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चार दिन बाद बेटी की शादी, नए नोट के चक्कर में गंवाए 48 हजार

Wed, 23 Nov 2016 02:13 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक Updated Wed, 23 Nov 2016 02:13 AM IST
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झज्जर जिले के छोछी गांव से एसबीआई में रुपये जमा कराने पहुंचे मां-बेटा - फोटो : amar ujala
चार दिन बाद उनकी बेटी की शादी है। उनके पास रुपये भी थे। उसे अपने खाते में जमा भी कर दिया। खाते में जमा कराने से पहले बैंक कर्मी से पूछा भी था कि वह यह पैसे निकाल तो सकती हैं। बैंक कर्मी ने पैसे निकालने में किसी तरह की दिक्कत नहीं होने की बात भी कही थी। लेकिन जब घंटों कतार में लगने के बाद वह पैसे निकालने पहुंचीं तो बैंक कर्मी ने कह दिया कि उनका खाता डैड है। उससे पैसे नहीं निकाल सकते। बैंक की लापरवाही की वजह से वह अपने ही पैसे गंवा बैठीं। शादी की दुहाई देने के बाद भी बैंक कर्मचारियों ने उनकी एक नहीं सुनी। बेटी की शादी के लिए खरीदारी करने आई महिला को घंटों भटकने के बाद निराश होकर लौटना पड़ा।
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झज्जर जिले के छोछी गांव निवासी विमला मंगलवार को अपने बेटे के साथ एसबीआई पहुंची। चार दिन बाद उनके बेटी की शादी है। शादी के लिए सामान की खरीदारी करनी है। मां-बेटे ने अपने खाते में 48 हजार रुपये के पुराने नोट जमा कर दिए। नोट जमा करने से पहले बैंक कर्मियों से पूछा था कि उसे इसी खाते से 24 हजार रुपये निकालने हैं। इसके बाद उसे शादी का सामान लेकर घर जाना है। इस पर बैंक कर्मियों ने हामी भर दी। खाते में रुपये जमा कराने के लिए दोनों मां-बेटा कतार में लग गए, लेकिन जैसे ही उनका नंबर आया बैंक कर्मी ने कहा कि आपका खाता पहले से डैड है, ऐसे में उससे नए रुपये नहीं निकाले जा सकते। इसके बाद देर शाम तक दोनों मां-बेटा बैंक अधिकारियों के चक्कर काटते रहे। भाई ने बहन की शादी की दुहाई दी तो मां ने बेटी की शादी का हवाला दिया, लेकिन बैंक कर्मियों की लापरवाही के चलते उन्हें न नए नोट मिले और पुराने भी हाथ से निकल गए। शाम तक भटकने के बाद मां-बेटा खाली हाथ लौट गए। उधर, बैंक अधिकारियों का कहना है कि यह खाता डैड है। मुंबई स्थिति मुख्य कार्यालय में इसकी जानकारी दे दी गई है। वहां से आदेश आने के बाद रुपये दिए जाएंगे।
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बुजुर्ग बोले-कुर्सी हैं कम, कहां बैठे हम

सरकार के आदेश के बाद एसबीआई की मुख्य शाखा में बुजुर्गों के लिए अलग लाइन की व्यवस्था तो हुई, लेकिन उनके लिए कुर्सियां कम पड़ गईं। लाइन में करीब 200 बुजुर्ग खड़े थे, लेकिन कुर्सियों की संख्या कम थी। लाइन में खड़े होकर पैसे निकालने के चक्कर में होेने वाली मौतों पर संज्ञान लेते हुए सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए पहले तो अलग लाइन की व्यवस्था की। इसके बाद वरिष्ठ नागरिकों के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की जाने लगी। लेकिन लाइन में खड़े होने वाले वरिष्ठ नागरिकों की संख्या के मुकाबले में कुर्सियों की संख्या बहुत कम है।
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बुढ़ापे में होने लगती है थकान

लाइन तो अलग लगवा दी, बैठने के लिए जो कुर्सियां है वह कम है। इंतजार ज्यादा समय तक करना पड़ता है। इससे बुढ़ापे में थकान होने लगती है।
बीआर शर्मा, चिन्योट कॉलोनी

समय से हो काम तो नहीं पड़ेगी कुर्सियों की जरूरत

अगर कर्मचारी समय से काम करें तो लाइन में लगना और खड़ा नहीं होना पड़ेगा। इससे कुर्सियों की ही जरूरत नहीं पड़ेगी।
रामपति शर्मा, आठ नंबर वार्ड
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