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वर्ल्ड चैंपियनशिप पदक विजेता महिला बॉक्सर को नौकरी का इंतजार
अंकित चौहान / अमर उजाला, रोहतक
Updated Fri, 25 Sep 2015 02:19 AM IST
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पूरे देश में सबसे बढ़िया खेल नीति होने का दावा करने वाले प्रदेश में महिला खिलाड़ी गुमनामी का जीवन जी रही हैं। अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता महिला बॉक्सरों को आज भी नौकरी का इंतजार है। रेवाड़ी की रेनू ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में 2006 में कांस्य पदक जीता तो हिसार की स्वीटी ने 2014 में रजत। रेनू ने हताश होकर खेलना छोड़ दिया, लेकिन स्वीटी आज भी पसीना बहा रही है।
रेवाड़ी के आसियाकी गोरावास गांव की रेनू पुत्री अजीत सिंह ने 2001 में बॉक्सिंग का खेल चुना। रेनू ने भिवानी से खेलना शुरू किया और उसने नेशनल में 6 गोल्ड, कई सिल्वर और ब्रांज जीते। रेनू की जीत का कारवां विदेशों तक पहुंच गया और उसने एशियन चैंपियनशिप 2003 में देश को ब्रांज मेडल दिया। वहीं, वर्ल्ड चैंपियनशिप 2006 में ब्रांज और एशियन चैंपियनशिप 2008 में सिल्वर मेडल जीता। मेडल जीतने के बावजूद रेनू को सरकारी नौकरी नहीं मिली, जबकि परिवार की हालत काफी खराब है।
उसके पिता को भी कैंसर हो चुका है। मां-बाप के अलावा कमाने वाला कोई और नहीं है और इस कारण रेनू को नौकरी का इंतजार है। उसकी जूनियर खिलाड़ियों को नौकरी मिली तो रेनू ने हताश होकर दो साल पहले बॉक्सिंग छोड़ दी और कोच बनने के लिए एनआईएस पटियाला से कोर्स कर लिया। उसे उम्मीद थी कि शायद सरकार उसके तमगे देखकर कोच की नौकरी दे, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। वह खेल विभाग व खेल मंत्री तक के चक्कर काट चुकी है, लेकिन अपनी उम्मीद नहीं छोड़ रही है।
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इस तरह ही हिसार के घिराय गांव में रहने वाले किसान महेन्द्र सिंह की बेटी स्वीटी बूरा है। उसने 2009 में बॉक्सिंग को अपनाया। वह वर्ल्ड चैंपियनशिप 2014 व एशियन चैंपियनशिप 2015 में सिल्वर मेडल जीत चुकी है। परिवार की हालत ज्यादा ठीक नहीं है और उसे खेल आगे बढ़ाने के लिए नौकरी की जरूरत है। वह भी खेलमंत्री के पास तक कई महीने पहले नौकरी मांगने पहुंची थी, लेकिन अभी तक उसे भी कोई सहारा नहीं मिला है। यह दोनों ही कहती है कि 2005 के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वालों को नौकरी देने की बात कही गई थी, लेकिन इनको नौकरी का इंतजार है।
यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं है, जबकि प्रदेश सरकार ने नई खेल नीति के तहत बेहतरीन खिलाडिय़ों के लिए कई योजनाएं बनाई हैं। यदि ऐसा मामला मेरे समक्ष आता है, तो इस बारे में देखा जाएगा।
- अनिल विज, स्वास्थ्य एवं खेल मंत्री हरियाणा सरकार
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रेवाड़ी के आसियाकी गोरावास गांव की रेनू पुत्री अजीत सिंह ने 2001 में बॉक्सिंग का खेल चुना। रेनू ने भिवानी से खेलना शुरू किया और उसने नेशनल में 6 गोल्ड, कई सिल्वर और ब्रांज जीते। रेनू की जीत का कारवां विदेशों तक पहुंच गया और उसने एशियन चैंपियनशिप 2003 में देश को ब्रांज मेडल दिया। वहीं, वर्ल्ड चैंपियनशिप 2006 में ब्रांज और एशियन चैंपियनशिप 2008 में सिल्वर मेडल जीता। मेडल जीतने के बावजूद रेनू को सरकारी नौकरी नहीं मिली, जबकि परिवार की हालत काफी खराब है।
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उसके पिता को भी कैंसर हो चुका है। मां-बाप के अलावा कमाने वाला कोई और नहीं है और इस कारण रेनू को नौकरी का इंतजार है। उसकी जूनियर खिलाड़ियों को नौकरी मिली तो रेनू ने हताश होकर दो साल पहले बॉक्सिंग छोड़ दी और कोच बनने के लिए एनआईएस पटियाला से कोर्स कर लिया। उसे उम्मीद थी कि शायद सरकार उसके तमगे देखकर कोच की नौकरी दे, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। वह खेल विभाग व खेल मंत्री तक के चक्कर काट चुकी है, लेकिन अपनी उम्मीद नहीं छोड़ रही है।
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इस तरह ही हिसार के घिराय गांव में रहने वाले किसान महेन्द्र सिंह की बेटी स्वीटी बूरा है। उसने 2009 में बॉक्सिंग को अपनाया। वह वर्ल्ड चैंपियनशिप 2014 व एशियन चैंपियनशिप 2015 में सिल्वर मेडल जीत चुकी है। परिवार की हालत ज्यादा ठीक नहीं है और उसे खेल आगे बढ़ाने के लिए नौकरी की जरूरत है। वह भी खेलमंत्री के पास तक कई महीने पहले नौकरी मांगने पहुंची थी, लेकिन अभी तक उसे भी कोई सहारा नहीं मिला है। यह दोनों ही कहती है कि 2005 के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वालों को नौकरी देने की बात कही गई थी, लेकिन इनको नौकरी का इंतजार है।
यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं है, जबकि प्रदेश सरकार ने नई खेल नीति के तहत बेहतरीन खिलाडिय़ों के लिए कई योजनाएं बनाई हैं। यदि ऐसा मामला मेरे समक्ष आता है, तो इस बारे में देखा जाएगा।
- अनिल विज, स्वास्थ्य एवं खेल मंत्री हरियाणा सरकार