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दुनिया में पांचवां सबसे घातक रोग है सीओपीडी
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Wed, 16 Nov 2016 02:13 AM IST
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दुनिया भर में होने वाली मौत का तीसरा प्रमुख कारण सीओपीडी है। 50 वर्ष से अधिक आयु के मौत के आंकड़ों में भारत दूसरे स्थान पर है। यह फेफड़ों से संबंधित गंभीर रोग है, जो दुनिया भर में पांचवां सबसे घातक रोग बन गया है। यह जानकारी पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के छाती एवं क्षय रोग विभागाध्यक्ष डॉ. केबी गुप्ता ने दी।
मंगलवार को सीओपीडी दिवस की पूर्व संध्या पर डॉ. केबी गुप्ता ने बताया कि क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (सीओपीडी) से देश में डेढ़ करोड़ लोग ग्रस्त हैं। इसके चलते भारत में अमेरिका और यूरोप की तुलना में चार गुणा अधिक मौतें होती हैं। इससे बचाव के लिए लोगों को परहेज करना चाहिए। खासतौर पर तंबाकू और बॉयोमास के ईंधन से निकलने वाले धुएं तथा औद्योगिक प्रदूषण से बचना चाहिए।
उन्होंने बताया कि देश की करीब आधी जनसंख्या बॉयोमास ईंधन के धुएं के संपर्क में आती है। इसमें लकड़ी, गोबर, फसल के अवशेष आदि शामिल हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं व लड़कियां रसोई घर में अधिक समय बिताती हैं, इसलिए महिलाओं में यह तीन गुणा अधिक है। शहराें में बढ़ते वायु प्रदूषण के स्तर ने स्थिति को गंभीर बना दिया है।
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डॉ. गुप्ता ने कहा कि दमा और सीओपीडी दोनों रोगों से ग्रस्त मरीजों को सांस लेने में परेशानी होती है। सीओपीडी की पहचान करना जरूरी है। अधिकतर मरीज डॉक्टर के पास बीमारी के अधिक फैल जाने के बाद पहुंचते हैं। इस समय फेफड़ों को आघात पहुंचने का खतरा अधिक रहता है, जो परेशानी का सबब बनता है।
ये होती है समस्या
फेफड़ों का कैंसर, हृदय संबंधी रोग, खून की नली का रोग, हड्डियों में कमजोरी, फेफड़ों का संक्रमण और मधुमेह होने की आशंका।
सीओपीडी के लक्षण
लंबे समय तक खांसी-जुकाम रहना। मुंह में थूक आए। व्यायाम एवं सीढ़ियां चढ़ते समय सांस लेने में परेशानी हो और सांस लेने में किसी प्रकार की परेशानी होना सीओपीडी के लक्षण हैं।
यह सावधानी बहुत जरूरी
यदि आपकी आयु 35 वर्ष से अधिक है और सांस लेने में समस्या हो रही है तो संभव है आपको सीओपीडी हो। इसे हलके में न ले, विशेषज्ञ से जांच कराएं। आमतौर पर लोग सांस लेने संबंधी समस्याओं के लक्षणों को बुढ़ापे का कारण मानकर अनदेखी करते हैं। इससे बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच जाती है, जबकि इसकी पहचान जितनी जल्दी होगी, उपचार उतना आसान होगा।
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मंगलवार को सीओपीडी दिवस की पूर्व संध्या पर डॉ. केबी गुप्ता ने बताया कि क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (सीओपीडी) से देश में डेढ़ करोड़ लोग ग्रस्त हैं। इसके चलते भारत में अमेरिका और यूरोप की तुलना में चार गुणा अधिक मौतें होती हैं। इससे बचाव के लिए लोगों को परहेज करना चाहिए। खासतौर पर तंबाकू और बॉयोमास के ईंधन से निकलने वाले धुएं तथा औद्योगिक प्रदूषण से बचना चाहिए।
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उन्होंने बताया कि देश की करीब आधी जनसंख्या बॉयोमास ईंधन के धुएं के संपर्क में आती है। इसमें लकड़ी, गोबर, फसल के अवशेष आदि शामिल हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं व लड़कियां रसोई घर में अधिक समय बिताती हैं, इसलिए महिलाओं में यह तीन गुणा अधिक है। शहराें में बढ़ते वायु प्रदूषण के स्तर ने स्थिति को गंभीर बना दिया है।
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डॉ. गुप्ता ने कहा कि दमा और सीओपीडी दोनों रोगों से ग्रस्त मरीजों को सांस लेने में परेशानी होती है। सीओपीडी की पहचान करना जरूरी है। अधिकतर मरीज डॉक्टर के पास बीमारी के अधिक फैल जाने के बाद पहुंचते हैं। इस समय फेफड़ों को आघात पहुंचने का खतरा अधिक रहता है, जो परेशानी का सबब बनता है।
ये होती है समस्या
फेफड़ों का कैंसर, हृदय संबंधी रोग, खून की नली का रोग, हड्डियों में कमजोरी, फेफड़ों का संक्रमण और मधुमेह होने की आशंका।
सीओपीडी के लक्षण
लंबे समय तक खांसी-जुकाम रहना। मुंह में थूक आए। व्यायाम एवं सीढ़ियां चढ़ते समय सांस लेने में परेशानी हो और सांस लेने में किसी प्रकार की परेशानी होना सीओपीडी के लक्षण हैं।
यह सावधानी बहुत जरूरी
यदि आपकी आयु 35 वर्ष से अधिक है और सांस लेने में समस्या हो रही है तो संभव है आपको सीओपीडी हो। इसे हलके में न ले, विशेषज्ञ से जांच कराएं। आमतौर पर लोग सांस लेने संबंधी समस्याओं के लक्षणों को बुढ़ापे का कारण मानकर अनदेखी करते हैं। इससे बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच जाती है, जबकि इसकी पहचान जितनी जल्दी होगी, उपचार उतना आसान होगा।