ज्यादा पानी जमा होने पर कपास की फसल का नष्ट होना तो तय है। धान के लिए हालांकि पछेत हो चुकी है, लेकिन अभी धान लगाया जा रहा है। धान की फसल में संभावना बनती है।
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किसान राजकुमार बिसला ने बताया कि खेतों में कई फुट बारिश का पानी जमा हो चुका है। कपास की फसल होने की संभावना तो पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है। इसलिए किसानों ने जोखिम लिया है कि पछेती धान ही लगा दी जाए। बिट्टू, फूलकुमार व गुलाबा आदि किसानों ने कपास की फसल नष्ट कर दी है। इसकी जगह धान लगाने की तैयारी शुरू कर दी है।
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10 से 15 हजार रुपये प्रति एकड़ तक हो चुका है खर्च
राजकुमार ने बताया कि कपास की फसल पर 10 से 15 हजार रुपये प्रति एकड़ तक का खर्च हो चुका था। कपास की बिजाई के समय नहरी पानी की आपूर्ति पर्याप्त नहीं थी। ऐसे में किसानों ने ट्यूबवेलों से सिंचाई की थी। हैरो और रूटावेटर से जमीन तैयार करवाई गई। एक एकड़ में दो थैली बीज की लगी। एक हजार से अधिक रुपये का दो बार होने वाला स्प्रे आया तथा 35 रुपये प्रति टंकी के हिसाब से स्प्रे करने वाला लेता है।
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ठेके पर जमीन लेने वाले किसानों को दोहरी मार
उन किसानों को दोहरी मार पड़ी है, जिन्होंने ठेके पर जमीन लेकर बिजाई की थी। राजकुमार बिसला का कहना है कि इस इलाके में लगभग 40 हजार रुपये प्रति एकड़ का ठेका है। छह महीने की फसल तो गई। अब धान का सीजन जा चुका है। पता नहीं पछेती धान होगी या नहीं। किसानों का कहना है कि पिछले दो साल से धान की फसल नष्ट हो रही थी। पर्याप्त बारिश हो नहीं रही थी। नहरी पानी भी पूरा नहीं मिल रहा था। हालात ये थे कि धान ने बाली तक नहीं निकली थी। यही कारण रहा कि किसानों धान की बजाय कपास का विकल्प भी चुन लिया था। इस बार बारिश ज्यादा हो गई। कपास की फसल भी नष्ट हो गई।
इतने पानी में कपास नहीं हो सकती : कृषि अधिकारी
कृषि अधिकारी देवेंद्र सांगवान ने कहा है कि ज्यादा पानी जमा होने पर कपास की फसल का नष्ट होना तो तय है। धान के लिए हालांकि पछेत हो चुकी है, लेकिन अभी धान लगाया जा रहा है। धान की फसल में संभावना बनती है।