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Rohtak News: सुपवा के मंच पर नजर आया लिंग भेद पर प्रहार व सामाजिक संघर्ष

Wed, 11 Feb 2026 02:27 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Wed, 11 Feb 2026 02:27 AM IST
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Attack on gender discrimination and social struggle seen on the stage of Supwa
रोहतक। दादा लख्मीचंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय (सुपवा) के मंच पर मंगलवार को तमिलनाडु व पंजाब के कलाकारों ने मंच पर समाज में व्याप्त लिंग भेद व सामाजिक संघर्ष पर प्रहार किया। भारत रंग महोत्सव (भारंगम) व सारंग महोत्सव के दूसरे दिन रंगमंच के जरिए समाज के ज्वलंत मुद्दों पर कटाक्ष किया गया।
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नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के सहयोग से आयोजित महोत्सव में मंडी हाउस-द बैंड की टीम की संगीतमय प्रस्तुति पर श्रोता झूम उठे। तुषार कदम, रजत तिवारी व लाइव बैंड की मौजूदगी ने कार्यक्रम में ऊर्जा व उत्साह भरने का काम किया।
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सारंग महोत्सव में देवेंद्र अहीरवार की ओर से निर्देशित नाटक जोर से प्यार लगा है का भी मंचन किया गया। नाटक में समकालीन समाज की भावनात्मक जटिलताओं, रिश्तों और संवेदनाओं को सहज और प्रभावी अंदाज में प्रस्तुत किया गया जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।
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कूथु लोक रंगमंच ने दर्शाई महिलाओं के संघर्ष की कहानी
सारंग महोत्सव के तहत तमिलनाडु की पारंपरिक लोक रंगमंच शैली कूथु पर आधारित नाटक पेन नदई कूथु : द वुमेन्स वॉक की प्रस्तुति दी गई। यह नाटक तमिलनाडु व अंग्रेजी भाषा में मंचित किया गया।
लोक रंगमंच की प्रस्तुति में महिलाओं की भागीदारी, उनके संघर्ष और सामाजिक भूमिका में आए बदलाव को सशक्त तरीके से दर्शाया गया। कलाकारों ने सवाल उठाया कि समाज के बदलते दौर में भी महिलाओं का संघर्ष क्यों जारी है।
भारती ने बताया कि यह नाटक वास्तविक जीवन की महिला कत्ती कट्टू कलाकारों से प्रेरित है। परंपरागत रूप से यह लोक विधा पुरुषों द्वारा ही निभाई जाती रही है लेकिन पिछले 10-15 वर्षों में महिलाओं की भागीदारी ने इसकी दिशा बदली है।
गुरु राजगोपाल ने स्थापित इस परंपरा में महिलाओं का प्रवेश सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। तमिलनाडु में यह नाट्य रूप रात 10 से सुबह 6 बजे तक निरंतर चलता है। लगभग 200 वर्ष पुरानी इस परंपरा में सैकड़ों कथाएं रची गईं।

इनमें समाज, लिंग भेद और मानवीय संघर्षों पर सवाल उठाए गए। लकड़ी के आभूषण, दर्पण, पारंपरिक वेशभूषा, मुख सज्जा और जीवंत संगीत इसकी पहचान हैं। सात सदस्यीय दल में महिला व पुरुष कलाकारों की समान भागीदारी इस लोक विधा को समकालीन संदर्भ देती है।
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